कोरियाई युद्ध की सत्तरवीं बरसी पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने सेना को संबोधित करते हुए उन्हें "हमलावरों" से सावधान किया. कोरियाई युद्ध इतिहास का अकेला ऐसा मौका है जब चीनी सेना के सामने अमेरिका की सेना थी.
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शी जिनपिंग ने चीनी सेना की वीरगाथाओं का जिक्र करते हुए उनमें देशभक्ति का भाव मजबूत करने की कोशिश की. 1950-53 के बीच चले युद्ध को उन्होंने इस बात की निशानी कहा कि यह देश उस ताकत से लड़ने के लिए तैयार है जो, "चीन के दरवाजे पर.... मुश्किल पैदा करेगा." चीन युद्ध की बरसियों का इस्तेमाल नए चीन की सैन्य ताकत से अमेरिका को परोक्ष रूप से धमकाने के लिए करता है.
चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए कोरियाई युद्ध वो कहानी है जिसने उसे अपनी जड़ें जमाने में मदद दी. इस युद्ध की 70वीं बरसी ऐसे दौर में मनाई जा रही है जब अमेरिका के साथ कारोबारी और तकनीक के लिए मुकाबलेबाजी, मानवाधिकार और ताइवान को लेकर पार्टी पर दबाव है. चीन ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है.
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अमेरिका का नाम लिए बगैर शी जिनपिंग ने कोरियाई युद्ध की ऐतिहासिक घटनाओं की मदद से मौजूदा दौर में "एकाधिकारवाद, संरक्षणवाद और चरम अहंकार" पर निशाना साधा. शी ने ताली बजाते दर्शकों के सामने कहा,"चीन के लोग समस्या पैदा नहीं करते, ना ही हम उनसे डरते हैं. हम कभी अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का नुकसान हाथ पर हाथ धरे नहीं देख सकते...और हम कभी भी किसी ताकत को हम पर हमला करने और हमारी मातृभूमि के पवित्र इलाके को बांटने नहीं देंगे." बुधवार को अमेरिकी रक्षा विभाग ने ताइवान को एक अरब डॉलर से ज्यादा कीमत के हथियार बेचने की मंजूरी दी है. चीन और अमेरिका के बीच विवाद को इस घोषणा ने और हवा दे दी है.
कोरियाई युद्ध पहली और अब तक की इकलौती घटना है जब चीन और अमेरिका की सेना बड़े पैमाने पर एक दूसरे से सीधे लड़ीं. चीन की सरकार के मुताबिक तीन साल चली जंग में 197,000 से ज्यादा चीनी सैनिक मारे गए. इस युद्ध में अमेरिका के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्र के गठबंधन की सेना 38वीं समानांतर रेखा के पार जाने पर मजबूर हुई. दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच आज यही रेखा सीमा का काम करती है. उत्तर कोरिया के साथ चीन की कम्युनिस्ट सेना के आने की वजह से ऐसा हुआ. इस युद्ध को चीन में विजय की तरह देखा जाता है. इसे एक ज्यादा उन्नत दुश्मन के खिलाफ उनके प्रतिरोध और साहस का उदाहरण भी माना जाता है.
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कुआलालंपुर की मलय यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पढ़ाने वाले डॉ राहुल मिश्र का कहना है कि जिनपिंग का भाषण कोरिया से ज्यादा चीन की अपनी सामरिक और कूटनीतिक चुनौतियों की ओर इशारा करता है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "इस भाषण को अमेरिका और चीन के बीच शीत युद्ध की शुरुआत तो नहीं कह सकते लेकिन पिछले बयानों के मुकाबले इस बार शी जिनपिंग की अमेरिका को लेकर तल्खी काफी ज्यादा थी. इस बयान से यह भी साफ है कि अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव का पहला प्रमुख सामरिक थियेटर कोरिया प्रायद्वीप ही बनेगा."
इस हफ्ते चीन के ग्लोबल टाइम्स में छपे एक संपादकीय में लिखा गया है, "जब चीन बेहद गरीब था, तब वह अमेरिकी दबाव के आगे नहीं झुका. आज चीन एक मजबूत देश के रूप में उभरा है तो चीन के पास कोई वजह नहीं है कि वह अमेरिका की धमकी और दमन से भयभीत हो." बीते कई दशकों में पहली बार चीन और अमेरिका के बीच तनाव जोरों पर है. ऐसे में चीन कोरियाई युद्ध की बरसी का इस्तेमाल एक तरफ अंतरराष्ट्रीय प्रतिद्वंद्वियों को चेतावनी देने के साथ ही घरेलू विरोध का दमन करने के लिए भी करना चाहता है.
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चीन की सरकारी मीडिया युद्ध में शामिल हुए और जिंदा बचे लोगों के इंटरव्यू प्राइम टाइम में दिखा रही है और अपना प्रचार कर रही है. शुक्रवार को चीन के सिनेमाघरों में "सैक्रिफाइस" फिल्म दिखाई गई जो चीनी सिनेमा के तीन बड़े नामों ने बनाई है. इसमें चीनी सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी के कोरियाई युद्ध के अंतिम दिनों में अमेरिकी सैनिकों को रोकने की कहानी है.
यूरोपियन यूनियन इंस्टीट्यूट फॉर सिक्योरिटी स्टडीज की चीन विशेषज्ञ एलिस एकमान का कहना है, "इसे अमेरिका को सीधे संदेश के तौर पर देखा जाना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं है. शी युद्ध की भावना का बड़े अर्थों में आह्वान कर रहे हैं."
चीन और उत्तर कोरिया ने बीते दो सालों में रिश्ते सुधारने पर काफी काम किया है. परमाणु हथियारों की वजह से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों पर चीन के समर्थन के बाद दोनों देशों के रिश्ते में खटास आ गई थी. मार्च 2018 के बाद शी और उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन पांच बार मिल चुके हैं. उधर अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच बातचीत रुकी हुई है. चीन की रेनमिन यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय राजनीति पढ़ाने वाले प्रोफेसर शी यिनहोंग कहते हैं कि बरसी मना कर, "चीन अमेरिका को बता रहा है कि वह ना पहले उससे डरता था और ना अब उससे डरता है. यह अमेरिका के साथ सीमित सैन्य विवाद की तैयारी है."
एनआर/एमजे (एएफपी)
कैसे अमेरिका को चुनौती देने वाली महाशक्ति बन गया चीन
सोवियत संघ के विघटन के बाद से अमेरिका अब तक दुनिया की अकेली महाशक्ति बना रहा. लेकिन अब चीन इस दबदबे को चुनौती दे रहा है. एक नजर बीते 20 साल में चीन के इस सफर पर.
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मील का पत्थर, 2008
2008 में जब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था आर्थिक मंदी से खस्ताहाल हो रही थी, तभी चीन अपने यहां भव्य तरीके ओलंपिक खेलों का आयोजन कर रहा था. ओलंपिक के जरिए बीजिंग ने दुनिया को दिखा दिया कि वह अपने बलबूते क्या क्या कर सकता है.
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मंदी के बाद की दुनिया
आर्थिक मंदी के बाद चीन और भारत जैसे देशों से वैश्विक अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की उम्मीद की जाने लगी. चीन ने इस मौके को बखूबी भुनाया. उसके आर्थिक विकास और सरकारी बैंकों ने मंदी को संभाल लिया.
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ग्लोबल ब्रांड “मेड इन चाइना”
लोकतांत्रिक अधिकारों से चिढ़ने वाले चीन ने कई दशकों तक बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में खूब संसाधन झोंके. इन योजनाओं की बदौलत बीजिंग ने खुद को दुनिया का प्रोडक्शन हाउस साबित कर दिया. प्रोडक्शन स्टैंडर्ड के नाम पर वह पश्चिमी उत्पादों को टक्कर देने लगा.
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मध्य वर्ग की ताकत
बीते दशकों में जहां, दुनिया के समृद्ध देशों में अमीरी और गरीबी के बीच खाई बढ़ती गई, वहीं चीन अपने मध्य वर्ग को लगातार बढ़ाता गया. अमीर होते नागरिकों ने चीन को ऐसा बाजार बना दिया जिसकी जरूरत दुनिया के हर देश को पड़ने लगी.
चीन के आर्थिक विकास का फायदा उठाने के लिए सारे देशों में होड़ सी छिड़ गई. अमेरिका, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और ब्रिटेन समेत तमाम अमीर देशों को चीन में अपने लिए संभावनाएं दिखने लगीं. वहीं चीन के लिए यह अपने राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव को विश्वव्यापी बनाने का अच्छा मौका था.
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पश्चिम के दोहरे मापदंड
एक अरसे तक पश्चिमी देश मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चीन की आलोचना करते रहे. लेकिन चीनी बाजार में उनकी कंपनियों के निवेश, चीन से आने वाली मांग और बीजिंग के दबाव ने इन आलोचनाओं को दबा दिया.
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शी का चाइनीज ड्रीम
आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर हो चुके चीन से बाकी दुनिया को कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन 2013 में शी जिनपिंग के चीन का राष्ट्रपति बनने के बाद नजारा बिल्कुल बदल गया. शी जिनपिंग ने पहली बार चीनी स्वप्न को साकार करने का आह्वान किया.
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शुरू हुई चीन से चुभन
आर्थिक विकास के कारण बेहद मजबूत हुई चीनी सेना अब तक अपनी सीमा के बाहर विवादों में उलझने से बचती थी. लेकिन शी के राष्ट्रपति बनने के बाद चीन ने सेना के जरिए अपने पड़ोसी देशों को आँखें दिखाना शुरू कर दिया. इसकी शुरुआत दक्षिण चीन सागर विवाद से हुई.
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लुक्का छिप्पी की रणनीति
एक तरफ शी और दूसरी तरफ अमेरिका में बराक ओबामा. इस दौरान प्रभुत्व को लेकर दोनों के विवाद खुलकर सामने नहीं आए. दक्षिण चीन सागर में सैन्य अड्डे को लेकर अमेरिकी नौसेना और चीन एक दूसरे चेतावनी देते रहे. लेकिन व्यापारिक सहयोग के कारण विवाद ज्यादा नहीं भड़के.
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कमजोर पड़ता अमेरिका
इराक और अफगानिस्तान युद्ध और फिर आर्थिक मंदी, अमेरिका आर्थिक रूप से कमजोर पड़ चुका था. चीन पर आर्थिक निर्भरता ने ओबामा प्रशासन के पैरों में बेड़ियों का काम किया. चीन के बढ़ते आक्रामक रुख के बावजूद वॉशिंगटन कई बार पैर पीछे खींचता दिखा.
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संघर्ष में पश्चिम और एकाग्र चीन
एक तरफ जहां चीन दक्षिण चीन सागर में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा था, वहीं यूरोप में रूस और यूरोपीय संघ बार बार टकरा रहे थे. 2014 में रूस ने क्रीमिया को अलग कर दिया. इसके बाद अमेरिका और उसके यूरोपीय साझेदार रूस के साथ उलझ गए. चीन इस दौरान अफ्रीका में अपना विस्तार करता गया.
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इस्लामिक स्टेट का उदय
2011-12 के अरब वसंत के कुछ साल बाद अरब देशों में इस्लामिक स्टेट नाम के नए आतंकवादी गुट का उदय हुआ. अरब जगत के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने पश्चिम को सैन्य और मानवीय मोर्चे पर उलझा दिया. पश्चिम को आईएस और रिफ्यूजी संकट से दो चार होना पड़ा.
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वन बेल्ट, वन रोड
2016 चीन ने वन बेल्ट वन रोड परियोजना शुरू की. जिन गरीब देशों को अपने आर्थिक विकास के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कड़ी शर्तों के साथ कर्ज लेना पड़ता था, चीन ने उन्हें रिझाया. चीन ने लीज के बदले उन्हें अरबों डॉलर दिए और अपने विशेषज्ञ भी.
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हर जगह चीन ही चीन
चीन बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट सहारे अफ्रीका, दक्षिण अमेरका, पूर्वी एशिया और खाड़ी के देशों तक पहुचना चाहता है. इससे उसकी सीधी पहुंच पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह तक भी होगी और अफ्रीका में हिंद और अटलांटिक महासागर के तटों पर भी.
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सीन में ट्रंप की एंट्री
जनवरी 2017 में अरबपति कारोबारी डॉनल्ड ट्रंप ने अमेरिका के नए राष्ट्रपति का पद संभाला. दक्षिणपंथी झुकाव रखने वाले ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट का नारा दिया. ट्रंप ने लुक्का छिप्पी की रणनीति छोड़ते हुए सीधे चीन टकराने की नीति अपनाई. ट्रंप ने आते ही चीन के साथ कारोबारी युद्ध छेड़ दिया.
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पड़ोसी मुश्किल में
जिन जिन पड़ोसी देशों या स्वायत्त इलाकों से चीन का विवाद है, चीन ने वहाँ तक तेजी से सेना पहुंचाने के लिए पूरा ढांचा बैठा दिया. विएतनाम, ताइवान और जापान देशों के लिए वह दक्षिण चीन सागर में है. और भारत के लिए नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका में.
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सहयोगियों में खट पट
चीन की बढ़ते वर्चस्व को रोकने के लिए ट्रंप को अपने यूरोपीय सहयोगियों से मदद की उम्मीद थी, लेकिन रक्षा के नाम पर अमेरिका पर निर्भर यूरोप से ट्रंप को निराशा हाथ लगी. नाटो के फंड और कारोबारियों नीतियों को लेकर मतभेद बढ़ने लगे.
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दूर बसे साझेदार
अब वॉशिंगटन के पास चीन के खिलाफ भारत, ब्रेक्जिट के बाद का ब्रिटेन, जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे साझेदार हैं. अब अमेरिका और चीन इन देशों को लेकर एक दूसरे से टकराव की राह पर हैं.
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कोरोना का असर
चीन के वुहान शहर ने निकले कोरोना वायरस ने दुनिया भर में जान माल को भारी नुकसान पहुंचाया. कोरोना ने अर्थव्यवस्थाओं को भी चौपट कर दिया है. अब इसकी जिम्मेदारी को लेकर विवाद हो रहा है. यह विवाद जल्द थमने वाला नहीं है.
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चीन पर निर्भरता कम करने की शुरुआत
अमेरिका समेत कई देश यह जान चुके हैं कि चीन को शक्ति अपनी अर्थव्यवस्था से मिल रही है. इसके साथ ही कोरोना वायरस ने दिखा दिया है कि चीन ऐसी निर्भरता के क्या परिणाम हो सकते हैं. अब कई देश प्रोडक्शन के मामले में दूसरे पर निर्भरता कम करने की राह पर हैं.