भारत सरकार ने देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, जेएनयू में एमफिल और पीएचडी की सीटों में बहुत भारी कटौती कर दी है. पहले जहां 1,068 सीटें थी वहीं अब नये दाखिले सिर्फ 130 सीटों पर होंगे. यानी 88 फीसदी की कटौती.
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जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) और देश की छात्र बिरादरी में इस फैसले से गहरा असंतोष और बेचैनी है. खासकर दलित और वंचित तबके के छात्रों को लग रहा है कि उनके मुंह से निवाला छीना जा रहा है. सीटों को कम करने के अलावा दाखिले की नई व्यवस्था के तहत मौखिक परीक्षा का महत्व लिखित परीक्षा से ज्यादा कर दिया गया है. आदेश का बचाव करते हुए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने राज्यसभा में बताया, "हम शोध की गुणवत्ता में सुधार चाहते हैं. हम चाहते हैं और पीएचडी और शोध का काम फूले फले. ना सिर्फ शोध दुरुस्त हों बल्कि छात्रों की संख्या भी दुरुस्त करनी होगी.”
जेएनयू में सीट कटौती के विरोध को भी सरकार जायज नहीं मानती क्योंकि उसके मुताबिक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नियम और मानक तय हैं. जावड़ेकर कहते है कि पूरी दुनिया में एक प्रोफेसर गाइड के साथ चार शोध छात्रों का अनुपात है, जबकि जेएनयू में एक और 25 का अनुपात था. उनके मुताबिक देश के 800 विश्वविद्यालयों में यही नियम लागू किया गया है. लेकिन इस तर्क के बाद सरकार अपनी जिस कमजोरी का जिक्र नही करती, वो है शिक्षकों की संख्या में कमी. जेएनयू में ही 300 खाली पदों को भरा जाना है. जेएनयू के राजनैतिक विवाद के बाद वहां अधिकार बनाम वर्चस्व की लड़ाई जैसी नजर आने लगी है. लेकिन कुल मिलाकर देखें तो बात किसी सीट में कटौती या शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है, देश में उच्च शिक्षा की जो ओवरऑल बदहाली है उसमें ऐसी नौबतें तो आनी ही थीं. उच्च शिक्षा की संचालन और निगरानी संस्था यूजीसी का रवैया, विश्वविद्यालयों की नाक की लड़ाई, ईगो, अकादमिक माहौल, शोध के कार्यों को लचर स्थिति ने देश की उच्च शिक्षा के ग्राफ को नीचे गिरा दिया है. विश्व रैंकिग में भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान हांफते नजर आते हैं.
टॉप-10 यूनिवर्सिटीज
द टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रिपोर्ट 2016-17 में चीन ने बड़ी छलांग लगाई है. चीन की चार यूनिवर्सिटीज टॉप-50 में हैं. देखिये टॉप-10 में कौन कौन है.
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नंबर 1
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी (यूके)
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नंबर 2
कैलिफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अमेरिका)
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नंबर 3
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (अमेरिका)
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नंबर 4
केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी (यूके)
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नंबर 5
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (अमेरिका)
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नंबर 6
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (अमेरिका)
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नंबर 7
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (अमेरिका)
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नंबर 8
इंपीरियल कॉलेज लंदन (यूके)
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नंबर 9
स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी ज्यूरिख (स्विट्जरलैंड)
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नंबर 10
कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले (अमेरिका)
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नंबर 10
शिकागो यूनिवर्सिटी (अमेरिका)
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मेधा पाटेकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता देने वाले देश के जाने माने संस्थान टाटा इंस्टीट्यट ऑफ सोशल साइंसेस (टिस) ने यूजीसी से पैसा नहीं मिलने के कारण कई शोध परियोजनाओं को बंद करके अपने 35 अध्यापकों को बर्खास्त कर दिया है. वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से खबर है कि उसे 103 करोड़ रुपये यूजीसी को वापस करने पड़े, क्योंकि उस राशि का उपयोग ही नहीं हो पाया था. डीयू के पास 153 करोड़ रुपये की और ऐसी रकम है जिसे अगर आगामी 31 मार्च तक खर्च नहीं किया गया, तो वो भी वापस करनी होगी. जाहिर है सिर्फ सात दिनों की अवधि में अकादमिक गतिविधियों में इतनी बड़ी राशि का उपयोग किसी चमत्कार से कम न होगा. सरकार ने आईआईटी संस्थानों से ऐसे सभी पाठ्यक्रमों और केंद्रों को बंद करने को कहा है, जिनमें पिछले तीन साल से दाखिलों की दर कम है. उधर ओपन यूनिवर्सिटी सिस्टम से पीएचडी की मान्यता को लेकर भी हजारों शोधार्थी गहरे असमंजस और चिंता में हैं.
भारत की "बीमार” उच्च शिक्षा व्यवस्था के ये कुछ लक्षण मात्र हैं जो इन दिनों अखबारों की सुर्खियों में हैं. और जाहिर है निदान भी इन्हीं के भीतर छिपे हैं. हैदराबाद यूनिवर्सिटी, रामजस कालेज, हरियाणा सेंट्रल यूनिवर्सिटी, जेएनयू और जोधपुर विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति और विमर्श की स्वतंत्रता पर हुए भयावह हमले जो हैं सो हैं. एक तरफ सरकारी या सरकार से सहायता प्राप्त उच्च शिक्षण संस्थानों की हालत ये है तो दूसरी तरफ निजी कॉलेज और निजी विश्वविद्यालयों की बाढ़ है. मात्रा और मुनाफे के लिहाज से वे खूब फल फूल रहे हैं. आखिर कैसे? उच्च शिक्षा के सरकारी क्षेत्र में स्थितियां क्यों बदतर हैं? मुख्य रूप से इसके तीन बड़े कारण हैं- राजनैतिक हस्तक्षेप, विजन का अभाव, और मानविकी विषयों की उपेक्षा या उनके प्रति उदासीन रवैया.
क्या उच्च शिक्षा केवल अमीरों के लिए?
दुनिया भर में 10 से 24 साल की उम्र के सबसे अधिक युवाओं वाले देश भारत में उच्च शिक्षा अब भी गरीबों की पहुंच से दूर लगती है. फिलहाल विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था में सबकी हिस्सेदारी नहीं है.
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भारत में नरेंद्र मोदी सरकार ने मेडिकल और इंजीनियरिंग के और भी ज्यादा उत्कृष्ट संस्थान शुरू करने की घोषणा की है. आईआईएम जैसे प्रबंधन संस्थानों के केन्द्र जम्मू कश्मीर, बिहार, हिमाचल प्रदेश और असम में भी खुलने हैं. लेकिन बुनियादी ढांचे और फैकल्टी की कमी की चुनौतियां हैं. यहां सीट मिल भी जाए तो फीस काफी ऊंची है.
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देश के कई उत्कृष्ट शिक्षा संस्थानों और केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भी फिलहाल 30 से 40 फीसदी शिक्षकों की सीटें खाली पड़ी हैं. नासकॉम की रिपोर्ट दिखाती है कि डिग्री ले लेने के बाद भी केवल 25 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट और लगभग 15 प्रतिशत अन्य स्नातक आईटी और संबंधित क्षेत्र में काम करने लायक होते हैं.
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कोटा, राजस्थान में कई मध्यमवर्गीय परिवारों के लोग अपने बच्चों को आईआईटी और मेडिकल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए भेजते हैं. महंगे कोचिंग सेंटरों में बड़ी बड़ी फीसें देकर वे बच्चों को आधुनिक युग के प्रतियोगी रोजगार बाजार के लिए तैयार करना चाहते हैं. इस तरह से गरीब बच्चे पहले ही इस प्रतियोगिता में बाहर निकल जाते हैं.
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने फ्रांस दौरे पर युवा भारतीय छात्रों के साथ सेल्फी लेते हुए. सक्षम छात्र अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा पाने के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और तमाम दूसरे देशों का रूख कर रहे हैं. लेकिन गरीब परिवारों के बच्चे ये सपना नहीं देख सकते. भारत में अब भी कुछ ही संस्थानों को विश्वस्तरीय क्वालिटी की मान्यता प्राप्त है.
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मार्च 2015 में पूरी दुनिया में भारत के बिहार राज्य की यह तस्वीर दिखाई गई और नकल कराते दिखते लोगों की भारी आलोचना भी हुई. यह नजारा हाजीपुर के एक स्कूल में 10वीं की बोर्ड परीक्षा का था. जाहिर है कि पूरे देश में शिक्षा के स्तर को इस एक तस्वीर से आंकना सही नहीं होगा.
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राजस्थान के एक गांव की कक्षा में पढ़ते बच्चे. 2030 तक करीब 14 करोड़ लोग कॉलेज जाने की उम्र में होने का अनुमान है, जिसका अर्थ हुआ कि विश्व के हर चार में से एक ग्रेजुएट भारत के शिक्षा तंत्र से ही निकला होगा. कई विशेषज्ञ शिक्षा में एक जेनेरिक मॉडल के बजाए सीखने के रुझान और क्षमताओं पर आधारित शिक्षा दिए जाने का सुझाव देते हैं.
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उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी जैसे दल खुद को दलित समुदाय का प्रतिनिधि और कल्याणकर्ता बताते रहे हैं. चुनावी रैलियों में दलित समुदाय की ओर से पार्टी के समर्थन में नारे लगवाना एक बात है, लेकिन सत्ता में आने पर उनके उत्थान और विकास के लिए जरूरी शिक्षा और रोजगार के मौके दिलाना बिल्कुल दूसरी बात.
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भारत के "मिसाइल मैन" कहे जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम देश में उच्च शिक्षा के पूरे ढांचे में "संपूर्ण" बदलाव लाने की वकालत करते थे. उनका मानना था कि युवाओं में ऐसे कौशल विकसित किए जाएं जो भविष्य की चुनौतियों से निपटने में मददगार हों. इसमें एक और पहलू इसे सस्ता बनाना और देश की गरीब आबादी की पहुंच में लाना भी होगा.
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सरकारें मनमाने ढंग से नियम और नियामक संस्थाओं में निरंतर फेरबदल करती रहती हैं. 2009 और 2016 में बनी नई नीतियां इसका प्रमाण हैं. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित 51 कुलपतियों की बैठक में पिछले दिनों उच्च शिक्षा के "भारतीयकरण” का सुझाव दिया. ये छिपी बात नहीं है कि संघ की "भारतीयता” का आशय क्या है. कुलपतियों और कुलसचिवों की नियुक्तियां शुद्ध रूप से राजनैतिक नियुक्तियां बन गई हैं - ये अब खुला रहस्य है भले ही इसके लिये लंबी चौड़ी अकादमिक कसरतें की जाती हैं. राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति को पिछले दिनों हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पद से इस्तीफा देना पड़ा. अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के कुलपति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.
पीएचडी और एमफिल के दाखिलों और विश्वविद्यालयों में प्राचार्यों और सहायक प्राचार्यों की नियुक्ति के लिये कोई समवेत नीति नहीं है और इसमें इतने छेद हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन जैसा चाहे इसे तोड़-मरोड़ सकता है. यहां तक कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों और राज्यों के विश्वविद्यालयों में भी बड़ी खाई है - संवाद और समन्वय के स्तर पर भी और कामकाज के स्तर पर भी. जेएनयू टीचर्स एसोसियेशन की अध्यक्ष आयशा किदवई का कहना है, "उद्देश्य ये है कि पहले दाखिला बंद करो और फिर संस्थानों को. आज सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को एक साथ खड़ा होना चाहिये. ऐसा लगता है कि उन सभी जगहों को धीमी मौत की ओर धकेला जा रहा है जहां लोग स्वतंत्रता से सोच-विचार कर सकते हैं.”
राजद्रोह के मायने, दायरे और इतिहास
भारत में राजद्रोह के नाम पर हुई गिरफ्तारियों से इसकी परिभाषा और इससे जुड़े कानून की ओर ध्यान खिंचा है. आइए देखें कि भारतीय कानून व्यवस्था में राजद्रोह का इतिहास कैसा रहा है.
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भारतीय दंड संहिता यानि आईपीसी के सेक्शन 124-A के अंतर्गत किसी पर राजद्रोह का आरोप लग सकता है. ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की सरकार ने 19वीं और 20वीं सदी में राष्ट्रवादी असंतोष को दबाने के लिए यह कानून बनाए थे. खुद ब्रिटेन ने अपने देश में राजद्रोह कानून को 2010 में समाप्त कर दिया.
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सेक्शन 124-A के अनुसार जो भी मौखिक या लिखित, इशारों में या स्पष्ट रूप से दिखाकर, या किसी भी अन्य तरीके से ऐसे शब्दों का प्रयोग करता है, जो भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के लिए घृणा या अवमानना, उत्तेजना या असंतोष पैदा करने का प्रयास करे, उसे दोषी सिद्ध होने पर उम्रकैद और जुर्माना या 3 साल की कैद और जुर्माना या केवल जुर्माने की सजा दी जा सकती है.
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"देश विरोधी" नारे और भाषण देने के आरोप में हाल ही में दिल्ली की जेएनयू के छात्रों, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एसएआर गिलानी से पहले कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी, लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अरुंधती रॉय, चिकित्सक और एक्टिविस्ट बिनायक सेन जैसे कई लोगों पर राजद्रोह का आरोप लगा.
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सन 1837 में लॉर्ड टीबी मैकॉले की अध्यक्षता वाले पहले विधि आयोग ने भारतीय दंड संहिता तैयार की थी. सन 1870 में ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन ने सेक्शन 124-A को आईपीसी के छठे अध्याय में जोड़ा. 19वीं और 20वीं सदी के प्रारम्भ में इसका इस्तेमाल ज्यादातर प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लेखन और भाषणों के खिलाफ हुआ.
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पहला मामला 1891 में अखबार निकालने वाले संपादक जोगेन्द्र चंद्र बोस का सामने आता है. बाल गंगाधर तिलक से लेकर महात्मा गांधी तक पर इस सेक्शन के अंतर्गत ट्रायल चले. पत्रिका में छपे अपने तीन लेखों के मामले में ट्रायल झेल रहे महात्मा गांधी ने कहा था, "सेक्शन 124-A, जिसके अंतर्गत मुझ पर आरोप लगा है, आईपीसी के राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए रचे गए कानूनों का राजकुमार है."
सन 1947 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिलने के बाद से ही मानव अधिकार संगठन आवाजें उठाते रहे हैं कि इस कानून का गलत इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ किए जाने का खतरा है. सत्ताधारी सरकार की शांतिपूर्ण आलोचना को रोकना देश में भाषा की स्वतंत्रता को ठेस पहुंचा सकता है.
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सन 1962 के एक उल्लेखनीय 'केदार नाथ सिंह बनाम बिहार सरकार' मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखने का निर्णय लिया था. हालांकि अदालत ने ऐसे भाषणों या लेखनों के बीच साफ अंतर किया था जो “लोगों को हिंसा करने के लिए उकसाने वाले या सार्वजनिक अव्यवस्था पैदा करने की प्रवृत्ति वाले हों.”
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आलोचक कहते आए हैं कि देश की निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज करती आई हैं और राज्य सरकारों ने समय समय पर मनमाने ढंग से इस कानून का गलत इस्तेमाल किया है. भविष्य में इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कुछ लोग केंद्र सरकार से सेक्शन 124-A की साफ, सटीक व्याख्या करवाने, तो कुछ इसे पूरी तरह समाप्त किए जाने की मांग कर रहे हैं.