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केंद्र की मायावती पर नजर

९ अक्टूबर २०१२

लोकसभा चुनाव वक्त से पहले होने के कयास लगा कर मायावती ने दिल्ली की राजनीति गर्मा दी है. केंद्र सरकार की नजरें बहनजी पर लग गई हैं कि उनका अगला कदम क्या होता है.

तस्वीर: DW

चुपचाप केंद्र सरकार को समर्थन दे रही मायावती अचानक मनमोहन सरकार की उदारवादी आर्थिक नीतियों के विरोध में खड़ी हो गई हैं. रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दिए जाने के बाद पहली बार जब उन्होंने जनता का सामना किया, तो सारा गुस्सा केंद्र सरकार पर निकाला. मायावती ने सलाह दी कि डीजल और गैस की कीमतें बढ़ा कर आम आदमी पर बोझ डालने की जगह सरकार को धन्ना सेठों को निशाना बनाना चाहिए.

बीएसपी के संस्थापक कांशीराम की छठी पुण्यतिथि पर लखनऊ में विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए मायावती ने कहा, "विलासिता की चीजों के दाम बढ़ा कर अर्थव्यवस्था ठीक करने की जगह केंद्र सरकार आम आदमी की कमर तोड़ने में लगी है."

संकल्प महारैली को संबोधित करते हुए बीएसपी की सुप्रीमो मायावतीतस्वीर: DW

बीजेपी पर निशाना

उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी में छत्तीस का आंकड़ा है. लेकिन मायावती कांग्रेस के साथ साथ बीजेपी पर भी निशाना साधने में देर नहीं करतीं. उनका दावा है कि कांग्रेस और बीजेपी में अंदरूनी साठगांठ है. राज्य विधानसभा चुनाव हारने की टीस मायावती भूल नहीं पाई हैं. उनका कहना है कि मुलायम सिंह की जीत इसलिए हुई क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी ने उन्हें (मायावती) हराने की साजिश रच ली थी, "इन दोनों बड़ी पार्टियों ने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों के खिलाफ कमजोर उम्मीदवार उतारे."

लखनऊ के रमाबाई पार्क में मायावती की इस रैली में लगभग सात लाख लोगों ने हिस्सा लिया. राजनीति के जानकारों का कहना है कि विपक्ष की किसी नेता के लिए यह एक बहुत बड़ी संख्या है. समाजशास्त्री प्रोफेसर राजेश मिश्र कहते हैं, "मायावती हर चुनाव से पहले अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती हैं. रैलियां कांशीराम के दौर से ही बीएसपी की ताकत रही है क्योंकि मायावती सीधे जनता से नहीं मिलतीं."

मिश्र का कहना है कि "आधार वोट बैंक से मिलने" का मायावती का यही तरीका है. रैली में लोकसभा चुनाव को वक्त से पहले हो जाने का कयास लगा कर और केंद्र सरकार पर निशाना साध कर मायावती ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि वह अब खामोशी से तो यूपीए का साथ नहीं देने वाली हैं.

तस्वीर: DW

मुसलमानों पर नजर

सत्ता से हटने के बाद मायावती की यह पहली बड़ी रैली रही, जिसमें अनुमान से ज्यादा लोगों ने शिरकत की. इस दौरान बीएसपी सुप्रीमो ने कई बार दावा किया कि काफी संख्या में मुसलमान लोग भी शामिल हुए हैं. मुसलमानों को रिझाते हुए मायावती ने कहा, "समाजवादी पार्टी ने घोषणापत्र में उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी के हिसाब से उन्हें 18 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था लेकिन अभी तक कुछ नहीं किया."

मायावती का आरोप है कि सात महीने के अंदर यूपी में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया है. उनका कहना है कि इस दौरान डेढ़ दर्जन दंगे हो चुके हैं, जबकि "बीएसपी के कार्यकाल में सांप्रदायिक तौर पर अमन था."

पार्टी का जलवा

दलित राजनीति करने वाली मायावती जिन दिनों सत्ता में थीं, उनका अलग रुतबा था. लेकिन उनकी रैलियों में इस तरह की भीड़ नजर नहीं आती थी. मंगलवार की रैली में देश के अलग अलग हिस्सों से लोग आए.

रिपोर्टः एस वहीद, लखनऊ

संपादनः ए जमाल

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