पाकिस्तान को एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने आतंकवाद को वित्तीय समर्थन देने वाले देशों की निगरानी सूची पर डाल दिया है. उधर इस्लामाबाद ने अल कायदा से संदिग्ध संबंधों वाले एक सुन्नी नेता पर लगा प्रतिबंध हटा लिया है.
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37 सदस्य देशों वाली फाइनैंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) एक अंतरसरकारी निगरानी संस्था है. एफएटीएफ ने पेरिस में एक हफ्ते की बैठक के बाद पाकिस्तान को तथाकथित ग्रे लिस्ट पर डाल दिया है. इस फैसले का मतलब ये है कि पाकिस्तान की वित्तीय व्यवस्था को आतंकवाद के वित्तीय पोषण और मनी लाउंडरिंग को रोक पाने में नाकामी के कारण अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था के लिए खतरा माना जाएगा. फरवरी में पाकिस्तान को तीन महीने का नोटिस दिया गया था कि वह अपनी धरती पर काम कर रहे आतंकवादी गुटों की फंडिंग को रोके.
व्यापक समर्थन
इस पर समीक्षा के बाद संस्था ने पाया कि पाकिस्तान सरकार ने उसकी मांगों को पूरा करने के लिए कुछ नहीं किया है. पाकिस्तान सरकार का कहना है कि उसने इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई की है. सिर्फ तुर्की और चीन ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट पर डालने के मनी लाउंडरिंग विरोधी संस्था के प्रस्ताव का विरोध किया. लेकिन ये प्रस्ताव को रोकने के लिए काफी नहीं था. फरवरी में पाकिस्तान का समर्थन करने वाले सऊदी अरब ने इस बार प्रस्ताव का समर्थन किया. एफएटीएफ की मांगों को नहीं मानने पर पाकिस्तान को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है. फिलहाल सिर्फ इराक और उत्तर कोरिया ब्लैकलिस्ट में हैं.
लुधियानवी (बाएं) को आतंकी सूची से हटायातस्वीर: Getty Images/AFD/A.Majeed
इस फैसले से पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है. वह पहले से ही हिंसक इस्लामी कट्टरपंथी आंदोलन और ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है. पाकिस्तान को इससे पहले 2012 से 2015 तक भी इस सूची में रखा गया था.एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट में शामिल देशों में इथियोपिया, यमन, इराक, सीरिया, सर्बिया, श्रीलंका, त्रिनिडाड, वनुआतू और ट्यूनीशिया भी हैं.
पाकिस्तान का अड़ियल रुख
पाकिस्तान के अंतरिम गृह मंत्री आजम खान ने अमेरिका और यूरोपीय संघ पर इस फैसले के लिए एफएटीएफ पर दबाव डालने का आरोप लगाया है. पाकिस्तानी सुरक्षा विश्लेषक फिदा खान ने समाचार एजेंसी डीपीए से कहा कि मनी लाउंडरिंग विरोधी संस्था का फैसला ऐसे समय में पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा देगा जब अमेरिका उससे अफगानिस्तान में सहयोग के लिए जोर डाल रहा है. वे कहते हैं, "पाकिस्तान बाध्यता और दबाव में होगा."
लेकिन 25 जुलाई को होने वाले संसदीय चुनाव से पहले शासन कर रही पाकिस्तान की अंतरिम सरकार ने एक कट्टरपंथी सुन्नी दल के नेता मोहम्मद अहमद लुधियानवी को आतंकवादी सूची से हटा दिया है. देश का चुनाव आयोग अब इस बात का फैसला करेगा कि अहले सुन्नत वाल जमात के लुधियानवी चुनाव में उम्मीदवार बन सकते हैं या नहीं.
नवाज शरीफ भारत के साथ बेहतर संबंधों के हिमायतीतस्वीर: Getty Images/AFP/N. Shrestha
अमेरिका की सख्ती
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान से अफगानिस्तान में नाटो सैनिकों पर हमला करने वाले कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं. फरवरी में अमेरिका ने पाकिस्तान को एफएटीएफ की ग्रे लिस्ट पर डालने के लिए सदस्य देशों में कई हफ्तों तक लॉबी की थी. जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस ने भी इसका समर्थन किया है. पिछले साल ट्रंप ने नई आक्रामक अफगान नीति की घोषणा की थी जिसमें पाकिस्तान को पार्टनर के बदले समस्या बताया गया है.
ट्रंप ने 2018 के अपने पहले ट्वीट में लिखा था, "हमने पाकिस्तान को पिछले 15 सालों में बेवकूफों की तरह 33 अरब डॉलर की सहायता दी है और उन्होंने इसके बदले में हमारे नेताओं को बेवकूफ समझकर झूठ और धोखे से अलावा कुछ नहीं दिया है. वे आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनका हम अफगानिस्तान में शिकार कर रहे हैं. अब और नहीं." ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैनिक सहायता घटा दी है.
फाटा: दुनिया की नाक में दम करने वाला इलाका
पाकिस्तान के कबाइली इलाके लंबे समय तक आतंकवाद का गढ़ रहे हैं. 2018 में इस इलाके को पाकिस्तान के खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत में शामिल किया गया. जानिए क्यों खास है फाटा कहा जाने वाला यह इलाका.
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सबसे खतरनाक जगह
पाकिस्तान के कबाइली इलाकों को कभी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका बताया था. इस पहाड़ी इलाके को लंबे समय से तालिबान और अल कायदा लड़ाकों की सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है.
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केपीके का हिस्सा
अब इस अर्धस्वायत्त इलाके को पाकिस्तान के खैबर पख्तून ख्वाह प्रांत में शामिल किया जा रहा है. यानी अब तक कबाइली नियम कानूनों से चलने वाले इस इलाके पर भी अब पाकिस्तान का प्रशासन और न्याय व्यवस्था के नियम लागू होंगे.
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सात जिले
अफगानिस्तान की सीमा पर मौजूद पाकिस्तान के कबाइली इलाके में सात जिले हैं जिन्हें सात एजेंसियां कहा जाता है. संघीय प्रशासित इस कबाइली इलाके को अंग्रेजी में फेडरली एडमिनिटर्ड ट्राइबल एरिया (FATA) कहा जाता है.
गुलामी मंजूर नहीं
फाटा की आबादी लगभग पचास लाख है जिसमें से सबसे ज्यादा पख्तून लोग शामिल हैं. ब्रिटिश राज में इस इलाके को फाटा नाम दिया गया था. यहां रहने वाले पठान लड़ाकों ने खुद को गुलाम बनाने की कोशिशों का डटकर मुकाबला किया था.
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सस्ती बंदूकें
अभी तक यह इलाका पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच एक बफर जोन की तरह रहा है. यह इलाका सस्ती बंदूकों की मंडी के तौर पर बदनाम रहा है. अफीम के साथ साथ यहां तस्करी का सामान खुले आम बिकता है.
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कबीलों का राज
ब्रिटिश अधिकारियों ने 1901 में इस इलाके के लिए फ्रंटियर क्राइम्स रेग्युलेशन बनाया था, जिसके तहत राजनीति तौर पर नियुक्त होने वाले लोगों को यहां शासन का अधिकार है. इन लोगों के पास एक व्यक्ति के जुर्म की सजा पूरे कबीले को देने तक का अधिकार है.
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स्वायत्तता का लालच
1947 में पाकिस्तान बनने के बाद भी फाटा में वैसे ही शासन चलता रहा जैसे अंग्रेजी दौर में चलता था. पाकिस्तान की सरकार ने इलाके के लोगों को स्वायत्ता लालच दिया ताकि वे पाकिस्तान में शामिल हो जाएं.
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विकास नहीं हुआ
इलाके को स्वायत्ता की भारी कीमत चुकानी पड़ी. विकास के लिए मिलने वाली रकम दशकों तक यहां पहुंची ही नहीं. इसका नतीजा यह हुआ कि कबाइली इलाके और बाकी पाकिस्तान में जमीन आसमान का अंतर नजर आता है.
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उग्रवाद की उपजाऊ जमीन
वंचित लोगों में नाराजगी पैदा होना आम बात है. इसलिए यह इलाका चरमपंथ का गढ़ बन गया है जो न सिर्फ पाकिस्तान बल्कि पड़ोसी अफगानिस्तान के लिए एक बड़ी सुरक्षा चुनौती बन कर उभरा.
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सोवियत संघ के खिलाफ
फाटा 1979 में अफगानिस्तान में रूसी हमले के दौरान सोवियत संघ के खिलाफ सीआईए समर्थित मुजाहिदीन के अभियान का अहम ठिकाना रहा है. दुनिया भर के इस्लामी लड़ाके यहां पहुंचे, जिनमें से कुछ ने बाद में अल कायदा खड़ा किया.
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चरमपंथियों की पनाहगाह
11 सितंबर 2001 के हमले के बाद अमेरिका ने जब अफगानिस्तान पर हमला किया तो वहां से भाग कर तालिबान और अल कायदा के चरमपंथियों ने इसी इलाके में शरण ली. तहरीक ए तालिबान का यहीं जन्म हुआ.
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ड्रोन हमले
अमेरिका ने कई बरस तक इस इलाके में ड्रोन हमलों के जरिए चरमपंथियों को निशान बनाया. हालांकि पाकिस्तान हमेशा ऐसे हमलों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करार देता रहा.
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पाकिस्तान सरकार के दावे
पाकिस्तान सरकार दावा करती है कि इस इलाके में आतंकवादी ठिकाने खत्म कर दिए गए हैं. हालांकि अमेरिका कहता है कि अफगानिस्तान में नाटो और अफगान बलों पर हमले करने वाले चरमपंथी अब भी फाटा को इस्तेमाल कर रहे हैं.