क्या मोदी सरकार, इंदिरा गांधी सरकार का दूसरा संस्करण है?
१५ दिसम्बर २०१८
भारत सरकार और सरकारी विभागों के बीच ही तालमेल की कमी और तनातनी खुल कर दिखने लगी है और बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या इतिहास दोहराया जा रहा है.
तस्वीर: Getty Images/AFP/M. Sharma
विज्ञापन
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के अचानक इस्तीफे ने सरकार और कारोबार जगत से जुड़े कई लोगों को हैरान किया. हालांकि पटेल ने यह फैसला कई महीनों से सरकार और बैंक के बीच चली आ रही तनातनी के बाद लिया. विशेषज्ञ इस्तीफे को इस बात का संकेत मान रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार देश के इस प्रमुख संस्थान से जो कराना चाहती थी वह उसके लिए तैयार नहीं था. सरकार ने रिजर्व बैंक से मांग की थी कि वह कर्ज की सीमा घटाए और अतिरिक्त कोष में से हिस्सा दे.
उर्जित पटेल को मोदी सरकार ने ही नियुक्त किया था लेकिन उन्होंने इन मागों को पूरा करने से मना कर दिया. पटेल चले गए हैं और उनकी जगह एक पूर्व नौकरशाह को लाया गया है, तो शायद प्रधानमंत्री की मुराद पूरी हो सकेगी. दूसरे संस्थान भी इन बातों का मतलब खूब समझते हैं. हिदू राष्ट्रवादियों की सरकार के साथ आमना सामना करने वालों में सीबीआई, सांख्यिकी विभाग, ब्यूरोक्रैट, सरकारी मीडिया और यहां तक कि खुद मोदी कैबिनेट भी है. इन सभी विभागों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि उन सबके काम में राजनीतिक दखल दिया जा रहा है. उन पर 2019 में होने वाले आम चुनाव से पहले नतीजे दिखाने का दबाव बनाया जा रहा है. उत्तर भारत के अहम राज्यों में बीजेपी को मिली हार से यह दबाव और ज्यादा बढ़ गया है.
पूर्व आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेलतस्वीर: Reuters/F. Mascarenhas
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने प्रधानमंत्री कार्यालय से जब इस बारे में बात करनी चाही तो कोई जवाब नहीं आया. सरकार के मुख्य प्रवक्ता ने भी इस पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया. प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में कोई प्रेस कांफ्रेंस नहीं की है. उन्होंने इंटरव्यू भी बहुत कम ही दिए हैं. वह संवाद के लिए ट्विटर का इस्तेमाल करते हैं और देश को हर महीने रेडियो के जरिए अपने 'मन की बात' सुनाते हैं.
कुछ राजनीतिक विश्लेषक और सरकारी अधिकारी उन्हें निरंकुश बताते हैं. उनका कहना है कि जटिल रूप से नस्ली, धार्मिक और जातीय तौर पर विभाजित 1.3 अरब की आबादी वाले भारत के लिए यह निरंकुशता खतरनाक हो सकती है. वित्त मंत्रालय के पूर्व अधिकारी मोहन गुरुस्वामी का कहना है, "आप चीन की तरह यहां शासन नहीं चला सकते." भारत की आजादी से पहले के दौर की ओर संकेत करते हुए गुरुस्वामी ने कहा, "आपको लगातार सहमति बनानी पड़ती है. यहां तक कि ब्रिटिश भी लोगों की राय लेते थे और मुगलों ने तो स्थानीय राजाओं को अपनी सेना में शामिल किया था."
कुछ दूसरे लोगों का कहना है कि दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों ने बीजेपी से गठजोड़ कर लिया है और दूसरी तरफ उदार बौद्धिक वर्ग भारत के कानूनी तंत्र, शैक्षिक वर्ग और अंग्रेजी मीडिया पर अब भी हावी है. रिजर्व बैक इन्हीं दो गुटों के बीच एक बड़ी सांस्कृतिक लड़ाई का नया मैदान बना. नई दिल्ली के ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक हर्ष वी पंत कहते हैं, "दक्षिणपंथी मानते है कि इन संस्थाओं का वामपंथियों ने अनुचित इस्तेमाल किया है."
मोदी का नियंत्रण
भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय: आपातकाल
भारत में इमरजेंसी सिर्फ एक बार लगी. लेकिन आज भी उसकी गूंज भारतीय राजनीति में बार बार सुनने को मिलती है. आखिरी क्यों लगानी पड़ी थी इमरजेंसी और इसका क्या नतीजा निकला, चलिए जानते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/KPA
21 महीने तक रही इमरजेंसी
25 जून, 1975. यह तारीख भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काला धब्बा है. इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देश में आपातकाल लगाया था जो 21 मार्च 1977 तक यानी कि 21 महीने तक चला. क्यों लगा आपातकाल और क्या रहा उसका असर?
तस्वीर: picture-alliance/united archives
क्यों लगता है आपातकाल?
आपातकाल की घोषणा कानून व्यवस्था बिगड़ने, बाहरी आक्रमण और वित्तीय संकट के हालत में की जाती है. भारत में आपातकाल का मतलब था कि इंदिरा गांधी जब तक चाहें सत्ता में रह सकती थीं. सरकार चाहे तो कोई भी कानून पास करवा सकती थी.
तस्वीर: picture-alliance/KPA
जेपी की चुनौती
गुजरात और बिहार में शुरू हुए छात्र आंदोलन का नेतृत्व भारतीय स्वतंत्रता सेनानी व लोकनायक जयप्रकाश नारायण कर रहे थे. हाई कोर्ट में चुनावी मुकदमा हारने के बाद 25 जून को रामलीला मैदान से उन्होंने इंदिरा गांधी को खुली चुनौती देते हुए उनसे इस्तीफा मांगा.
तस्वीर: Getty Images/AFP/Raveendran
इंदिरा पर चुनाव धांधली का आरोप
12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को खारिज कर दिया और छः साल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी. उन्हें वोटरों को घूस देने और सरकारी मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने समेत कई मामलों का दोषी पाया गया. इस फैसले से इंदिरा बेचैन थीं.
तस्वीर: CC-BY-SA-3.0 LegalEagle
महंगाई 20 फीसदी बढ़ी
महंगाई चरम पर थी. खाने-पीने के दाम 20 गुना बढ़ गए थे जिसकी वजह से सरकार की आलोचना शुरू हो गई. कांग्रेस के अंदरूनी गुटों ने सरकार की नीतियों का विरोध शुरू कर दिया था. इंदिरा सरकार चारों तरफ से पस्त थी.
तस्वीर: AP
25-26 जून की रात हुआ लागू
25 और 26 जून की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत के साथ देश में आपातकाल लागू हो गया. अगली सुबह रेडियो पर इंदिरा ने कहा, "भाइयो और बहनो, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है. इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है."
तस्वीर: AP
छोटे-बड़े सभी नेताओं को हुई जेल
26 जून की सुबह होते-होते जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस समेत तमाम बड़े नेता गिरफ्तार किए जा चुके थे. कहा जाता है कि इतनी गिरफ्तारियां हुईं कि जेलों में जगह कम पड़ गई.
तस्वीर: IANS
प्रेस की बिजली काट दी
आपातकाल का मतलब मीडिया की आजादी का छिन जाना था. जेपी की रामलीला मैदान में हुई 25 जून की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/J. McConnico
जबरन कराई नसबंदी
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी ने पांच सूत्री एजेंडे पर काम करना शुरू कर दिया. इसमें नसबंदी, वयस्क शिक्षा, दहेज प्रथा को खत्म करना, पेड़ लगाना और जाति प्रथा उन्मूलन शामिल था. 19 महीने के दौरान देश भर में करीब 83 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई.
तस्वीर: AP
9 तस्वीरें1 | 9
1975 में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी ने नागरिक स्वतंत्रता को निलंबित कर दिया और करीब दो साल तक देश में आपातकाल लगा रहा. तब इंदिरा गांधी ने कहा था कि देश के भीतर देश को तोड़ने की कोशिश हो रही है जिसे रोकना होगा. पंत कहते है, "यह इंदिरा गाधी 2.0 सरकार है. उनके जाने के बाद इतनी ताकतवर और कोई सरकार नहीं रही."
प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार बताते हैं कि इस प्रसारण बोर्ड में राज्यों के 70 फीसदी पद 2-3 साल से खाली पड़े है क्योंकि प्रधानमंत्री के दफ्तर में फाइलें रुकी पड़ी हैं. उनका कहना है, "भारतीय गणतंत्र के हर अधिकारी की नियुक्ति को सिर्फ एक ही इंसान तय कर रहा है."
ज्यादा दिन नहीं बीते जब मोदी सरकार में एक क्षेत्रीय पार्टी के मंत्री ने यह कह कर इस्तीफा दे दिया कि वह बिना अधिकार के मंत्री हैं और मोदी सरकार ने उनकी पार्टी की चिंता की अनदेखी की है. पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मोदी को लिखे पत्र में कहा है, "केंद्रीय मंत्रिमंडल को महज एक रबर स्टैम्प बना दिया गया है जो फैसलों पर बिना किसी विचार विमर्श के मुहर लगा देती है. मंत्री महज नाम भर के हैं क्योंकि सारे फैसले आप और आपका विभाग ले रहा है."
वाशिगटन के कार्नेगी इंडोमेंट फॉर इटरनेशनल पीस में भारत पर रिसर्च कर रहे मिलन वैष्णव कहते हैं, "एक केंद्रीकृत सरकार जिसमें प्रधानमंत्री का दफ्तर सर्वोच्च नियंत्रण रखता है, वहां कैबिनेट पिछली सीट पर चली जाती है और संस्थागत नियंत्रण और संतुलन को उसके गुण की बजाय बीमारी के रूप में देखा जाता है."
इसी साल अक्टूबर में सरकार ने सीबीआई के प्रमुख और उनके डेपुटी को पद से हटा दिया. दोनों अधिकारी एक दूसरे पर सार्वजनिक रूप से आरोप लगा रहे थे. सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि इस कदम ने, "संस्था की स्वतंत्रता को खत्म कर दिया है" और साथ ही अधिकारियों के मनोबल को भी.
अधिकारियों का कहना है कि यह लड़ाई सामने आने के पहले से भी सरकार के साथ तनातनी चल रही थी. एक अधिकारी ने बताया कि सीबीआई सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ जांच शुरू नहीं कर पा रही है क्योंकि एक प्रमुख कानून में हेरफेर कर दिया गया है.
कुछ आलोचक तो यहां तक कहते हैं कि सरकार के आर्थिक आकड़ों में भी राजनीति घुस गई है. पिछले महीने बीजेपी को जीडीपी के ऐतिहासिक आंकड़े दोबारा जारी करने के लिए आलोचना झेलनी पड़ी. इन आंकड़ों में कांग्रेस शासित वर्षों में विकास को काफी कम दिखाया गया. सांख्यिकी विभाग के पुराने आंकड़ों में कांग्रेस के दौर में ज्यादा विकास दिखाया गया था. उस दौर में विभाग के लिए काम कर चुके सुदीप्तो मुंडले कहते हैं कि भारत के आर्थिक आंकड़ों में राजनीति को लाना "बहुत चिंताजनक" है.
सरकार के सामने सिर्फ एक ही सस्थान है जो सीना ताने खड़ा है और वो है सुप्रीम कोर्ट. हालाकि वकीलों और जजों का कहना है कि उसे भी चुनौतियां झेलनी पड़ रही है. सर्वोच्च अदालत ने समलैंगिक सेक्स और विवाहेत्तर रिश्तों को लेकर जो फैसले दिए हैं उनसे हिदू परंपरावादियों के कान खड़े हो गए हैं. इतना ही नहीं, निजता के अधिकार को बुनियादी बता कर कोर्ट ने बायोमेट्रिक पहचान पत्र को अनिवार्य बनाने के सरकार के कार्यक्रम को भी धक्का पहुंचाया है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण का कहना है कि सरकार सर्वोच्च अदालत को प्रभावित करने के तरीके लगातार ढूंढ रही है. प्रशांत भूषण का कहना है, "दबाव बना हुआ है, सरकार न्यायिक नियुक्तियों में बाधा डाल कर अदालत को नीचा दिखाने की कोशिश कर रही है."
एनआर/एके (रॉयटर्स)
खतरे में लोकतंत्र?
भारत में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने की शिकायतें होती रही हैं. अब बीजेपी नेता आडवाणी ने कहा है कि इमरजेंसी जैसी हालत पैदा होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.
तस्वीर: Getty Images/AFP/N. Seelam
मन की बात?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू संगठन आरएसएस के प्रचारक रहे हैं. प्रधानमंत्री बनने के बाद उनसे नेतृत्व की उम्मीद की जा रही है लेकिन हिंदुत्ववादी संगठनों के मुसलमानों के धर्मांतरण या "घर वापसी" जैसे विभिन्न अभियानों के खिलाफ उन्होंने कुछ नहीं कहा है.
तस्वीर: Getty Images/AFP/S. Hussain
आरएसएस का प्रभाव
नरेंद्र मोदी की सरकार पर आरोप है कि उनके मंत्री राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इशारे पर काम करते हैं और हर महत्वपूर्ण मामले में उससे सलाह लेते हैं. मोहन भागवत आरएसएस के नेता हैं और उनके संगठन का एक सदस्य भारतीय जनता पार्टी का संगठन सचिव है.
तस्वीर: Strdel/AFP/Getty Images
लोकतंत्र पर बादल
पारिवारिक राजनीति के लिए धार्मिक राजनीति का इस्तेमाल - अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि धर्म के विकास के लिए राज्य सत्ता जरूरी है. वे पंजाब के मुख्यमंत्री हैं, उनके पुत्र उप मुख्यमंत्री और पतोहु केंद्रीय मंत्री हैं.
तस्वीर: UNI
विकास में बाधा
बिहार को सालों बाद राजनीतिक स्थिरता देने के बावजूद विकास के बदले वंशवाद को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया. चारा घोटाले में लिप्त होने के कारण लालू यादव महीनों जेल में रहे और इस समय उनके चुनाव लड़ने पर रोक है.
तस्वीर: AP
समाजवादी वंश
समाजवादी आंदोलन से उभरे मुलायम सिंह यादव परिवार को मजबूत करने और लालू यादव के साथ पारिवारिक गठबंधन बनाने के बाद अब जनता परिवार के मुखिया है. चुनावी राजनीति का संयोग ही है कि उत्तर प्रदेश से उनकी पार्टी के सारे सांसद उनके परिवार के ही हैं.
तस्वीर: Prabhakar Mani Tewari
आकंठ घोटाले
कांग्रेस का विरोध कर ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी बनाई. कम्युनिस्टों के विरोध के नाम पर सत्ता में आई. चूंकि पार्टी चलाने के लिए पैसे की भी जरूरत होती है, उन्होंने पार्टी के लिए धन जुटाने का काम गैरकानूनी तरीकों पर छोड़ दिया. इसी कारण से आज उनके कई सांसदों के खिलाफ जांच चल रही है.
तस्वीर: Dibyangshu Sarkar/AFP/Getty Images
सत्तामोह या मजबूरी
भ्रष्टाचार कांड में अयोग्य करार दिए जाने के बाद ऊंची अदालत में अपील जीतकर तमिल राजनीति की "अम्मा" जयललिता फिर से सत्ता में लौटी हैं. राजनीतिज्ञों की लोकप्रियता के कारण भारत राजनीतिक भ्रष्टाचार से निबटने का रास्ता नहीं ढूंढ पाया है.
तस्वीर: Dibyangshu Sarkar/AFP/Getty Images
राजनीति क्यों?
अलगाववाद की राजनीति करने वाले उद्धव ठाकरे सांप्रदायिक शिवसेना के नेता है. अब तक चुनाव नहीं लड़ा है, लेकिन पिता के बाद पार्टी के सर्वमान्य नेता और अधिनायक हैं. उनकी पार्टी मराठा सम्मान के लिए लड़ती है और मुंबई में बाहर से आए लोगों का विरोध करती हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
अनसुलझी समस्या
गरीबी और विकास के अलावा भारत की प्रमुख समस्याओं में कश्मीर विवाद शामिल है. कश्मीर ढाई दशक से अलगाववादी विद्रोह का सामना कर रहा है. राजनीतिक प्रक्रियाएं लोगों को पर्याप्त रोजगार और सुरक्षा नहीं दे पाई हैं.
तस्वीर: AFP/Getty Images/T. Mustafa
समांतर सरकार
माओवादी भी समाज की मुख्य धारा से बाहर हैं और खासकर जंगली इलाकों में स्थानीय निवासियों के अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. उन्हें बातचीत की मेज पर लाने और उनकी मांगों पर लोगों का समर्थन जीतने के सार्थक प्रयास नहीं हुए हैं.