अमेरिका ने कहा है कि उसने पाकिस्तान को दी जाने वाली कम से कम 90 करोड़ डॉलर की सहायता रोक रखी है. उसके मुताबिक यह रकम तभी जारी होगी, जब पाकिस्तान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे गुटों के खिलाफ कार्रवाई करेगा.
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अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने एक बार फिर पाकिस्तान पर आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाहें मुहैया कराने का आरोप लगाया है, जिनके जरिए अफगानिस्तान में मौजूद अमेरिका और अन्य देशों के सैनिकों पर हमले किए जाते हैं. मंत्रालय का कहना है कि इन दोनों गुटों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पाकिस्तान ने कोई कदम नहीं उठाया है जिसे लेकर अमेरिका खासा हताश है.
मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि पाकिस्तान को दी जाने वाली कितनी सहायता रोकी गई है. उसका कहना है कि अभी इसकी गणना की जा रही है जिसमें विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की तरफ से दी जाने वाली राशि शामिल है. पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाहें मुहैया कराने के आरोपों को ठुकराता रहा है. पाकिस्तान ने शुक्रवार को अमेरिकी का आलोचना करते हुए कहा कि मदद रोकने के उसके कदम से उल्टा असर होगा.
अफगानिस्तान में तैनात विदेशी सेनाओं के लिए हक्कानी नेटवर्क सबसे बड़ा खतरा रहा है. आखिर हक्कानी नेटवर्क को इस इलाके में सबसे दुर्दांत आतंकवादी संगठन क्यों माना जाता है?
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सोवियत अफगान युद्ध का अवशेष
हक्कानी नेटवर्क का गठन जलालुद्दीन हक्कानी ने किया था जिसने अफगानिस्तान में 1980 के दशक में सोवियत फौजों से जंग लड़ी थी. उस समय मुजाहिदीन को अमेरिका का समर्थन हासिल था. 1995 में हक्कानी नेटवर्क तालिबान के साथ मिल गया और दोनों गुटों ने अफगान राजधानी काबुल पर 1996 में कब्जा कर लिया. 2012 में अमेरिका ने इस गुट को आतंकवादी संगठन घोषित किया.
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इस्लामी विचारक
1939 में अफगान प्रांत पकतिया में जलालुद्दीन हक्कानी का जन्म हुआ. उसने दारुल उलूम हक्कानिया से पढ़ाई की. इसे पाकिस्तान के बड़े धार्मिक नेता मौलाना समी उल हक के पिता ने 1947 में शुरू किया था. दारुल उलूम हक्कानिया तालिबान और दूसरे चरमपंथी गुटों के साथ अपने संबंधों के लिए जाना जाता है.
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तालिबान मंत्री बने जलालुद्दीन हक्कानी
तालिबान के शासन में जलालुद्दीन हक्कानी को अफगान कबायली मामलों का मंत्री बनाया गया. 2001 में अमेरिका के हमलों के बाद तालिबान का शासन खत्म होने तक वह इस पद पर था. तालिबान नेता मुल्ला उमर के बाद जलालुद्दीन को अफगानिस्तान में सबसे प्रभावशाली चरमपंथी माना जाता था. जलालुद्दीन के अल कायदा के नेता ओसामा बिन लादेन से भी गहरे संबंध थे.
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हक्कानी नेटवर्क कहां है
रक्षा मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि इस गुट का कमांड सेंटर अफगान सीमा से लगते पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान के मीरनशाह शहर में है. अमेरिकी और अफगान अधिकारियों का दावा है कि हक्कानी नेटवर्क को पाकिस्तान की सेना का समर्थन है हालांकि पाकिस्तानी अधिकारी इससे इनकार करते हैं. अमेरिका का कहना है कि इस गुट के लड़ाकों ने अफगानिस्तान में विदेशी सेना, स्थानीय फौज और नागरिकों पर हमले किये हैं.
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हक्कानी विरासत
माना जाता है कि 2015 में जलालुद्दीन हक्कानी की मौत हो गयी लेकिन इस गुट ने पहले इस तरह की खबरों को खारिज किया. नेटवर्क का नेतृत्व अब जलालुद्दीन के बेटे सिराजुद्दीन हक्कानी के हाथ में है. सिराजुद्दीन तालिबान का भी उप प्रमुख है.
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सिराजुद्दीन हक्कानी कौन है?
इस बारे में बहुत पुख्ता जानकारी तो नहीं लेकिन जानकारों का कहना है कि उसने अपना बचपन पाकिस्तान के मीरनशाह में बिताया है. पेशावर के उपनगर में मौजूद दारुल उलूम हक्कानिया में पढ़ाई की है. सिराजुद्दीन को सैन्य मामलों का जानकार माना जाता है. कुछ विश्लेषकों का कहना है कि सिराजुद्दीन वैचारिक रूप से अपने पिता की तुलना में ज्यादा कट्टर हैं.
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अनास हक्कानी को मौत की सजा
अनास हक्कानी जलालुद्दीन हक्कानी का बेटा है. उसकी मां संयुक्त अरब अमीरात से है. अनास फिलहाल अफगान सरकार की गिरफ्त में है और उसे मौत की सजा सुनायी गयी है. हक्कानी नेटवर्क ने अनास को फांसी की सजा होने पर अफगानिस्तान को कड़े नतीजे भुगतने की चेतावनी दी है.
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कितना बड़ा है हक्कानी नेटवर्क
अफगान मामलों के जानकार और रिसर्च संस्थानों का कहना है कि इस गुट के साथ तीन से पांच हजार लड़ाके हैं. नेटवर्क को मुख्य रूप से खाड़ी के देशों से धन मिलता है. हक्कानी नेटवर्क अपहरण और जबरन वसूली के जरिये भी अपने अभियानों के लिए धन जुटाता है.
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आतंकवादी गुटों से संबंध
हक्कानियों का क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय चरमपंथी संगठनों जैसे कि अल कायदा, तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान, लश्कर ए तैयबा और मध्य एशियाई इस्लामी गुटों से अच्छा संबंध है. जलालुद्दीन हक्कानी ना सिर्फ बिन लादेन बल्कि अल कायदा के वर्तमान प्रमुख अयमान अल जवाहिरी के भी काफी करीब थे.
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अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान को दो श्रेणियों में मिलने वाली मदद प्रभावित होगी. पहली है विदेशी सैन्य आर्थिक मदद (एफएमएफ) जिसके जरिए अमेरिकी सैन्य साजोसामान की खरीद, ट्रेनिंग और सर्विस के लिए धन मुहैया कराया जाता है. और दूसरी है गठबंधन सहयोग राशि (सीएसएफ), जिसमें पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में होने वाले खर्च का भुगतान किया जाता है.
पेंटागन के प्रवक्ता कमांडर पैट्रिक इवांस का कहना है कि कांग्रेस ने वित्त वर्ष 2017 के लिए पाकिस्तान के लिए 90 करोड़ डॉलर की रकम मंजूर की थी. लेकिन इसमें अब तक कोई रकम पाकिस्तान को जारी नहीं की गई है.
अमेरिकी सरकार ने साफ किया है कि अगर पाकिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करता है तो उसे मदद जारी की सकती है. इसके साथ ही, इस बात पर भी जोर दिया गया है कि पाकिस्तान को दी जाने वाली असैन्य मदद प्रभावित नहीं होगी.
सैन्य मदद रोकने के कदम पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता का कहना है, "उम्मीद है कि पाकिस्तान इस कदम को सजा नहीं बल्कि प्रोत्साहन के तौर पर लेगा." लेकिन पाकिस्तान इस मुद्दे पर सख्त तेवर दिखा रहा है. उसका कहना है कि अब वह अमेरिका के सामने नहीं झुकेगा. हाल के सालों में अमेरिका के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बेहद खराब हुए हैं. लेकिन चीन और रूस के साथ उसकी दोस्ती मजबूत हो रही है.
एके/आईबी (रॉयटर्स)
पाकिस्तान में बैन इंडियन प्रोडक्ट्स
एक जैसा खाना, एक जैसी संस्कृति इसके बावजूद ना के बराबर कारोबार. पाकिस्तान में 1,000 से ज्यादा भारतीय प्रोडक्ट्स बैन हैं. देखिये कैसी कैसी चीजों पर है बैन.
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