भारत और पाकिस्तान के बीच संदेह और अविश्वास का वही पुराना पर्दा पड़ा है. वक्त बीतने के साथ उसे छीज जाना था लेकिन वो और सख्त और कड़ा होता जा रहा है. दो पड़ोसियों की तल्खियां घर से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मंच तक कायम हैं.
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दुनिया के अधिकांश हिस्सों में बेशक तनाव, हिंसा, युद्ध, संदेह और बरबादी के हालात बने हुए हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र एक ऐसी जगह बना हुआ है जहां दुनिया के झंझावातों से बेअसर नेता अपनी ढपली अपना राग बजाकर अपनी अपनी राह चल पड़ते हैं. एक बार फिर ऐसा ही देखने में आया जब भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों की कड़वाहटें संयुक्त राष्ट्र के मंच पर नुमायां हुई. भारत ने पाकिस्तान को फटकारा तो पाकिस्तान ने पलटवार करने में देर नहीं की. सीमा पार आतंकवाद, सीमा पर गोलीबारी, सीमा उल्लंघन, कश्मीर का मुद्दा, ये सब बातें आरोप प्रत्यारोप बनकर फिर से उभरीं, इन मुद्दों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा गया, 193 देशों के मंच संयुक्त राष्ट्र ने सब सुना, तालियां बजीं, चिंताएं उठीं, बातें नोट की गईं, दस्तावेज बने, संयुक्त राष्ट्र का कार्यालय व्यस्त हुआ और इस तरह एक रस्मअदायगी हुई.
दुनिया की सबसे कड़ी सीमाएं
धरती के सीने पर खींची गई सरहदें कई बार देशों के साथ साथ दिलों को भी बांट देती हैं. दुनिया के कुछ ऐसे ही कठोर बॉर्डर...
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पाकिस्तान-भारत: 'लाइन ऑफ कंट्रोल'
1947 में ब्रिटिश शासकों से मिली आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध 1949 तक चला था. तभी से कश्मीर इलाके को दोनों देशों के बीच एक लाइन ऑफ कंट्रोल से बांटा गया. मुस्लिम-बहुल आबादी वाला पाकिस्तान अधिशासित हिस्सा और हिन्दू, बौद्ध आबादी वाला भारत का कश्मीर. इस लाइन के दोनों ओर पूरे कश्मीर को हासिल करने का संघर्ष आज भी जारी है. 1993 से अब तक यहां हुई हिंसा में 43,000 लोग मारे जा चुके हैं.
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सर्बिया-हंगरी: बाल्कन रूट के केंद्र में
2015 के शरणार्थी संकट के प्रतीक बन चुके हैं ऐसे दृश्य. सर्बिया और हंगरी के बीच बिछी रेल की पटरियों पर चलकर यूरोप में आगे का सफर करते लोग. सितंबर में इस क्रासिंग को बंद कर दिया गया लेकिन यूरोप के भीतर खुली सीमा होने के कारण ऐसे और रूटों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
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कोरिया का अंधा पुल
पिछले 62 सालों से दक्षिण और उत्तर कोरिया के बीच की सीमा बंद है और उस पर कड़ा सैनिक पहरा रहता है. दक्षिण कोरिया की तरफ से जाते हुए अगर आपको ऐसा साइन बोर्ड दिखे तो वहां से आगे बढ़ने के बाद आप वापस इस तरफ नहीं आ सकेंगे. 1990 के दशक के अंत से करीब 28,000 उत्तर कोरियाई अपनी सीमा पार कर दक्षिण कोरिया में आ चुके हैं.
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अमेरिका-मैक्सिको का लंबा बॉर्डर
मैक्सिको से लगी इस सीमा को अमेरिकी "टॉर्टिया वॉल" कहते हैं. यहां दीवार और बाड़ खड़ी कर करीब 1126 किलोमीटर लंबा बॉर्डर खड़ा किया गया है. पूरी पृथ्वी में इतनी कड़ी निगरानी वाली कोई दूसरी सीमा नहीं है. यहां करीब 18,500 अधिकारी बॉर्डर सुरक्षा में तैनात हैं.
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हर दिन 700 को देश निकाला
कड़ी सुक्षा व्यवस्था के बावजूद गैरकानूनी तरीके से मैक्सिको से अमेरिका जाने वाले प्रवासियों की संख्या काफी बड़ी है. केवल 2012 में ही लगभग 67 लाख लोगों ने सीमा पार की. हर दिन ऐसी कोशिश करने वाले करीब 700 लोग मैक्सिको वापस लौटाए जाते हैं.
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मोरक्को-स्पेन: गरीबी और गोल्फ कोर्स
मोरक्को से लगे स्पेन के दो एन्क्लेव मेलिया और सिउटा को लोग यूरोप पहुंचने का रास्ता मानते हैं. अफ्रीका के कई देशों से लोग अच्छे जीवन की तलाश में इसी तरफ से यूरोप पहुंच कर शरण मांगने की योजना बनाते हैं. कई लोग सीमा पर बड़ी बाड़ों को चढ़ कर पार करने की कोशिश करते हैं.
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ब्राजील-बोलीविया: हरियाली किधर?
उपग्रह से मिले चित्र दिखाते हैं कि वनों की अंधाधुंध कटाई के कारण ब्राजील के अमेजन के जंगल काफी कम हो गए हैं. पिछले पचास सालों में जंगलों के क्षेत्रफल में करीब 20 फीसदी कमी आई है. हालांकि अब बोलीविया में भी वनों की कटाई एक बड़ी समस्या बन कर उभर रही है.
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हैती-डोमिनिक गणराज्य: एक द्वीप, दो विश्व
देखिए एक ही द्वीप पर स्थित दो देश इतने अलग भी हो सकते हैं. डोमिनिक गणराज्य पर्यटकों की पसंद रहा है जबकि हैती दुनिया के सबसे गरीब देशों में शामिल है. बेहतर जीवन की तलाश में हैती से कई लोग डोमिनिक गणराज्य जाना चाहते हैं. बढ़ती मांग को देखते हुए 2015 में डोमिनिक गणराज्य ने आप्रवास के नियम सख्त किए हैं. तबसे करीब 40,000 हैतीवासी अपने देश वापस लौटे हैं.
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मिस्र-इस्राएल: एक तनावपूर्ण शांति
एक ओर रेगिस्तान तो दूसरी ओर घनी आबादी - यह सीमा मिस्र की मुस्लिम-बहुल और इस्राएल की यहूदी-बहुल आबादी के बीच खिंची है. करीब 30 सालों से चली आ रही शांति के बाद हाल के समय में सीमा पर कुछ हिंसक वारदातों और कड़ी सैनिक निगरानी की खबर आई है. 2013 के अंत तक इस्राएल ने इस सीमा पर बाड़ लगाने का काम पूरा कर लिया था.
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तीन देश, एक सीमा
दुनिया के कुछ हिस्सों में सीमाओं पर कोई दीवार, बाड़ या सैनिक निगरानी नहीं होती. जर्मनी, ऑस्ट्रिया और चेक गणराज्य की इस सीमा पर एक तीन-तरफा पत्थर इसका सूचक है. शेंगेन क्षेत्र के इन तीनों देशों के बीच खुली सीमाएं हैं. फिलहाल शरणार्थी संकट के चलते यहां अस्थाई बॉर्डर कंट्रोल लगाना पड़ा है.
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इस्राएल-वेस्ट बैंक: पत्थर की दीवार
साल 2002 से इस 759 किलोमीटर लंबी सीमा पर विवादित दीवारें और बाड़ें बनाई गई हैं. येरुशलम के इस घनी आबादी वाले क्षेत्र (तस्वीर) में दोनों के बीच कंक्रीट की नौ मीटर ऊंची दीवार बनाई गई है. 2004 में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने फलिस्तीनी क्षेत्र में दीवार खड़ी करने को अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया.
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बहुत दूर है बातचीत की मेज
भारत और पाकिस्तान आपस में किसी भी स्तर पर बात करने को तैयार नहीं दिखते. दोनों पड़ोसियों के बीच विश्वास बहाली का न कोई जरिया दिखता है न ही कोई कोशिश. सब मान बैठे हैं जैसा चल रहा है चलने दो. जबसे नरेंद्र मोदी ने भारत में और पाकिस्तान में नवाज शरीफ ने कमान संभाली है, बात एक बार फिर उस अंधकार में घिर गई लगती है, जो दोनों देशों के आपसी भरोसे पर विभाजन के बाद से ही मंडराता रहा है. दोनों देशों में संवादहीनता और यकीन की कितनी भारी कमी है, इसका ताजा उदाहरण राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की हालिया बातचीत का रद्द हो जाना है, जो बस जब शुरू होने ही जा रही थी कि रोक दी गई. बातचीत की मेज पर आना जैसे न जाने कितने सागरों, खाइयों और पहाड़ों को लांघना हो गया है. चंद घंटों की दूरी पर रहने वाले दो देशों की एक दूसरे के प्रति ऐसी बेरुखी हैरान तो करती ही थी, अब दोनों देशों के आम अवाम में सवाल भी पैदा कर रही है कि आखिर कहां कौनसा पेंच है जो बातचीत के नाम पर ही एक बड़ी कील की तरह फंस जाता है.
सुंदरता और संघर्ष का नाम कश्मीर
शायर कश्मीर को दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह कहते हैं और विश्लेषक उसे सबसे ज्यादा सैनिकों से पटी खतरनाक जगह. इन विरोधाभासों के बावजूद क्या है असली कश्मीर.
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बहुसंस्कृति
कश्मीर को कभी बहुसांस्कृतिक माहौल के लिए भी जाना जाता था. कश्मीर में मुस्लिम बहुल आबादी, जम्मू में हिन्दू और लद्दाख में बौद्ध. कश्मीर की संस्कृति में इनका मिला जुला असर दिखता है. हिंसा ने बहुसंस्कृति पर भी असर डाला.
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केसर
महकता केसर कश्मीर की पहचान है. ईरान और स्पेन के बाद भारत केसर का सबसे बड़ा निर्यातक है. कश्मीर में इसका इस्तेमाल कई व्यंजनों और कहवे में किया जाता है.
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फूलों की चादर
कश्मीर घाटी फूलों के लिए भी मशहूर है. बीते साल करीब 11 लाख सैलानी ट्यूलिप के बागों से भरे जम्मू कश्मीर को देखने पहुंचे. इनमें 50 हजार विदेशी पर्यटक थे.
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हिमाच्छादित कश्मीर
सर्दियों में कश्मीर का बड़ा इलाका बर्फ से ढक जाता है. विंटर स्पोर्ट्स के लिए यहां की कई जगहें एकदम मुफीद हैं. लेकिन अच्छे आधारभूत ढांचे की कमी और हिंसा के चलते इसकी संभावनाएं पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पाई हैं.
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नदियां
हिमालय की गोद में बसे जम्मू कश्मीर से 20 से ज्यादा नदियां निकलती हैं. इनमें सिंधु, नीलम और रावी प्रमुख हैं. ये बड़ी नदियां भारत से निकलकर पाकिस्तान जाती हैं और इसलिए विवाद के केंद्र में भी हैं.
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लकड़ी
कश्मीर की लकड़ी बेहद उम्दा किस्म की मानी जाती है. क्रिकेट बैट के लिए कश्मीर विलो को सबसे अच्छा माना जाता है. कश्मीर की लकड़ी नाव और फर्नीचर के लिए भी मुफीद मानी जाती है.
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सूफियाना
भारतीय उपमहाद्वीप में गायकी की सूफी परंपरा कश्मीर से ही फैली. रहस्यवाद और मानवता का संदेश देने वाली सूफी गायकी अब भारत और पाकिस्तान में खासी लोकप्रिय है.
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फिल्मों की शूटिंग
1980 के दशक तक कश्मीर घाटी फिल्मों की शूटिंग के लिए भी मशहूर थी. बॉलीवुड के कई सुपरहिट गाने कश्मीर की वादियों से ही निकले. लेकिन 1990 के दशक में हिंसा की मार पड़ी. हाल के सालों में इक्का दुक्का फिल्मों की शूटिंग हुई है.
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सबसे ऊंचा रणक्षेत्र
भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद 1948 से चला आ रहा है. 5,753 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा रणक्षेत्र है.
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दोनों देशों का अड़ियल रवैया
भारत और पाकिस्तान के बीच तीन युद्ध हो चुके हैं. कश्मीर मामला नाक का सवाल बना हुआ है, सख्त और कट्टर सेना के अलावा राजनैतिक स्तर पर भी चुनौतियों से निपटने में नवाज शरीफ की कमजोरियां और मजबूरियां एक बार फिर दिखने लगी हैं, इधर भारत में संघ की वैचारिकी तले शासन कर रही बीजेपी, अपने कट्टर और धुर राष्ट्रवाद को बनाए रखने के लिए पाकिस्तान के साथ जबानी जंग में जुटी है. बातचीत के लिए या आपसी सौहार्द के लिए कोई सूरत निकलने से पहले गतिरोध पनपने लगते हैं. लगता है दोनों देशों का अड़ियल रवैया दोनों देशों की हुकूमतों की सामरिकता भी है. जो संबंध सुधारने से ज्यादा अपने अपने तात्कालिक और स्थायी लक्ष्यों को इंगित है. आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान स्थायी इंकार की मुद्रा अपनाए हुए है कि वो उसे किसी भी तरह का सपोर्ट देता रहा है. इधर भारत भी एक सख्त लाइन लेकर इस बात पर अड़ गया है कि बात होगी तो आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर ही.
कब टूटेगा यह तनाव?
दोनों देशों के भूगोलों, समाजों और सीमाओं से होता हुआ यह आपसी तनाव संयुक्त राष्ट्र तक दिख जाता है. अब सवाल यही है कि यह तनाव कब टूटेगा? ऐसी कौनसी कूटनीतिक सामर्थ्य या ऐसा कौनसा कूटनीतिक विवेक होगा जिसे दोनों देशों के हुक्मरान और नौकरशाह ठीक से समझ लें और उन पर अमल करें? दोनों देशों की सत्ताओं के घरेलू दबाव उन्हें मित्रता बरतने से रोक रहे हैं, ऐसे में नई शुरुआत की तत्काल जरूरत है. अब ये नई शुरुआत नागरिक बिरादरी के स्तर पर हो या सांस्कृतिक स्तर पर या विशुद्ध राजनीतिक स्तर पर, यह तय करने का काम भी सरकारों का है. क्योंकि दोनों देशों को यह समझना ही होगा कि दक्षिण एशियाई शांति और स्थिरता के लिए उनका एक दूसरे से जुड़े रहना अनिवार्य है. इस अनिवार्यता को किसी भी कीमत पर खारिज नहीं किया जा सकता है.