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कब्र को अब तक है इंतजार

२४ मई २०१३

भारत की आजादी की पहली लड़ाई 1857 में मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में हुई. जफर की मौत बर्मा में हुई लेकिन दिल्ली की दो गज जमीन को अब भी उनका इंतजार है.

जफर की सरपरस्ती में हुआ आजादी का पहला संग्राम विफल भले ही रहा हो लेकिन इस दौरान कूटनीति और रणनीति का जो अद्भुत सामंजस्य दिखा, उससे आज की पीढ़ी को अवगत कराने के लिए सरकार हर साल मई का दूसरा सप्ताह जंगे आजादी की याद में मनाती है और इस दौरान सबसे ज्यादा याद की जाने वाली शख्सियत बेशक खुद जफर ही होते हैं.

सरकार अपने तरीके से उन्हें याद करती है, कहीं रंगमंच के जरिए जफर खुद अपना पैगाम नई पीढ़ी को देते हैं तो कहीं शेरो शायरी के शौकीन और खुद शायर रहे जफर की याद में मुशायरे भी होते हैं . इन सबके बीच एक गुमनाम विरासत ऐसी भी है जो औरों की नजरों से तो दूर है लेकिन जफर के बहुत करीब थी. इसे आज भी इसके मालिक का इंतजार है.

कहां है जफर महल

दिल्ली के जफर महल को बनवाया तो उनके पुरखों ने था लेकिन लाल किले से काफी दूर दिल्ली के दूसरे छोर पर शाही सैरगाह के लिए बनाए गए इस महल का निर्माण कार्य पूरा करने का श्रेय जफर को जाता है. पहले स्वतंत्रता संग्राम की तमाम रणनीति इसी महल में बनी और इस लिहाज से भी इसकी ऐतिहासिक अहमियत कम करके नहीं आंकी जा सकती. खंडहर में तब्दील होते के भीतर बनी तमाम कब्रों में से एक अधूरी कब्र को जफर का इंतजार है, जिसे दिल्ली मुहब्बत करने वाले बहादुर शाह जफर ने खुद बनवाया था.

आखिरी मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर

लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था. ब्रिटिश हुकुमत ने विदेशी पराधीनता को चुनौती देने वाले बादशाह की मुहिम को नाकाम कर जफर को देश निकाला देते हुए बर्मा (म्यांमार) के रंगून शहर भेज दिया . बूढ़े बादशाह ने जिंदगी का आखिरी दौर यहीं गुजारते हुए 1863 में अंतिम सांस ली.

सीने में दबी हसरत

इतिहासकारों की मानें तो जफर ने उसी वतन की मिट्टी में खाक होने की हसरत पाली थी जिसकी आन की खातिर पूरी ज़िन्दगी खपा दी. लेकिन यह तमन्ना अधूरी रहती देख रंगून में ही जफर ने अपने जज्बातों को कलम के जरिए बयां किया,

कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए

के दो गज जमीं भी न मिली कूहे यार में

बादशाह की यह तड़प जफर महल की उसी कब्र की दो गज जमीन के लिए रही, जिसे उन्होंने अपने जीते जी बनवाया था. अतीत की इस अमूल्य धरोहर को बचाने और जफर की अंतिम दौर की कुछ निशानियों को रंगून से भारत लाने की मुहिम चल रही है. जस्टिस राजेंद्र सच्चर की अगुवाई में इस मुहिम का आगाज कर सरकार से निशानियां भारत मंगाने की मांग की जा रही है. सच्चर के अलावा भारत के वरिष्ठ डॉक्टर अनूप सराया और पत्रकार कुलदीप नैयर सहित बुद्धिजीवियों ने एकजुट होकर सरकार से इसकी मांग की है.

भारत करे प्रयास

गांधीवादी चिंतक निर्मला देशपांडे ने रंगून में मौजूद जफर की मजार की मिट्टी भारत लाकर दिल्ली में उनकी अधूरी मजार पूरी करने की मांग रखते हुए पहले स्वाधीनता संग्राम के आयोजनों में पाकिस्तान और बांग्लादेश को शामिल करने का सुझाव दिया है.

सराया का कहना है कि 2006 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में जफर की निशानियों को वापस लाने और पहले स्वाधीनता संग्राम के अमर शहीदों की विरासत संजोने की कार्ययोजना बनाई गई थी, लेकिन आज तक उस पर अमल नहीं हुआ. जिस समय जफर को निर्वासित कर रंगून भेजा गया, उसी समय बर्मा के मांडले के राजा को भी निर्वासित कर महाराष्ट्र के रत्नागिरी भेजा गया था. हाल ही में म्यांमार सरकार ने भारत सरकार से अपने निर्वासित राजा की निशानियां वापस मांगी है. सराया का कहना है की सरकार को इस मौके का फायदा उठाते हुए जफर की निशानियों को भी भारत लाने की रुकी पड़ी प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए.

सरकार का भी मानना है की जफर न सिर्फ भारत की आजादी की पहचान थे बल्कि हिन्दू मुस्लिम एकता के भी प्रमाण थे. जफर ने कौमी एकता की मिसाल पेश करते हुए महल के पास के सूफी संत बख्तियार काकी की मजार से योगमाया मंदिर तक फूल वालों की सैर का आयोजन कर सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश दिया था, जो आज भी जारी है.

सवाल सिर्फ दो गज जमीन की ख्वाहिश का नहीं, बल्कि उस धरोहर के संरक्षण का है जिसका तीन चौथाई हिस्सा प्रशासनिक उदासीनता के चलते आज दबंगों के हाथ चला गया है.

ब्लॉगः निर्मल यादव, दिल्ली

संपादनः अनवर जे अशरफ

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