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जर्मन खा रहे हैं ज्यादा मछली

१२ सितम्बर २०११

जर्मनी में मछली का उपभोग लगातार बढ़ रहा है और इसकी बढ़ती कीमत का खाने वालों पर कोई असर नहीं. जानकारों का कहना है कि महंगी होती मछली के बावजूद इसके खाने वाले कोई कमी नहीं करेंगे.

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हेरिंग मछली से बना एक पक्वानतस्वीर: Fotolia/Gennady Kravetsky

2010 में जर्मनी में प्रति व्यक्ति 15.7 किलो मछली खाई गई जबकि 1980 में औसतन 11 ही किलो मछली खाई जा रही थी. जर्मन मछली सूचना केंद्र (फिश इन्फॉर्मेशन सेंटर) का कहना है कि 2012 में मछली की खपत 16 किलो तक पहुंच सकती है.

जर्मनी में मछली खाने वाले लोगों की तादाद बढ़ना इसलिए आश्चर्यजनक है कि मूल रूप से जर्मन पोर्क और बीफ खाना पसंद करते हैं. अगर मछली के दीवाने देशों मालदीव और ग्रीनलैंड से इसकी तुलना की जाए तो यह कुछ नहीं है, लेकिन मछली खाने का बढ़ता फैशन ध्यान खींचता है. मालदीव में प्रति व्यक्ति औसतन 142.4 किलो और ग्रीनलैंड में 91 किलो मछली खाई जाती है.        

तस्वीर: Fotolia/LianeM

बढ़ती कीमतें

मछली के उपभोग के साथ ही उसकी कीमतें भी तेजी से बढ़ रही हैं. 2010 के दौरान यूरोप में मछली की कीमतें 2009 की तुलना में 3,6 प्रतिशत बढ़ गई. जर्मन मछली सूचना केंद्र के निदेशक माथियास केलर कहते हैं, "कीमतों में बढ़ोत्तरी हो रही है क्योंकि लगातार कई देशों में ऐसा मध्य वर्ग बढ़ रहा है जो इसकी कीमत देने के लिए तैयार है. बढ़ती मांग की पूर्ति करना मुश्किल हो रहा है और इसलिए कीमतें आसमान छू रही हैं."

डॉयचे वेले से बात करते हुए केलर ने कहा कि पिछले साल चिली में हुई मुश्किल के कारण नॉर्वे सैलमन मछली का इकलौता सप्लायर था और इसलिए कीमतें तेजी से बढ़ीं. लेकिन अब चिली से भी मछलियां आ रही हैं, तो कीमतें तुलनात्मक रूप से कम हुई हैं. 

जर्मन लोग ज्यादा मछली खा रहे हैं क्योंकि उन्हें इसका स्वाद पसंद है. वे मान रहे हैं कि मछली बाकी मांस की तुलना में स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती है. जर्मनी में मछली मुख्य तौर पर नॉर्वे से आती है. 

पांच पसंदीदा चीजें

जर्मनी में मछली की 660 किस्में खरीदी जा सकती हैं. लेकिन जर्मन लोगों को अलास्का की पोलॉक, हेरिंग, सैलमन, ट्यूना और पैंगेसियस मछलियां सबसे ज्यादा पसंद हैं. इससे भी रोचक बात यह है कि जर्मन ताजा मछली खरीदने की बजाए डीप फ्रिज की हुई मछली खरीदना ज्यादा पसंद करते हैं.

मछली बेचने वाले इसकी बढ़ती मांग से खुश हैं तो लोगों में कहीं न कहीं यह चिंता भी है कि बढ़ती मांग के कारण सीफूड की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा.

बढ़ती मांग और जनसंख्या के कारण मछलियों का शिकार भी बढ़ रहा है जो समुद्र की पारिस्थितिकी के लिए ठीक नहीं. माथियास केलर कहते हैं, "कई इलाकों में हम नियंत्रण नहीं कर सकते, लेकिन दूसरे में हम ध्यान रख रहे हैं और मछलियों की संख्या बढ़ भी रही है." मछली के बारे में सूचना देने वाले जर्मन केंद्र की वेबसाइट पर एक पोर्टल (www.fischverband.de/faokarte) है जहां देखा जा सकता है कि मछली पकड़ने के मुख्य इलाकों में मछलियों की संख्या कितनी है.

मछली मारने का कोटा

मछली की बढ़ती मांग कई जानकारों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है. जर्मनी के शहर रोस्टॉक में योहान हाइनरिष फॉन थ्यूनन संस्थान के उप निदेशक क्रिस्टोफर जिमरमान का मानना है कि मत्स्य उद्योग को मछलियों की संख्या बढ़ाने के लिए ज्यादा कोशिश करनी होगी. उनका कहना है कि यूरोपीय संघ की सिफारिशें काफी नहीं हैं.

तस्वीर: picture alliance/dpa

जिमरमान का कहना है कि मछली के ज्यादा शिकार को रोकने के लिए देशों में कड़े कानून बनाए जाने चाहिए. और उन लोगों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए जो इन कानूनों को नजरअंदाज करते हैं. इसके अलावा मछलियों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रभावी प्रबंधन नीतियों की जरूरत है.

जहां मछलियों का शिकार बहुत ज्यादा हो गया है, वहां से आने वाली मछलियों का कोटा कुछ समय के लिए कम कर दिया जाना चाहिए ताकि मछलियों की संख्या बढ़े. हालांकि जिमरमान यह भी मानते हैं कि कई कंपनियों के लिए मछली के शिकार में कमी लाना मुश्किल है. क्योंकि व्यवसाय पर बहुत ज्यादा असर पड़ेगा और आपूर्ति कम होने के कारण कीमतें अपने आप ऊपर चढ़ेंगी तो उपभोक्ताओं की जेब पर भी मार पड़ेगी.

रिपोर्टः जॉन ब्लाउ/आभा एम

संपादनः महेश झा

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