जलवायु परिवर्तन 'आंकड़े छुपाने' का विवाद गहराया
५ दिसम्बर २००९
प्रोफ़ेसर एंड्रयू वॉटसन ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन मसले पर लोगों को बरगलाने के आरोप सही नहीं है और उनके सहयोगी पर लगे आरोप बेबुनियाद हैं. जो ईमेल हैक कर वेबसाइट पर डाला गया है उससे ये कहीं साबित नहीं होता कि वैज्ञानिक मूलभूत आंकड़ों से छेडछाड़ कर रहे हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया में विवादों में घिरे जलवायु परिवर्तन वैज्ञानिक प्रोफ़ेसर फ़िल जोन्स अपने पद से हट चुके हैं.
उनकी ईमेल को हैक कर लिया गया था जिसके बाद आरोप लगे थे कि जलवायु में बदलाव को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. साथ ही इस बात को छुपाने के प्रयास भी हो रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन के लिए मानवीय गतिविधियां ज़िम्मेदार नहीं हैं. मामले की जांच शुरू हो गई है. दरअसल जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैज्ञानिक दो धड़ों में बंटे हुए हैं. एक धड़ा जलवायु परिवर्तन के लिए इंसानी गतिविधियों को ज़िम्मेदार ठहराता है तो दूसरा पक्ष इसे स्वाभाविक बताता है.
ब्रिटेन में यूनिवर्सिटी ऑफ़ ईस्ट एंगलिया कह चुकी है कि जलवायु शोध संस्थान के प्रमुख फ़िल जोन्स तब तक अपने पद पर नहीं लौटेंगे जब तक मामले की स्वतंत्र जांच पूरी नहीं हो जाती. वैज्ञानिक फ़िल जोन्स ने ही अपने पद से हटने का प्रस्ताव दिया था. जलवायु परिवर्तन की थ्योरी को हमेशा टेढ़ी निग़ाह से देखने वाले वैज्ञानिक समुदाय का आरोप है कि शोध संस्थान (सीआरयू) के वैज्ञानिक जानबूझकर उस डाटा को छुपा रहे थे जिससे जलवायु में आ रहे बदलाव पर उनके तर्क कमज़ोर पड़ते.
ये मामला पिछले महीने तब सामने आया था जब सीआरयू के वैज्ञानिकों और उनके सहयोगियों के बीच हुए ईमेल संदेशों को वेबसाइट पर डाल दिया गया और साथ ही कई अहम दस्तावेज़ भी प्रकाशित कर दिए गए. कुछ पर्यवेक्षकों का आरोप है कि प्रोफ़ेसर फ़िल जोन्स चाहते थे कि संयुक्त राष्ट्र के अगले जलवायु परिवर्तन आंकलन में कुछ रिसर्च पेपर्स को शामिल न किया जाए. एक वर्ग का आरोप है कि इन रिसर्च पेपर से पता चलता था कि वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी के लिए मानवीय गतिविधियां ज़िम्मेदार नहीं हैं. हालांकि प्रोफ़ेसर जोन्स ने इन आरोपों का खंडन किया है और कहा है कि कुछ ईमेल को ग़लत तरीक़े से पेश करने की कोशिश हो रही है.
प्रोफ़ेसर जोन्स के सहयोगी प्रोफ़ेसर एन्ड्रयू वॉटसन ने पुरज़ोर विरोध करते हुए कहा है कि कुछ लोग ये विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हैक की ईमेल से सीआरयू संस्था का डाटा बेमानी हो जाता है लेकिन ऐसा हो नहीं पाएगा. "वो चाहते हैं कि हम मान ले कि 20वीं सदी में जलवायु में जितना भी परिवर्तन हुआ वह वैज्ञानिकों के दिमाग़ की उपज है. लेकिन वो ये समझाना भूल जाते हैं कि आख़िर क्यों ग्लेशियर पिघल रहे हैं, पतझड़ का मौसम पहले की तुलना में जल्द आ जाती है."
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की संस्था आईपीसीसी के प्रमुख डॉ आरके पचौरी ने प्रकरण की तह तक जाने की बात कही है. उन्होंने स्पष्ट किया है कि इस मामले को बिना जांच के रफ़ा-दफ़ा नहीं किया जा सकता. कुछ दिनों बाद ही कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने के लिए शिखर वार्ता होने जा रही है और उससे ठीक पहले सामने आए इस मामले से सवाल खड़े हो गए हैं.
रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़
संपादन: ओ सिंह