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अमजद अली खां: दर्द निकला, तमन्ना बोल उठी

२७ मई २०११

अमजद अली खां से बात करना अद्भुत अनुभव हो सकता है. सरोद से निकलतीं उनकी स्वर लहरियों की तरह उनकी बातें भी जहन को सकून के मुकाम तक ले जाती हैं. आप भी यह अनुभव पा सकते हैं. पढ़िए, उनसे बातचीत...

Der berühmte Sarod-Spieler Amjad Ali Khan im Interview mit der Deutschen Welle in Jaipur, am 22.5.2011 Bild: Jasvinder Sehgal
तस्वीर: DW

अजीब शख्स है यह, मंजिल पर भी नहीं रुकता...सफ़र तमाम हुआ, फिर भी सफ़र में है...ये पंक्तियां, विश्व प्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खान पर हर्फ़ दर हर्फ़ सही उतरती हैं. जिस कलाकार ने दुनियाभर को अपने संगीत का रसिक बना रखा हो, जिसे पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे बीसियों पुरस्कार मिल चुके हों और जो 24 रागों की रचना कर चुका हो, उसे सफलता का पर्याय कहा जाना, कोई अतिश्योक्ति न होगा. और सफलता का यह सफर आज भी जारी है, तत्परता और निरंतरता के साथ.

मगर इन सबके बावजूद नम्रता से ओत-प्रोत व्यक्तित्व, रियाज की निरंतरता और श्रोताओं का पूरा सम्मान, चंद ऐसे गुण हैं जो उस्ताद अमज़द अली खान को अति-विशिष्ट और विशेष बनाते हैं.\b\

पिछले दिनों जयपुर में एक संगीत कार्यक्रम के शिरकत करने आए उस्ताद अमजद अली खां ने डॉयचे वेले से बातचीत की. वह इस बात से बेहद खुश थे कि जर्मनी के अलावा भारत में भी डॉयचे वेले के चाहने वालों से रूबरू होने का मौका मिला. पिछले साल बर्लिन के "इंडिया-फेस्टिवल" में अपनी प्रस्तुति और उस पर जर्मनवासियों से मिली दाद को याद कर उस्ताद भावविभोर थे. फ्रैंकफर्ट के बारह सौ साला समारोह पर विएना में हुए कार्यक्रम की याद भी उनके मनस पटल पर ताजा है. वह कहते हैं कि अगर संगीतकार की अहमियत है तो श्रोता का भी महत्व कम नहीं है, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

तस्वीर: AP

संगीत को उन्होंने संजोया, हमने भुलाया

बात करते करते यकायक उस्ताद अमजद अली खां को बेथोफन का शहर बॉन याद आ गया. शहर की सुंदरता और कला से लगाव और प्यार का जिक्र तो फिर होना ही था. उनके दिल में छुपी पीड़ा बाहर आ गई. उन्होंने कहा, "जर्मन वासियों ने बेथोफन और यूरोप वालों ने जिस तरह शेक्सपीयर को जिंदा रखा है, वह काबिले तारीफ है. हम भारतवासी न तो तानसेन को संजो कर रख पाए और न गालिब को".

खां साहब कहते हैं कि उनकी जन्म-स्थली ग्वालियर गालिब जैसे मशहूर फनकारों की नगरी है पर अपने उस्तादों को कुछ नजर करने में वह बॉन जैसी सफल नहीं हो पाई.

संगीत ईश्वर की भेंट

अमजद अली कहते हैं, "संगीत एक इबादत है क्योंकि वह खुदा की देन है और दुनिया का हर धर्म संगीत के जरिये ही इबादत करता है. मस्जिद की अजान और मंदिर के घंटे-घड़ियाल इसी मौसिकी की एक मिसाल है."

लेकिन अपने परमेश्वर को तालों में बंद रखने पर वह काफी नाराज़ दिखे. वह कहते हैं कि दुनिया के हर मजहब में लोग जिस भगवान या खुदा से दिन भर सलामती की दुआ मांगते हैं, रात होते ही उसे हिफाज़त से तालें में बंद कर देते हैं.

अमजद अली खां संगीत को दो भागों में बांटते हुए कहते हैं कि एक संगीत को बजाया जाता है जिसमें सिर्फ आवाज होती है और दूसरे में भाषा यानी शब्द होते हैं. वह बताते हैं, "मौजूदा युग में भाषा यानी शब्द इतने मिलावटी हो गए हैं कि वे जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम करने लगे हैं और भाषा संवाद के स्थान पर विवाद उत्पन्न करने लगी है. मैं तो अपने वाद्य यंत्र द्वारा संगीत की वह भाषा गाता हूं जिसे हर कोई समझ सकता है."

तस्वीर: DW

दिल को सकून दे, वही असली संगीत

आधुनिक समय के बारे में खां साहब कहते हैं कि आज कम्प्यूटर की मदद से पूरा संगीत बनाया जा सकता है पर उसमें वह खूबसूरती नहीं आ सकती जो एक इंसान की प्रस्तुति में आती है. वह कहते हैं, "संगीत को वाद्य यंत्रों की तेज आवाज आसानी से शोर में तब्दील करती जा रही है. आज भी सात सुरों ने इंसान को बांध रखा है. कोई मशीन या इंसान बारह सुरों के अलावा तेरहवें सुर को ईजाद नहीं कर पाया है."

कैसी है आज की शिक्षा?

अमजद अली साहब को इस बात का मलाल है कि वह बहुत ज्यादा नहीं पढ़ पाए. लेकिन उन्हें इस बात पर फख्र भी है कि उनकी बुनियादी तालीम, स्कूल कॉलेज में मिलने वाले किताबी ज्ञान से कहीं ज्यादा अच्छी रही जिसने उन्हें इंसान से प्रेम और उसकी इज्जत करना सिखाया.

आधुनिक शिक्षा प्रणाली से अमजद अली खां ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं. वह कहते हैं कि मां बाप अपने बच्चों को लिखने पढ़ने के लिए अपना पेट काट कर बाहर भेजते हैं और बच्चे हैं कि लिख पढ़ कर बाहर ही रह जाते हैं. वह कहते हैं, "यह कैसी शिक्षा है जो संस्कार न दे कर लड़ना-झगड़ना और आतंक फैलाना सिखा रही है. कुछ देश तो अपनी भावी पीढ़ी के हाथों में बन्दूक थमा रहे हैं." अफगानिस्तान से उनकी पीढ़ियों का संबंध आंखों में आतंक का दर्द व्यक्त करने में देर नहीं लगाता और वह संजीदा हो उठते हैं.

संगीत पारंपरिक विरासत

छह साल की उम्र से संगीत सीखने वाले उस्ताद अमजद अली खां साहब के परिवार की छठी पीढ़ी विरासत को बढ़ा रही है. अपने साहबजादों अमान और आयान द्वारा सरोद की परंपरा को आगे बढ़ाए जाने से अमजद अली काफी संतुष्ट दिखे.

प्रसिद्ध भरतनाट्यम नर्तकी सुब्बालक्ष्मी उनकी धर्मपत्नी हैं और नेहा शर्मा उनकी बहू. हिन्दू-मुस्लिम संस्कृति घर में प्यार और मोहब्बत की खुश्बू फैला रही है. यही खुश्बू दुनिया भर में फैले, यही खां साहब की दिली तमन्ना है.

रिपोर्टः जसविंदर सहगल, जयपुर

संपादनः वी कुमार

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