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समाज

एसिड हमलों पर अंकुश के लिए मॉडल बन सकता है बांग्लादेश

प्रभाकर मणि तिवारी
२५ जनवरी २०१८

तमाम कानूनों और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद भारत में एसिड हमले थम नहीं रह रहे हैं. ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल इस मामले में पहले स्थान पर है.

Bilder des Jahres 2016
तस्वीर: Reuters/L.Jackson

एक महिला मुख्यमंत्री के सत्ता में होने के बावजूद बंगाल में एसिड हमलों की शिकार महिलाओं को न्याय और मुआवजा मिलने की दर काफी धीमी है. पीड़ितों के पुनर्वास व मुआवजे की प्रक्रिया तेज करने की खातिर विभिन्न राज्यों के पुलिस प्रमुखों पर दबाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने हाल में एसिड हमलों का एक राष्ट्रीय डिजिटल डाटा बेस तैयार किया है. वर्ष 2013 में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम पारित होने के बाद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में धारा 326 ए और 326 बी जोड़ने के बाद ऐसे हमलों में अभियुक्तों को अब 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है. इससे पहले ऐसे मामलों में अधिकतम तीन साल की ही सजा का प्रावधान था.

बढ़ते एसिड हमले

नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों से साफ है कि एसिड हमलों को रोकने में सरकारें और तमाम कानून अब तक प्रभावी नहीं हो सके हैं. इन आंकड़ों में कहा गया है कि वर्ष 2016 में पूरे देश में एसिड हमलों की 283 घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से लगभघ 27 फीसदी यानी 76 मामले अकेले बंगाल में हुए. बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश का स्थान है जहां 57 मामले दर्ज हुए. 2014 में देश में ऐसे 203 मामले दर्ज हुए थे जबकि 2015 में ऐसे 222 मामले सामने आए थे. लेकिन 2016 में ऐसे मामलों की तादाद बढ़ कर 283 तक पहुंच गईं. इन हमलो के सिलसिले में 2016 में कुल 233 लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

विशेषज्ञों का कहना है कि देश में एसिड की बिक्री पर सुप्रीम कोर्ट के कड़े दिशानिर्देशों के बावजूद उनका कड़ाई से पालन नहीं किया जा रहा है. एसिड की अनियंत्रित बिक्री ही ऐसे अपराध की सबसे बड़ी वजह है. सुप्रीम कोर्ट की पाबंदी के बावजूद देश में कहीं भी एसिड खरीदना खास मुश्किल नहीं है. वर्ष 2013 में कोर्ट ने सरकारों को चुनिंदा दुकानदारों को ही एसिड की बिक्री का लाइसेंस देने का निर्देश दिया था. नाबालिगों को एसिड बेचने पर पाबंदी लगाने के साथ ही कोर्ट ने कहा था कि एसिड की बिक्री का ब्योरा तीन दिनों के भीतर नजदीकी थाने को देना होगा.

तस्वीर: Getty Images/I.Mukherjee

वजह

एसिड सर्वाइवर्स एंड वूमेन वेलफेयर फाउंडेशन (एएसडब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के एक विस्तृत अध्ययन में कहा गया है कि प्यार और शादी के प्रस्तावों को ठुकराना ऐसे हमलों की सबसे बड़ी वजह है. कम से कम 36 फीसदी मामलों में ऐसा ही देखने को मिला है. इसके अलावा 13 फीसदी मामलों में वैवाहिक जीवन में अशांति की वजह से ऐसे हमले हुए हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि 84 फीसदी मामलों में हमलावर पीड़ित के परिचित थे. एएसडब्ल्यूडब्ल्यूएफ के मुताबिक 2010 से 2016 के बीच बंगाल में एसिड हमले की 220 घटनाएं दर्ज की गईं जो देश में इस दौरान हुई ऐसी घटनाओं का 20 फीसदी है.

एसिड हमलों के मामले में पहले स्थान पर होने के बावजूद बंगाल में पीड़ितों को न्याय दिलाने और मुआवजा देने के मामले में बंगाल का रिकार्ड काफी खराब है. एएसडब्ल्यूडब्ल्यूएफ के संयोजक दिब्यलोक राय चौधरी कहते हैं, "बीते कुछ वर्षों के दौरान देश में एसिड हमलों के मामले में अभियुक्तों को सजा की दर जहां 40 फीसदी रही है वहीं पश्चिम बंगाल में यह महज 14 फीसदी है." उनका कहना है कि हमले के बाद पीड़ित महीनों तक सदमे और अस्पताल में रहते हैं. इस दौरान अपराधी या तो फरार हो जाता है या फिर कानूनी खामियों का फायदा उठा कर बचाव की जमीन तैयार कर लेता है.

एसिड हमलों के बाद पीड़ित या पीड़िता के सामने सबसे बड़ी चुनौती इलाज का खर्च जुटाने की होती है. उनका इलाज या पुनर्वास लंबा चल सकता है. लेकिन बंगाल सरकार का रिकार्ड इस मामले में अच्छा नहीं है. एसोसिएश फॉर प्रोटेक्शन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स (एपीडीआर) की ओऱ से सूचना के अधिकार के तहत जुटाई गई जानकारी से पता चला है कि सरकार ने 46 मामलों में से महज 18 में ही मुआवजा दिया है. एपीडीआर के बापी दासगुप्ता एसिड हमले के पीड़ित लोगों की ओर से बरसों से मामले लड़ते रहे हैं. वे सूचना के अधिकार के जरिए मुआवजे की जानकारी लेने के अलावा एसिड की बिक्री से संबंधित नियमों को कड़ाई से लागू करने की भी मुहिम चला रहे हैं. बापी कहते हैं, "इन हमलों में मुख्यतः नाइट्रिक एसिड का इस्तेमाल होता है जो सुनारों की दुकानों पर आसानी से उपलब्ध है. इसका इस्तेमाल सोने को साफ करने के लिए किया जाता है." कलकत्ता हाईकोर्ट में एसिड हमलों के पीड़ितों के मामले लड़ने वाले वरिष्ठ एडवोकेट जंयत नारायण चटर्जी कहते हैं, "ऐसे हमलों की जांच की प्रगति से मुआवजे का कोई संबंध नहीं होना चाबहिए. अभियुक्त की गिरफ्तारी हो या नहीं, मुआवजा पहले मिलना चाहिए."

तस्वीर: Reuters/M.P.Hossain

अंकुश के उपाय

पीड़ितों के पुनर्वास व मुआवजे की प्रक्रिया को तेज करने की खातिर विभिन्न राज्यों के पुलिस प्रमुखों पर दबाव बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग ने हाल में एसिड हमलों का एक राष्ट्रीय डिजजिटल डाटा बेस तैयार किया है. आयोग के संयुक्त सचिव केएल शर्मा बताते हैं, "इस डाटा बेस में पूरे देश में होने वाले ऐसे हमलों और जांच की प्रगति का पूरा ब्योरा दर्ज रहता है. इससे पता चल जाता है कि पीड़ितों को मुआवजा मिला या नहीं, जांच में कहां तक प्रगति हुई और अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा सका है या नहीं."

पश्चिम बंगाल समेत पूरे देश में बढ़ते ऐसे हमलों पर अंकुश लगाने के लिए कानून विशेषज्ञ और सामाजिक संगठन पड़ोसी बांग्लादेश से सबक लेने की वकालत कर रहे हैं. कुछ साल पहले तक ऐसे हमलों के मामले में बांग्लादेश में पूरी दुनिया में पहले स्थान पर था. वर्ष 2002 तक देश में सालाना पांच सौ एसिड हमले होते थे. लेकिन ऐसे हमलों पर अंकुश लगाने के लिए उसने उस साल दो कड़े कानून बना कर उनको लागू किया. नतीजतन वहां उक्त कानूनों व दूसरे उपायों से ऐसे हमले घट कर साल में लगभग सौ रह गए हैं. उक्त कानूनों में एसिड की खुली बिक्री पर तो पूरी तरह पाबंदी लगाई ही गई थी. ऐसे हमलों से निपटने के लिए प्राधिकरणों का गठन किया गया. वहां नेशनल एसिड कंट्रोल काउंसिल का गठन किया गया. बांग्लादेश सरकार ने ऐसे हमलों की जांच 30 दिनों में पूरा करना अनिवार्य कर दिया है. राय चौधरी का कहना है कि एसिड हमलों पर अंकुश लगाने के लिए मौजूदा कानूनों को कड़ाई से लागू करना और पुलिस-प्रशासन का रवैया बदलना भी जरूरी है.

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