भारत में विपक्षी दल और मीडिया में अंग्रेजों के जमाने के देशद्रोह से जुड़े कानून को खत्म करने की मांग उठ रही है. यह वही कानून है जिसके तहत जेएनयू के छात्र कन्हैया कुमार और उनके दोस्तों पर आरोप लगाए गए हैं.
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पुलिस ने 1870 में बने इस कानून के तहत 10 लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है. पुलिस का कहना है कि 2016 में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक सभा के दौरान भारत विरोधी नारे लगाए गए. छात्र इन आरोपों से इनकार करते हैं. इन छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर आम चुनाव से पहले हिंदू राष्ट्रवादियों को खुश करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बंदिश लगाने की कोशिश करने का आरोप लगाया है.
कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का कहना है, "आज के दौर में देशद्रोह कानून की जरूरत नहीं है, यह औपनिवेशिक दौर का कानून है. बहुत से लोगों पर सिर्फ सरकार के खिलाफ बोलने या फिर ट्वीट करने के लिए देशद्रोह के आरोप लगाए जा रहे हैं, केंद्र सरकार नागरिकों पर नियंत्रण के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है."
2016 में कन्हैया कुमार को गिरफ्तार किया गया था फिलहाल वो जमानत पर हैं.तस्वीर: Reuters
2016 में जेएनयू की सभा में छात्र नेता कन्हैया कुमार भी शामिल थे. यह सभा कश्मीरी अलगाववादी अफजल गुरू की फांसी का विरोध करने के लिए बुलाई गई थी. अफजल गुरू को 2001 में संसद पर हुए हमलों के लिए अदालत ने दोषी करार दिया था. हालांकि कन्हैया कुमार के वकीलों का कहना है कि उन्होंने हिंसा के इस्तेमाल से इनकार किया था और कोई ऐसा अनुचित बयान नहीं दिया. कन्हैया के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने दक्षिणपंथी छात्र गुटों की आलोचना की थी.
दिल्ली के थिंक टैंक ऑब्जर्वर फाउंडेशन से जुड़े मनोज जोशी ने टेब्लॉयड मेल टुडे में लिखा है, "फरवरी 2016 में जेएनयू के छात्रों ने कथित रूप से "भारत विरोधी नारे" लगाए और उसके तीन साल के बाद चुनाव से ठीक पहले उन पर आरोप लगाए गए हैं. इससे तो यही लगता है कि इसके पीछे उद्देश्य राजनीतिक है."
मोदी की पार्टी से जुड़े राष्ट्रवादी लंबे समय से कश्मीर पर कड़ा रुख अख्तियार करने की मांग करते रहे हैं. उनका कहना है कि तुष्टिकरण की नीति से भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है. देशद्रोह के खिलाफ कानून में उम्र कैद तक की सजा हो सकती है.
राजद्रोह के मायने, दायरे और इतिहास
भारत में राजद्रोह के नाम पर हुई गिरफ्तारियों से इसकी परिभाषा और इससे जुड़े कानून की ओर ध्यान खिंचा है. आइए देखें कि भारतीय कानून व्यवस्था में राजद्रोह का इतिहास कैसा रहा है.
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भारतीय दंड संहिता यानि आईपीसी के सेक्शन 124-A के अंतर्गत किसी पर राजद्रोह का आरोप लग सकता है. ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की सरकार ने 19वीं और 20वीं सदी में राष्ट्रवादी असंतोष को दबाने के लिए यह कानून बनाए थे. खुद ब्रिटेन ने अपने देश में राजद्रोह कानून को 2010 में समाप्त कर दिया.
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सेक्शन 124-A के अनुसार जो भी मौखिक या लिखित, इशारों में या स्पष्ट रूप से दिखाकर, या किसी भी अन्य तरीके से ऐसे शब्दों का प्रयोग करता है, जो भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के लिए घृणा या अवमानना, उत्तेजना या असंतोष पैदा करने का प्रयास करे, उसे दोषी सिद्ध होने पर उम्रकैद और जुर्माना या 3 साल की कैद और जुर्माना या केवल जुर्माने की सजा दी जा सकती है.
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"देश विरोधी" नारे और भाषण देने के आरोप में हाल ही में दिल्ली की जेएनयू के छात्रों, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एसएआर गिलानी से पहले कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय, चिकित्सक और एक्टिविस्ट बिनायक सेन जैसे कई लोगों पर राजद्रोह का आरोप लगा.
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सन 1837 में लॉर्ड टीबी मैकॉले की अध्यक्षता वाले पहले विधि आयोग ने भारतीय दंड संहिता तैयार की थी. सन 1870 में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने सेक्शन 124-A को आईपीसी के छठे अध्याय में जोड़ा. 19वीं और 20वीं सदी के प्रारम्भ में इसका इस्तेमाल ज्यादातर प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन और भाषणों के खिलाफ हुआ.
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पहला मामला 1891 में अखबार निकालने वाले संपादक जोगेन्द्र चंद्र बोस का सामने आता है. बाल गंगाधर तिलक से लेकर महात्मा गांधी तक पर इस सेक्शन के अंतर्गत ट्रायल चले. पत्रिका में छपे अपने तीन लेखों के मामले में ट्रायल झेल रहे महात्मा गांधी ने कहा था, "सेक्शन 124-A, जिसके अंतर्गत मुझ पर आरोप लगा है, आईपीसी के राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए रचे गए कानूनों का राजकुमार है."
सन 1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिलने के बाद से ही मानव अधिकार संगठन आवाजें उठाते रहे हैं कि इस कानून का गलत इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किए जाने का खतरा है. सत्ताधारी सरकार की शांतिपूर्ण आलोचना को रोकना देश में भाषा की स्वतंत्रता को ठेस पहुंचा सकता है.
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सन 1962 के एक उल्लेखनीय 'केदार नाथ सिंह बनाम बिहार सरकार' मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखने का निर्णय लिया था. हालांकि अदालत ने ऐसे भाषणों या लेखनों के बीच साफ अंतर किया था जो “लोगों को हिंसा करने के लिए उकसाने वाले या सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने की प्रवृत्ति वाले हों.”
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आलोचक कहते आए हैं कि देश की निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज करती आई हैं और राज्य सरकारों ने समय समय पर मनमाने ढंग से इस कानून का गलत इस्तेमाल किया है. भविष्य में इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ लोग केंद्र सरकार से सेक्शन 124-A की साफ, सटीक व्याख्या करवाने, तो कुछ इसे पूरी तरह समाप्त किए जाने की मांग कर रहे हैं.
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आर्थिक मामलों से जुड़े प्रमुख अखबार इकोनॉमिक टाइम्स का कहना है, "आजाद भारत को पास खुद पर इतना भरोसा होने चाहिए कि 1947 के पहले पुलिस की सत्ता के लिए बने देशद्रोह कानून को खत्म कर सके और अपने नागरिकों को डराए बगैर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लागू कर सके."
पुलिस पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य में पिछले महीने एक महीने से एक शिक्षाविद, एक पत्रकार और एक किसान के नेता के खिलाफ संभावित देशद्रोह का आरोपों की छानबीन कर रही है. इन लोगों का कसूर बस इतना है कि इन्होंन पड़ोसी देशों से आने वाले गैर मुस्लिम लोगों को नागरिकता देने की योजना का सार्वजनिक रूप से विरोध किया था.
भारत के प्रमुख अखबार हिंदुस्तान टाइम्स का कहना है, "इस कानून को अब खत्म होना चाहिए. एक परिपक्व और उदार लोकतंत्र अपने नागरिकों से नहीं लड़ सकता."