कनाडा के चुनावों में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की एक बार फिर जीत संभव है, लेकिन उनका संसद में बहुमत हासिल कर पाना मुश्किल लग रहा है. क्या चुनावों को समय से पहले कराने का उनका दांव रंग लाएगा?
तस्वीर: Carlos Osorio/REUTERS
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ट्रूडो अल्पमत की सरकार चला रहे हैं जिसकी वजह से वो दूसरी पार्टियों पर निर्भर हैं. इस निर्भरता की वजह से उन्हें अपनी नीतियों पर समझौता भी करना पड़ा है. पिछले महीने ओपिनियन पोल में वो दूसरी पार्टियों से काफी आगे चल रहे थे, जिसकी वजह से उन्होंने चुनावों को तय समय से दो साल पहले ही कराने का ऐलान कर दिया.
उनका कहना था कि उनकी लेफ्ट-ऑफ-सेंटर लिबरल सरकार का कोविड-19 महामारी से निपटने में कैसा प्रदर्शन रहा इस पर जनता की मुहर की जरूरत है. लेकिन चुनाव जल्दी कराने के फैसले से लोग खुश नहीं हुए और धीरे धीरे उन्होंने अपनी बढ़त को गंवा दिया.
मजबूत नेतृत्व का लक्ष्य
लिबरल रणनीतिकार भी मान रहे हैं कि हाउस ऑफ कॉमन्स की 338 सीटों में से अधिकतर को जीतना मुश्किल होगा. 49-वर्षीय ट्रूडो की सरकार ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ने में रिकॉर्ड दर्जे का ऋण ले लिया. हाल के दिनों में उन्होंने सबके टीकाकरण पर अपना ध्यान केंद्रित किया.
कंजर्वेटिव पार्टी के नेता एरिन ओ'टूल एक बहस के दौरान बोलते हुएतस्वीर: Justin Tang/The Canadian Press/AP Photo/picture alliance
वो वैक्सीन को अनिवार्य बनाने में विश्वास रखते हैं जबकि कंजर्वेटिव पार्टी के 48-वर्षीय नेता एरिन ओ'टूल रैपिड टेस्टिंग को वरीयता देते हैं. 19 सितंबर को चुनावी अभियान का आखिरी दिन था और इस दिन ट्रूडो ने पूरे देश में 4,500 किलोमीटर लंबी यात्रा की.
उन्होंने ओंटारियो के नियाग्रा फॉल्स में अपने समर्थकों को बताया, "हमें एक स्पष्ट, मजबूत नेतृत्व की जरूरत है जो बिना किसी आना कानी के टीकाकरण को आगे बढ़ाता रहे और हम यही करेंगे. मिस्टर ओ'टूल ऐसा नहीं कर सकते और करेंगे भी नहीं."
ट्रुडो अगर वकई बहुमत हासिल नहीं कर पाते हैं तो इससे उनके भविष्य पर सवाल उठेंगे. वो एक करिश्माई और प्रगतिशील राजनेता हैं और लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे लिबरल नेता पिएरे ट्रूडो के बेटे हैं. वो 2015 में सत्ता में आए थे, लेकिन 2019 में चेहरे पर काला रंग पोते हुए उनकी पुरानी तस्वीरों के सामने आने के बाद उनकी सरकार अल्पमत में आ गई.
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नाराज हैं मतदाता
पोल में सामने आया है कि लिबरल और कंजर्वेटिव दोनों को बराबर लोकप्रियता हासिल है, जिसकी वजह से सैद्धांतिक रूप से ट्रूडो को बढ़त मिलनी चाहिए, क्योंकि शहरी केंद्रों में लिबरल पार्टी मजबूत है. अधिकतम सीटें शहरी केंद्रों में ही हैं.
अगस्त में ओंटारियो में लोगों के गुस्से की वजह से ट्रूडो के एक कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा थातस्वीर: Carlos Osorio/REUTERS
एक लिबरल रणनीतिकार ने बताया, "यह निश्चित रूप से काफी करीबी लड़ाई है. क्या बहुमत संभव है? हां. क्या इसकी सबसे ज्यादा संभावना है? नहीं." लिबरल यह मान रहे हैं कि जल्दी चुनाव कराने की वजह से मतदाता खुश नहीं हैं. जब भी मतदान कम होता है तो उसका फायदा कंजर्वेटिव पार्टी को मिलता है.
दोनों पार्टियां मतों के विभाजन का भी सामना कर रही हैं जिसकी वजह से मामला और पेचीदा हो गया है. लिबरलों की वाम की तरफ झुकाव वाले न्यू डेमोक्रैट्स से भी टक्कर है और दूसरी तरफ टीकाकरण का विरोध करने वाली दक्षिणपंथी पीपल्स पार्टी ऑफ कनाडा (पीपीसी) कंजर्वेटिव पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है.
ट्रूडो ने सार्वजनिक रूप से सजग रुख अपनाया है और बहुमत के सवाल से बचते रहे हैं. उन्होंने मोंट्रियल में पत्रकारों को बताया, "मैं चाहता हूं कि पूरे देश में जितने संभव हों उतने लिबरल जीतें क्यों हमें एक मजबूत सरकार की जरूरत है."
लेकिन निजी तौर उनके साथी खुल कर बात कर रहे हैं. एक का कहना है, "आप महामारी में चुनाव फिर से एक अल्पमत की सरकार पाने के लिए तो नहीं कराते हैं."
सीके/एए (रॉयटर्स)
भारतीय मूल के नेता जो विश्व भर में छाए
अब तक कई भारतीय मूल के लोग दुनिया भर की सरकारों में तमाम अहम पद संभाल चुके हैं. अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा से लेकर मॉरीशस, फिजी, गुयाना जैसे देशों में भी भारतवंशी नेताओं का लंबा इतिहास रहा है.
तस्वीर: Kirsty Wigglesworth/AP/dpa
ऋषि सुनक
ऋषि सुनक ब्रिटेन के पहले प्रधानमंत्री बन रहे हैं जो भारतीय मूल के हैं. कंजरवेटिव पार्टी के सदस्य ऋषि सुनक फरवरी 2020 से ब्रिटिश कैबिनेट में वित्त मंत्री रहे हैं. इसके पहले वह ट्रेजरी के मुख्य सचिव थे. ऋषि सुनक 2015 में रिचमंड (यॉर्क) से संसद सदस्य के रूप में चुने गए थे. सुनक भारत की कंपनी इन्फोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति और लेखिका सुधा मूर्ति के दामाद हैं.
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कमला हैरिस
अमेरिका में नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों में डेमोक्रैट पार्टी की ओर से उपराष्ट्रपति पद की उम्मीदवार चुनी गई हैं कमला हैरिस. वह डेमोक्रैट पार्टी की ओर से अमेरिकी कांग्रेस में पांच सीटों पर काबिज भारतीय मूल के सीनेटरों में से एक हैं. कमला हैरिस की मां का नाम श्यामला गोपालन है. किशोरावस्था तक कमला हैरिस अपनी छोटी बहन माया हैरिस के साथ अकसर तमिलनाडु के अपने ननिहाल में आया करती थीं.
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निक्की हेली
संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की दूत रह चुकीं निक्की हेली का नाम बचपन में निमरता निक्की रंधावा था. 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति बने डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन में जगह पाने वाली वह भारतीय मूल की पहली राजनेता बनीं. इससे पहले वह दो बार साउथ कैरोलाइना की गवर्नर रह चुकी थीं. उनके पिता अजीत सिंह रंधावा और मां राजकौर रंधावा का संबंध पंजाब के अमृतसर जिले से है. शादी के बाद उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया.
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बॉबी जिंदल
भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक के रूप में सबसे पहले बॉबी जिंदल लुइजियाना के गवर्नर बने थे. इस तरह निक्की हेली अमेरिका में किसी राज्य की गवर्नर बनने वाली भारतीय मूल की दूसरी अमेरिकी नागरिक हुईं. जिंदल एक बार रिपब्लिकन पार्टी की ओर से अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए दावेदारी भी पेश कर चुके हैं. उनके माता पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे.
तस्वीर: picture-alliance/ZUMA Press
प्रीति पटेल
ब्रिटेन की पहली भारतीय मूल की गृह मंत्री बनीं पटेल हिंदू गुजराती प्रवासियों के परिवार से आती हैं. माता-पिता पहले अफ्रीका के युगांडा जाकर बसे थे जहां उनका जन्म हुआ. 1970 के दशक में उनका परिवार ब्रिटेन आकर बसा. 2010 में कंजर्वेटिव पार्टी से चुनाव जीतकर ब्रिटिश संसद पहुंची प्रीति पटेल खुद बाहर से आकर देश में शरण लेने के इच्छुकों के प्रति काफी सख्त रवैया रखती हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/PA Wire/S. Rousseau
अनीता आनंद
कनाडा की कैबिनेट में भारतीय मूल के लोगों की भरमार है. पब्लिक सर्विसेज एंड प्रोक्योरमेंट की केंद्रीय मंत्री अनीता इंदिरा आनंद कनाडा की कैबिनेट में शामिल होने वाली पहली हिंदू महिला हैं. इससे पहले वह टोरंटो विश्वविद्यालय में कानून की प्रोफेसर थीं. भारत से आने वाले इनके माता पिता मेडिकल पेशे से जुड़े रहे. मां स्वर्गीया सरोज राम अमृतसर से और पिता एसवी आनंद तमिलनाडु से आते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/empics/A. Wyld
नवदीप बैंस
ट्रूडो कैबिनेट में साइंस, इनोवेशन एंड इंडस्ट्री मंत्री नवदीप बैंस कनाडा के ओंटारियो प्रांत में जन्मे थे. सिख धर्म के मानने वाले इनके माता पिता भारत से वहां जाकर बसे थे. 2004 में केवल 26 साल की उम्र में उन्होंने अपना पहला चुनाव जीता और कनाडा की संसद में लिबरल पार्टी के सबसे युवा सांसद बने. अपने राजनीतिक करियर में बैंस ने हमेशा इनोवेशन को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने की दिशा में काम किया है.
तस्वीर: picture-alliance/empics/The Canadian Press/D. Kawai
हरजीत सज्जन
भारत के पंजाब के होशियारपुर में जन्मे हरजीत सज्जन इस समय कनाडा के रक्षा मंत्री हैं. कनाडा की सेना में लेफ्टिनेंट-कर्नल के रूप में सेवा दे चुके सज्जन इससे पहले 11 सालों तक पुलिस विभाग में भी काम कर चुके हैं. पंजाब में ही जन्मे नेता हरबंस सिंह धालीवाल 1997 में कनाडा की केंद्रीय कैबिनेट के सदस्य बनने वाले पहले भारतीय-कनाडाई थे.
तस्वीर: Reuters/C. Wattie
महेन्द्र चौधरी
दक्षिणी प्रशांत महासागर क्षेत्र में बसे द्वीपीय देश फिजी में भारतीय मूल के लोग ना केवल सांसद या मंत्री बल्कि देश के प्रधानमंत्री तक बने हैं. यहां की 38 फीसदी आबादी भारतीय मूल की ही है. लेबर पार्टी के नेता चौधरी को 1999 में देश का प्रधानमंत्री चुना गया. लेकिन एक साल के बाद ही एक सैन्य तख्तापलट से सरकार गिर गई. एक बार फिर 2006 के संसदीय चुनाव जीत कर वह वित्त मंत्री बने.
तस्वीर: Getty Images/R. Land
लियो वरादकर
2017 में आयरलैंड के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने लियो वरादकर कंजरवेटिव फिन गेल पार्टी से आते हैं. डब्लिन में पैदा हुए और पेशे से डॉक्टर वरादकर 2007 में पहली बार सांसद बने. 2015 में समलैंगिक विवाह पर आयरलैंड में हुए जनमत संग्रह के दौरान उन्होंने सार्वजनिक तौर पर घोषित किया कि वे खुद समलैंगिक हैं. उनके पिता अशोक मुंबई से आए एक डॉक्टर थे और आयरलैंड में मिरियम नाम की एक नर्स के साथ शादी कर वहीं बस गए.
तस्वीर: DW/G. Reilly
एंतोनियो कॉस्ता
पुर्तगाल के प्रधानमंत्री एंतोनियो कॉस्ता भारत में गोवा से ताल्लुक रखते हैं. 2017 में वह प्रवासी भारतीय सम्मान से नवाजे गए थे. खुद सोशलिस्ट विचारधारा के समर्थन कॉस्ता ज्यादा से ज्यादा प्रवासियों के अपने देश में आने का स्वागत करते हैं. पहले उनके पिता गोआ से मोजाम्बिक गए और फिर उनका परिवार पुर्तगाल में बसा.