अभी और आगे बढ़ सकता है वोडाफोन विवाद
२७ अक्टूबर २०२०मामला 2007 में टेलीकॉम कंपनी वोडाफोन द्वारा इसी क्षेत्र की एक और कंपनी हचीसन के भारत में व्यापार और संपत्ति को खरीदने से जुड़ा है. उसी साल सितंबर में भारत सरकार ने वोडाफोन को आदेश दिया था कि वो इस खरीद पर पूंजी लाभ टैक्स के रूप में 7,990 करोड़ रुपए जमा करे. भारत सरकार ने 2016 में एक बार फिर वोडाफोन को टैक्स नोटिस भेज दिया और इस बार मूल मांग पर ब्याज मिला कर कुल रकम को बढ़ा कर लगभग 22,000 करोड़ रुपए कर दिया.
पिछले महीने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने वोडाफोन के हक में फैसला देते हुए टैक्स की मांग को गैर वाजिब बताया और भारत सरकार को इस पर आगे ना बढ़ने का आदेश दिया. तब से यह अटकलें लग रही थीं कि भारत सरकार अब मामले को आगे बढ़ाएगी या नहीं.
मीडिया में आई खबरों के अनुसार भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार को सलाह दी है कि इस फैसले के खिलाफ अपील की जानी चाहिए क्योंकि कोई भी अंतरराष्ट्रीय अदालत किसी देश की संसद द्वारा पारित कानून के खिलाफ फैसला नहीं दे सकती है. वोडाफोन का शुरू से कहना रहा है एक यह एक अंतरराष्ट्रीय डील थी और इस पर उसके द्वारा भारत सरकार को कोई भी टैक्स देय नहीं था.
क्या है मामला
कंपनी ने टैक्स नोटिस को पहले बॉम्बे हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में फैसला दिया. 2012 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नाकाम करने के लिए तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने आय कर कानून में संशोधन कर के उसे पीछे की तारीख से लागू करने का प्रस्ताव रखा. संसद ने संशोधन पारित कर दिया और वोडाफोन पर फिर से टैक्स भरने की बाध्यता स्थापित हो गई.
भारत और विदेश में कई निवेशकों ने इस कदम की निंदा की और कहा कि पीछे की तिथि से टैक्स लगाना एक बुरा उदाहरण है क्योंकि इस से टैक्स नियमों में स्थिरता पर आघात होता है. टैक्स नियमों में स्थिरता को निवेश के मूल आधारों में से एक माना जाता है.
अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बाद भारत सरकार ने बातचीत के जरिए वोडाफोन के साथ मामले को सुलझाने का प्रयास किया. 2014 तक ये प्रयास चलते रहे लेकिन अंत में इनके बेनतीजा रहने पर वोडाफोन ने अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के दरवाजे पर दस्तक दी.
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