बीते डेढ़ दशक में अफगानिस्तान सैन्य अभियान और विकास परियोजनाओं पर सैकड़ों अरब डॉलर की रकम खर्च हुई, लेकिन डीडब्लूय के बैर्न्ड रीगर्ट पूछते हैं कि इसका नतीजा क्या निकला है.
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बीते डेढ़ दशक में अफगानिस्तान सैन्य अभियान और विकास परियोजनाओं पर सैकड़ों अरब डॉलर की रकम खर्च हुई, लेकिन डीडब्लूय के बैर्न्ड रीगर्ट पूछते हैं कि इसका नतीजा क्या निकला है.
अमेरिका ने जब 2001 में अफगानिस्तान में तालिबान और अल कायदा के खिलाफ अपनी सेनाएं उतारी थीं तो किसी को अंदाजा नहीं था कि आगे चलकर ये अभियान क्या करवट लेगा. 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमले के बाद लक्ष्य था आतंकवादियों को पकड़ना और उनके ठिकानों को नष्ट करना. आज डेढ़ दशक बाद भी इस लक्ष्य को पूरी तरह हासिल नहीं किया जा सका है. अफगानिस्तान के कुछ हिस्सों पर अब भी तालिबान का नियंत्रण है. यही नहीं, हिंदुकुश के इलाके में खुद को इस्लामिक स्टेट कहने वाले आतंकवादी गुट ने भी पांव जमा लिए हैं. इसके अलावा पड़ोसी पाकिस्तान से काम करने वाले आतंकवादी गुट भी अफगानिस्तान में सक्रिय हैं.
अफगानिस्तान की कुश्ती
हिंसा की मार झेलते अफगानिस्तान में कुश्ती मनोरंजन का लोकप्रिय साधन है. आम तौर पर खुले अखाड़े में होने वाली इस कुश्ती को देखने बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं.
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पहलवानों पर दांव
खुले मैदान में पहलवानों को लड़तो देखने सिर्फ पुरुष ही आते हैं. दर्शक पहलवानों पर दांव लगाकर पैसा बनाते और गंवाते भी हैं.
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लंबी परम्परा
अफगानिस्तान में कुश्ती की परम्परा बहुत पुरानी है. कुश्ती के ओलंपिक खेलों में शुमार होने के बावजूद अफगान पहलवान अब तक कोई खास छाप नहीं छोड़ सके हैं.
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कुश्ती संघ
देश के हर इलाके में कुश्ती संघ हैं. कुश्ती के बड़े मुकाबले देखने के लिए बाकायदा टिकट खरीदे जाते हैं. संघ के अधिकारी टिकट बेचते हैं.
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अलग अलग नियम
प्रत्येक प्रांत में कुश्ती के कुछ अलग नियम भी हैं. कहीं कुश्ती राउंड में होती है तो कहीं एक बार में चित करने की परंपरा है.
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मिट्टी के अखाड़े
मुकाबले नरम मिट्टी के अखाड़ों में होते हैं. आम तौर पर रेफरी की भूमिका में भूतपूर्व पहलवान होते हैं.
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हर किसी की कुश्ती
देश के सबसे पुराने खेलों में शुमार कुश्ती में कई एज ग्रुप के लड़के हिस्सा ले सकते हैं. वहां मुकाबले भार के बजाए उम्र के हिसाब से होते हैं.
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सुरक्षाकर्मियों की कुश्ती
अफगान सुरक्षाकर्मी भी ट्रेनिंग के तौर पर कुश्ती का अभ्यास करते हैं. ट्रेनिंग कैम्पों में सुरक्षाकर्मियों के लिए भी कुश्ती के मुकाबले होते हैं.
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नाटो सेनाओं की कुश्ती
अफगानिस्तान में तैनाती के दौरान नाटो सैनिकों ने भी कुश्ती के गुर सीखे और दंगल में हिस्सा लिया. लोकल टीमों और सुरक्षाकर्मियों के बीच भी मुकाबले हुए.
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बढ़ती लोकप्रियता
हिंसा का चौथा दशक झेल रहे अफगानिस्तान में कुश्ती की लोकप्रियता बढ़ रही है. सिर्फ काबुल में ही बीते 13 साल में 25 कुश्ती क्लब खुले हैं.
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अंतरराष्ट्रीय समुदाय सोचता है कि आतंकवादी खतरे को तभी खत्म किया जा सकेगा जब अफगानिस्तान के लोगों के सामने एक निश्चित भविष्य हो. इसके लिए अफगानिस्तान के ताने बाने में बड़े बदलाव करने होंगे. सवाल है कि सैन्य अभियान और उसके साथ विकास के कार्यों पर हुए भारी खर्च का क्या नतीजा निकला है. अफगानिस्तान में बुनियादी ढांचे, सुरक्षा और मानवीय सहायता के क्षेत्र में 113 अरब डॉलर का निवेश किया गया है.
फिर भी अफगानिस्तान उस स्थिति को पाने से बहुत दूर नजर आता है जिसकी कल्पना उसे मदद देने वालों ने की होगी. वहां सुरक्षा स्थिति अब भी डांवाडोल है और आर्थिक विकास की हालत बहुत कमजोर है. अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी इन समस्याओं को खुले तौर पर स्वीकार करते हैं, हालांकि उन्हें उम्मीद और तरक्की के संकेत भी दिखाई देते हैं. लेकिन इससे ज्यादा कुछ उनके बस में नहीं है. बहरहाल कुछ सहायता संगठन कई क्षेत्रों में कुछ प्रगति होने की बात कह रहे हैं.
अफगानिस्तान को मदद देने वाले देश चाहते हैं कि उनकी तरफ से दिया जा रहा पैसा नौकरी के अवसर पैदा करने, भ्रष्टाचार पर लगाम कसने, शिक्षा को बढ़ावा देने और पुलिस की ट्रेनिंग पर लगाया जाए. खासकर अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश अब भी अफगानिस्तान में अरबों डॉलर लगाने को तैयार हैं. हालांकि इससे कुछ बदलेगा, ये भरोसा कम ही लोगों को है, लेकिन इसके सिवाय कोई चारा भी नहीं है.
अगर अफगानिस्तान फिर हाथ से निकलता है तो ये निश्चित तौर पर दुनिया भर के आतंकवादियों का ट्रेनिंग मुख्यालय होगा. इस तरह पिछले 40 साल में एक के बाद एक संकट झेलने वाला ये देश गृहयुद्ध की लपटों में घिर सकता है. ये बात समझी जा सकती है कि यूरोपीय संघ और अन्य देश अपनी तरफ से दी जाने वाली मदद के साथ शर्तें जोड़ना चाहते हैं जिसमें सुशासन और अफगान शरणार्थियों की वतन वापसी भी शामिल है. दाता देश चाहते हैं कि 15 साल से जो पैसा वो लगा रहे हैं उसका कुछ परिणाम दिखना चाहिए.
दूसरी तरफ एक सवाल ये भी है कि पश्चिमी देशों में करदाता अपने पैसे को कभी न भरने वाले कुएं में डालना क्यों पसंद करेंगे. मिसाल के तौर पर क्या अमेरिका में मतदाताओं को ये समझाना संभव होगा कि अरबों डॉलर की अमेरिकी मदद ऐसे देश को दी जा रही है जो सिर्फ गैरकानूनी ड्रग बनाने का कच्चा माल निर्यात करता है? क्या आप उन्हें ये बता सकते हैं कि नशीले पदार्थों की तस्करी से आतंकवादी गुटों को फायदा पहुंच रहा है?
ऐसे होते हैं अफगान
जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने उत्तरी अफगानिस्तान का दौरा किया. इस इलाके में जर्मन सेना तैनात रही है और लोग जर्मन लोगों से अपरिचित नहीं हैं.
मजार-ए-शरीफ के चेहरे
ये बुजुर्ग उन 100 से ज्यादा अफगान लोगों में से एक हैं जिन्हें जर्मन फोटोग्राफर येंस उमबाख ने मजार-ए-शरीफ शहर के हालिया दौरे में अपने कैमरे में कैद किया है.
असली चेहरे
उमबाख ऐसे चेहरों को सामने लाना चाहते थे जो अकसर सुर्खियों के पीछे छिप जाते हैं. वो कहते हैं, “जैसे कि ये लड़की जिसने अपनी सारी जिंदगी विदेशी फौजों की मौजूदगी में गुजारी है.”
नजारे
उमबाख 2010 में पहली बार अफगानिस्तान गए और तभी से उन्हें इस देश से लगाव हो गया. उन्हें शिकायत है कि मीडिया सिर्फ अफगानिस्तान का कुरूप चेहरा ही दिखाता है.
मेहमानवाजी
अफगान लोग उमबाख के साथ बहुत प्यार और दोस्ताना तरीके से पेश आए. वो कहते हैं, “हमें अकसर दावतों, संगीत कार्यक्रमों और राष्ट्रीय खेल बुजकाशी के मुकाबलों में बुलाया जाता था.”
सुरक्षा
अफगानिस्तान में लोगों की फोटो लेना आसान काम नहीं था. हर जगह सुरक्षा होती थी. उमबाख को उनके स्थानीय सहायक ने बताया कि कहां जाना है और कहां नहीं.
नेता और उग्रवादी
उमबाख ने अता मोहम्मद नूर जैसे प्रभावशाली राजनेताओं की तस्वीरें भी लीं. बाल्ख प्रांत के गवर्नर मोहम्मद नूर जर्मनों के एक साझीदार है. उन्होंने कुछ उग्रवादियों को भी अपने कैमरे में कैद किया.
जर्मनी में प्रदर्शनी
उमबाख ने अपनी इन तस्वीरों की जर्मनी में एक प्रदर्शनी भी आयोजित की. कोलोन में लगने वाले दुनिया के सबसे बड़े फोटोग्राफी मेले फोटोकीना में भी उनके फोटो पेश किए गए.
फोटो बुक
येंस उमबाख अपनी तस्वीरों को किताब की शक्ल देना चाहते हैं. इसके लिए वो चंदा जमा कर रहे हैं. वो कहते हैं कि किताब की शक्ल में ये तस्वीरें हमेशा एक दस्तावेज के तौर पर बनी रहेंगी.
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अफगानिस्तान के सामने आने वाले सालों में बड़ी चुनौतियां होंगी. पाकिस्तान से तीस लाख और ईरान से दस लाख अफगान शरणार्थी वापस अफगानिस्तान पहुंचेंगे. बेरोजगार और बेकार लोगों की इतनी बड़ी तादाद नई मुसीबतों को जन्म दे सकती है.