संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त कार्यालय की स्थापना को 2019 में 26 साल पूरे हो रहे हैं. 20 दिसंबर 1993 को संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकार मामलों की देखभाल के लिए एक आयुक्त का होना तय किया. यह फैसला 2013 में विएना में मानवाधिकारों पर हुए विश्व सम्मेलन में शामिल देशों के प्रतिनिधियों की सलाह पर किया गया. पिछले 25 सालों में मानव अधिकारों की रक्षा की दिशा में यह सबसे बड़ा फैसला माना जाता है.
करीब 45 लाख बांग्लादेशी बच्चे मजदूरी करने को मजबूर हैं और जानलेवा कामों में लगे हुए हैं. इनमें से करीब 17 लाख बच्चे राजधानी ढाका में रहते हैं. इन बच्चों के रोजमर्रा जीवन की एक झलक...
तस्वीर: Mustafiz Mamunभारी गरीबी के कारण परिवार बच्चों को मजदूरी करवाने के लिए मजबूर हो जाते हैं. इन्हें कम पैसे मिलते हैं. ईंटें ढोना, कंस्ट्रक्शन, कचरा उठाना या फिर गुब्बारा बनाने वाली फैक्ट्रियों में ये काम करते हैं. ढाका के कमरंगी चार इलाके के गुब्बारा कारखाने में कई किशोर काम करते हैं. इनमें 10 साल के बच्चे भी हैं.
तस्वीर: Mustafiz Mamunकमरंगी चार जैसे कारखानों में काम करने वाले बच्चों को अक्सर खतरनाक रसायनों के बीच काम करना पड़ता है. बांग्लादेश की सरकार ने निर्देशिका जारी की है जिसके मुताबिक 38 खतरनाक रोजगारों में बच्चों के काम करने पर रोक है. लेकिन ये निर्देश कहीं लागू नहीं किए गए हैं.
तस्वीर: Mustafiz Mamunवयस्कों की तुलना में बच्चों को कम पैसे दिये जाते हैं और अक्सर उनसे ज्यादा काम भी करवाया जाता है. यह एक कारण है कि कारखानों में बच्चे काम करते हैं. इन बच्चों को अक्सर कारखाने के कमरों में ही रखा जाता है ताकि बाहर से ये नहीं दिखें. इन्हें शुक्रवार के अलावा कोई छुट्टी नहीं मिलती.
तस्वीर: Mustafiz Mamunये अली हुसैन है. यह बच्चा ढाका के केरानीगंज की सिल्वर फैक्ट्री में काम करता है, दिन रात. घंटों का काम और बहरा करने वाला मशीनों का शोर. कहने की जरूरत नहीं कि दिन भर काम करने वाले बच्चे अक्सर स्कूल नहीं जाते.
तस्वीर: Mustafiz Mamun2006 में बनाए गए बांग्लादेश के श्रम कानून के मुताबिक काम करने की न्यूनतम आयु 14 है. ये है 12 साल का आसिम. नोआखाली में रहने वाला आसिम हर दिन 12 घंटे ढाका के हजारीबाग में चमड़ा बनाने वाली फैक्ट्री में काम करता है. इसके जरिये वह अपना और मां का पेट पाल सकता है.
तस्वीर: Mustafiz Mamunचांदपुर में रहने वाला राबी अपनी मां के साथ प्लास्टिक कमरंगी चार के प्रोसेसिंग कारखाने में काम करता है, यहां बोतलें बनाई जाती हैं. इस कारखाने में बच्चों को नौकरी नहीं दी जाती लेकिन राबी को इसलिए काम मिला क्योंकि मां की तनख्वाह से घर नहीं चल पाता.
तस्वीर: Mustafiz Mamunबाल मजदूरी करने वाले 93 फीसदी बच्चे असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं. छोटे कारखानों, घरेलू धंधों या नौकर के तौर पर या फिर छोटी बसों या टैक्सियों में चिल्लाने वाले कंडक्टर के तौर पर काम करते हैं और अक्सर दुर्घटनाओं का शिकार भी होते हैं.
तस्वीर: Mustafiz Mamunबांग्लादेश में ईंट बनाने का काम बहुत आम है. कई बच्चे ढाका के आमिन बजार में ईंट ढोने का काम करते हैं. उन्हें इन भारी ईंटों को उठाने के लिए 100-200 टका दिये जाते हैं. एक ईंट करीब तीन किलोग्राम की होती है और हर बच्चे को छह से सोलह ईंटे उठानी ही पड़ती हैं.
तस्वीर: Mustafiz Mamunरहीम सीसे की फैक्ट्री में लगा हुआ है. सीसा एक खतरनाक रासायनिक पदार्थ है और स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक. कई बच्चे इस तरह के कामों में लगे हुए हैं और अक्सर भेदभाव, दुर्व्यवहार और यौन हिंसा के भी शिकार बन जाते हैं.
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