केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के काफिले पर कश्मीर के पुलवामा में हुए फिदायी यानी आत्मघाती हमले ने एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के प्रति नई नीति की जरूरत को रेखांकित कर दिया है.
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इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में केंद्र में सत्तासीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार और जम्मू-कश्मीर में उसके प्रतिनिधि राज्यपाल सतपाल मलिक लोकसभा चुनाव के ठीक पहले अपनी अब तक चली आ रही नीति में कोई बदलाव करेंगे, खासकर तब जब पाकिस्तान और उसके द्वारा समर्थित आतंकवाद के खिलाफ राष्ट्रोन्माद भड़काने से चुनावी लाभ होने की भी आशा हो.
इस मुद्दे पर राजनीति न की जाए, इसी को सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नई दिल्ली में जी-20 देशों के राजदूतों के साथ अपनी बैठक और नवनियुक्त महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने लखनऊ में अपना संवाददाता सम्मेलन रद्द कर दिया लेकिन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने गुजरात में अपनी मीटिंग रद्द नहीं की.
पाकिस्तान-स्थित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मुहम्मद द्वारा हमले की जिम्मेदारी लेने के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान से बदला लेने की बात कही है और राज्यपाल सतपाल मलिक ने तीन महीने के भीतर सभी आतंकवादियों के सफाए की, लेकिन बीस-वर्षीय आत्मघाती आतंकवादी आदिल अहमद दर के पिता गुलाम हसन दर ने कहा है कि सरकार को पता लगाना चाहिए कि नौजवान क्यों बंदूक उठा रहे हैं और ऐसे अतिवादी रास्ते पर जा रहे हैं.
अभी तक के इतिहास को देखते हुए तो यही लगता है कि दर की बात नक्कारखाने में तूती की आवाज ही साबित होगी और कश्मीर में आतंकवाद की समस्या को राजनीतिक नहीं बल्कि सैन्य समस्या ही समझा जाता रहेगा.
नोटबंदी के बाद आतंकवाद के सफाए और आतंकवादी हमलों के बंद होने के दावे अब खोखले साबित हो चुके हैं और यह भी स्पष्ट हो गया है कि मोदी सरकार ने पिछले पौने पांच साल में कश्मीर की स्थिति को सुधारने की बजाय बिगाड़ा ही है. इस दौरान बच्चों तक को छर्रों की बौछार करके जख्मी और अंधा किया गया और सेना की जीप पर एक युवक को बांध कर घुमाने पर गर्व प्रकट करके कश्मीरी अस्मिता और स्वाभिमान को लगातार चुनौती दी गई. जम्मू में बीजेपी और अन्य हिंदुत्ववादी संगठनों ने साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को तेज किया.
लोग अभी भी भूले नहीं हैं कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने श्रीनगर जाकर इंसानियत के दायरे में बात करने की घोषणा की थी, तब कश्मीरी जनता ने किस कदर उत्साह के साथ उनका स्वागत किया था. बाद में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार ने वहां कुछ विशिष्ट नागरिकों की एक टीम को स्थिति का जायजा लेने भेजा, तब भी स्थिति सुधरने की कुछ उम्मीद बंधी.
चाहे कांग्रेस की सरकार हो या बीजेपी की, स्थिति को स्थाई रूप से बेहतर बनाने के लिए कोई नीतिगत बदलाव नहीं किया गया और पुलिस, सुरक्षा बलों और सेना के जरिए ही आतंकवाद से लड़ने की कोशिश की गई, बिना यह सोचे हुए कि आतंकवाद तो बीमारी का लक्षण है, बीमारी नहीं. इलाज तो बीमारी का करना है. लेकिन बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया. नतीजा यह है कि बीमारी भी मौजूद है और उसके लक्षण भी.
बीमारी है कश्मीर घाटी के लोगों का विश्वास जीतना और उनकी भारतीय लोकतंत्र और संघीय प्रणाली के भीतर भागीदारी को सुनिश्चित करना. कश्मीरियों को यह भरोसा दिलाना कि पूरे भारत में वे कहीं भी चैन के साथ रह सकते हैं, पढ़ाई कर सकते हैं, नौकरी और अन्य व्यवसाय कर सकते हैं और किसी भी अन्य नागरिक की तरह जी सकते हैं. लेकिन अकसर देश के विभिन्न हिस्सों से कश्मीरियों के खिलाफ हिंसक घटनाओं की खबरें आती रहती हैं.
कश्मीर में सेना और सुरक्षाबलों के पास अभी भी असीमित अधिकार हैं और उन्हें देने वाला विशेष कानून बरकरार है जबकि उसे खत्म करने की मांग उसी तरह प्रबल है जैसे उत्तर-पूर्व में. आम नागरिक चक्की के दो पाटों - सुरक्षा बलों और आतंकवादियों के बीच पिस रहा है. सुरक्षा बलों की निगाह में वह आतंकवादी है और आतंकवादियों की निगाह में सरकारी एजेंट.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ साबरमती के किनारे चाहे जितने झूले झूले हों, लेकिन चीन ने जैश-ए-मुहम्मद पर प्रतिबंध लगाने के भारत और अमेरिका के हर प्रयास का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोध किया है. जैश पिछले वर्षों में भी लगातार सक्रिय रहा है और पठानकोट में हुए हमले के पीछे भी उसी का हाथ था. पुलवामा की घटना मोदी सरकार के खुफियातंत्र और कश्मीर नीति की विफलता तो दर्शाती ही है, उसकी अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बेअसर होने का प्रमाण भी है.
कश्मीर मुद्दे की पूरी रामकहानी
कश्मीर मुद्दे की पूरी रामकहानी
आजादी के बाद से ही कश्मीर मुद्दा भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में एक फांस बना हुआ है. कश्मीर के मोर्चे पर कब क्या क्या हुआ, जानिए.
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1947
बंटवारे के बाद पाकिस्तानी कबायली सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया तो कश्मीर के महाराजा ने भारत के साथ विलय की संधि की. इस पर भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध शुरू हो गया.
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1948
भारत ने कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाया. संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 47 पास किया जिसमें पूरे इलाके में जनमत संग्रह कराने की बात कही गई.
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1948
लेकिन प्रस्ताव के मुताबिक पाकिस्तान ने कश्मीर से सैनिक हटाने से इनकार कर दिया. और फिर कश्मीर को दो हिस्सों में बांट दिया गया.
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1951
भारतीय कश्मीर में चुनाव हुए और भारत में विलय का समर्थन किया गया. भारत ने कहा, अब जनमत संग्रह का जरूरत नहीं बची. पर संयुक्त राष्ट्र और पाकिस्तान ने कहा, जनमत संग्रह तो होना चाहिए.
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1953
जनमत संग्रह समर्थक और भारत में विलय को लटका रहे कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्लाह को गिरफ्तार कर लिया गया. जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने भारत में कश्मीर के विलय पर मुहर लगाई.
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1957
भारत के संविधान में जम्मू कश्मीर को भारत के हिस्से के तौर पर परिभाषित किया गया.
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1962-63
चीन ने 1962 की लड़ाई भारत को हराया और अक्साई चिन पर नियंत्रण कर लिया. इसके अगले साल पाकिस्तान ने कश्मीर का ट्रांस काराकोरम ट्रैक्ट वाला हिस्सा चीन को दे दिया.
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1965
कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ. लेकिन आखिर में दोनों देश अपने पुरानी पोजिशन पर लौट गए.
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1971-72
दोनों देशों का फिर युद्ध हुआ. पाकिस्तान हारा और 1972 में शिमला समझौता हुआ. युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा बनाया गया और बातचीत से विवाद सुलझाने पर सहमति हुई.
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1984
भारत ने सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण कर लिया, जिसे हासिल करने के लिए पाकिस्तान कई बार कोशिश की. लेकिन कामयाब न हुआ.
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1987
जम्मू कश्मीर में विवादित चुनावों के बाद राज्य में आजादी समर्थक अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ. भारत ने पाकिस्तान पर उग्रवाद भड़काने का आरोप लगाया, जिसे पाकिस्तान ने खारिज किया.
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1990
गवकदल पुल पर भारतीय सुरक्षा बलों की कार्रवाई में 100 प्रदर्शनकारियों की मौत. घाटी से लगभग सारे हिंदू चले गए. जम्मू कश्मीर में सेना को विशेष शक्तियां देने वाले अफ्सपा कानून लगा.
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1999
घाटी में 1990 के दशक में हिंसा जारी रही. लेकिन 1999 आते आते भारत और पाकिस्तान फिर लड़ाई को मोर्चे पर डटे थे. कारगिल की लड़ाई.
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2001-2008
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत की कोशिशें पहले संसद पर हमले और और फिर मुबई हमले समेत ऐसी कई हिंसक घटनाओं से नाकाम होती रहीं.
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2010
भारतीय सेना की गोली लगने से एक प्रदर्शनकारी की मौत पर घाटी उबल पड़ी. हफ्तों तक तनाव रहा और कम से कम 100 लोग मारे गए.
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2013
संसद पर हमले के दोषी करार दिए गए अफजल गुरु को फांसी दी गई. इसके बाद भड़के प्रदर्शनों में दो लोग मारे गए. इसी साल भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मिले और तनाव को घटाने की बात हुई.
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2014
प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ गए. लेकिन उसके बाद नई दिल्ली में अलगाववादियों से पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात पर भारत ने बातचीत टाल दी.
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2016
बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में आजादी के समर्थक फिर सड़कों पर आ गए. अब तक 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और गतिरोध जारी है.
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2019
14 फरवरी 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में 46 जवान मारे गए. इस हमले को एक कश्मीरी युवक ने अंजाम दिया. इसके बाद परिस्थितियां बदलीं. भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव बना हुआ है.
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2019
22 जुलाई 2019 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से मुलाकात करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दावा किया की भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर मुद्दे को लेकर मध्यस्थता करने की मांग की. लेकिन भारत सरकार ने ट्रंप के इस दावे को खारिज कर दिया और कहा कि कश्मीर का मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय बातचीत से ही सुलझेगा.
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2019
5 अगस्त 2019 को भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक संशोधन विधेयक पेश किया. इस संशोधन के मुताबिक अनुच्छेद 370 में बदलाव किए जाएंगे. जम्मू कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा. लद्दाख को भी एक केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा. धारा 35 ए भी खत्म हो गई है.