अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का कहना है यूरोपीय देशों को अपने उन नागरिकों को वापस लेना चाहिए जो आईएस की तरफ से लड़ रहे थे और इसी दौरान कुर्दों ने उन्हें बंदी बना लिया.
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ट्रंप का ये संदेश उनके चिरपरिचित और धमकी भरे अंदाज में आया है. लेकिन माने या न माने अमेरिकी राष्ट्रपति की ये मांग काफी हद तक सही भी है. ट्रंप कह रहे हैं कि यूरोपीय देशों को अपने उन नागरिकों को वापस लेना चाहिए जो आईएसआईएस की तरफ से लड़ रहे थे और इसी दौरान कुर्दों ने उन्हें सीरिया में बंदी बना लिया था. स्थानीय कुर्दिश प्रशासन लंबे समय से उत्तरी सीरिया में बंद सैकड़ों यूरोपीय लड़ाकों को वापस लेने की बात कर रहा है.
लेकिन कुर्दिश प्रशासन की मांग को अब तक जानबूझ कर यूरोपीय देश नकराते रहे हैं, लेकिन अब सीधे-सीधे अमेरिकी व्हाइट हाउस ने इसमें दखल दिया है.
उत्तरी सीरिया की सलाखों में जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन की सैकड़ों महिलाएं भी बंद हैं. इनमें से कई के बच्चे भी हैं. वे बच्चे जो आईएस के क्षेत्र में पैदा हुए. वहीं अब सीरिया के बागुज में आईएस का किला ढहने के बाद अंदाजा लगाया जा रहा है कि ये संख्या और बढ़ेगी.
कुर्दिश प्रशासन पर बोझ
उत्तरी सीरिया में बंद ऐसे कैदी कुर्दिश प्रशासन के लिए भारी बोझ बन गए हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की सीरिया से अमेरिकी फौजों को निकालने की योजना स्थानीय प्रशासन पर और भी बोझ डाल सकती है. वहीं अमेरिकी फौजों का सीरिया से निकलना देश के अल्पसंख्यक कुर्दिश समुदाय के भविष्य पर भी कई सवाल खड़े कर रहा है. दरअसल सीरिया में अमेरिका का सबसे बड़ा सैन्य साथी रही है कुर्दिश पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट (वाईपीजी).
कौन हैं आजादी मांग रहे कुर्द लोग
इराक में आजादी के हक में कुर्द लोगों के जनमत संग्रह ने सबका ध्यान खींचा था. चलिए जानते हैं कौन कुर्द लोग.
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आबादी और इलाका
कुर्दों की आबादी ढाई से साढ़े तीन करोड़ के बीच माना जाती है. ये लोग पांच देशों इराक, सीरिया, तुर्की, ईरान और अर्मेनिया में फैले पहाड़ी इलाके में रहते हैं.
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सहज नहीं संबंध
कुर्दों का अपना अलग देश नहीं है. लेकिन वे स्वायत्ता या फिर आजादी के लिए लंबे समय से मुहिम चला रहे हैं. इसीलिए तुर्की, इराक, सीरिया और ईरान की सरकारों से उनके संबंध सहज नहीं रहे हैं.
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कुर्दिस्तान
1992 में इराक में कुर्दिस्तान रीजनल गवर्नमेंट बनी. इराक के कुर्दिस्तान इलाके में पहली बार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई संसद कुर्दिस्तान नेशनल असेंबली ने यह सरकार बनायी थी.
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आबादी में हिस्सेदारी
कुर्दिस्तान की सरकार के मुताबिक इराकी कुर्दिस्तान में 52 लाख कुर्द रहते हैं. वहीं सीआईए फैक्टबुक के अनुसार आबादी के लिहाज से सीरिया में 10 प्रतिशत, तुर्की में 19 प्रतिशत, इराक में 15-20 प्रतिशत और ईरान में 10 प्रतिशत हिस्सेदारी कुर्दों की है.
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अपनी सेना
इस सरकार की अपनी संसद होने के साथ साथ सेना (पेशमर्गा) भी है. आईएस से लोहा लेने में पेशमर्गा लड़ाके अकसर सुर्खियों में रहते हैं. कुर्दिस्तान सरकार के अपने बॉर्डर और विदेश नीति भी है.
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धार्मिक विश्वास
कुर्दों में ज्यादातर लोग सुन्नी इस्लाम को मानने वाले हैं, लेकिन इस समुदाय में कई और धर्मों के मानने वाले लोग भी शामिल हैं. साझा संस्कृति इन लोगों को आपस में जोड़ती है.
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अलग देश का सपना
ऑटोमन साम्राज्य के पतन और पहले विश्व युद्ध के बाद विजेता पश्चिमी गठबंधन ने 1920 की सेवरेस संधि में कुर्दों के अलग देश का प्रावधान रखा था, लेकिन बीते 80 साल में ऐसी हर कोशिश को कुचला गया है.
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विरोध
कुर्दिस्तान में अलग देश के समर्थन में हुए जनमत संग्रह को न सिर्फ इराक ने खारिज किया है, बल्कि तुर्की के राष्ट्रपति ने इस इलाके की नाकेबंदी कर देने की धमकी दी है.
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तुर्की और ईरान का डर
तुर्की और ईरान को लगता है कि ऐसे जनमत संग्रह के चलते उनके यहां भी कुर्द आजादी की मांग उठा सकते हैं. इन दोनों देशों के कुर्दिस्तान इलाके के साथ व्यापारिक संबंध हैं, जिन्हें अब वे खत्म करने की धमकी दे रहे हैं.
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अमेरिका भी साथ नहीं
कई पश्चिमी देशों ने भी कुर्दों के जनमत संग्रह को मानने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है कि इससे मध्यपूर्व में हालात और भी अस्थिर होंगे. हालांकि कुर्दों के लिए अधिक स्वायत्ता की कई देश पैरवी करते हैं.
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वाईपीजी सीरिया में कुर्दिश समाज की आजादी के लिए लड़ रही है. इस टुकड़ी को सीरिया के उत्तरी पड़ोसी मुल्क तुर्की एक आतंकवादी संगठन करार दे चुका है. तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोवान सीरिया में वाईपीजी के नेतृत्व में लड़ रहे कुर्दिश समुदाय की आजाद होने की उम्मीदों को जल्द से जल्द खत्म करना चाहते हैं.
कयास लगाए जा रहे हैं कि जैसे ही अमेरिका सीरिया से हटेगा, वैसे ही तुर्की सीमा से 30 किमी की चौड़ाई वाला एक सिक्योरिटी कॉरिडोर (गलियारा) बना लेगा. लेकिन कुर्द समुदाय की सबसे अहम रिहायशी बस्तियां और यहां तक की उनकी जेलें भी इसी इलाके में हैं. इसी कॉरिडोर को बनाने की आशंका के बीच कुर्दों के लिए सबसे बड़ा समस्या अपने अस्तित्व को बचाने की हो जाएगी. इसके बाद ही वे गौर करेंगे कि इस्लामिक स्टेट के बंदी लड़ाकों का ख्याल कैसे रखा जाए.
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जहां तक इस मुद्दे की बात है, जर्मनी मुद्दे का हल निकालने की बजाए औपचारिकताओं में छुपता रहा है. इस उम्मीद में कि इस समस्या को नकारने से ही यह समस्या अपने आप सुलझ जाएगी. जर्मनी के विदेश मंत्री ने हाल में एक टालने वाला बयान दिया था. विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि वह सीरिया में 2012 से दूतावास बंद होने के चलते किसी को भी कॉन्सुलर सेवाएं मुहैया नहीं हो सकती हैं. साथ ही उत्तरी सीरिया में अब तक कुर्दों के साथ किसी भी तरह के राजनयिक संबंध स्थापित नहीं किए गए हैं.
ढुलमुल रवैया
तमाम विवादों के बीच सच्चाई तो यही है कि कोई भी देश दर्जनों आईएस लड़ाकों को वापस लेने का इच्छुक नहीं है. लेकिन यूरोपीय देशों का ये रुख किसी अंजाम तक नहीं पहुंचेगा क्योंकि इस पूरे मसले में शामिल लोगों पर यूरोप को फैसला लेना ही होगा.
जर्मनी एक ऐसा देश है जो कानून के शासन पर चलता है. ऐसे जर्मन नागरिक जो किसी आतंकवादी संगठन से भी जुड़े रहे हैं उनके पास भी अपने देश में अधिकार हैं. उनके पास वापस आने का अधिकार भी है. अपराध और दोषी साबित करने के लिए जर्मनी में हर एक को व्यक्तिगत रूप से दोषी साबित करना होगा. कुल मिलाकर बात यही है कि ये लोग जर्मन समाज से निकले हैं. उनमें यही कट्टरता पैदा की गई जिनसे अब हमें निपटना होगा.
शायद यहां कुछ नए समाधान निकाले जा सकें. मसलन अगर आईएस सदस्यों को द हेग की अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के समक्ष पेश किया जाए? तमाम संभावनाओं के बीच एक बात को तो निश्चित है कि उत्तरी सीरिया को यूरोप की ग्वांतानामो जेल नहीं बनाया जा सकता.
ग्वांतानामो जेल अमेरिका की एक ऐसी जेल है जो अकसर मानवाधिकारों हनन के चलते सुर्खियों में रही है. कहा जाता है कि इस जेल में कोई कानून नहीं चलता और आरोपी को अपराधी से ज्यादा खतरनाक माना जाता है. अमेरिका स्वयं यह मानता है कि ग्वांतानामों में कैदियों पर जुल्म ढाया जाता है.
आईएस से लोहा लेतीं ईरान की कुर्द हसीनाएं
ईरान की लगभग दो सौ कुर्द महिलाएं उत्तरी इराक में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ रही हैं. ये महिला फाइटर कुर्दों की फोर्स पेशमर्गा में शामिल हैं और इन्हें अमेरिकी सेना का समर्थन हासिल है.
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पहले गीत, फिर मशीन गन
समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि जब भी आईएस के चरमपंथियों की तरफ से ईरान की इन कुर्द महिलाओं पर मोर्टार गोले दागे जाते हैं तो सबसे पहले ये उनका जबाव लाउडस्पीकर पर गीत गाकर देती हैं. इसके बाद मशीनगनों की तरफ हाथ बढ़ाती हैं और निशाने पर होता है इस्लामिक स्टेट.
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"हमें खौफ नहीं"
21 साल की मानी नसरुल्ला का कहा है कि वो गीत इस वजह से गाती हैं ताकि आईएस के चरमपथियों को और गुस्सा आए. वो कहती हैं, “इसके अलावा हम इन्हें बताना चाहती हैं कि हमें उनका खौफ और डर नहीं हैं.” लगभग दो सौ कुर्द औरतें ईरान छोड़ कर इराक में जंग लड़ रही हैं.
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छह सौ की यूनिट में
ये महिलाएं जिस यूनिट का हिस्सा हैं, उसमें छह सौ लोग शामिल हैं. यह यूनिट कुर्दिस्तान फ्रीडम पार्टी के साथ मिल कर लड़ रही है. कुर्द इसे पीओके के नाम से पुकारते हैं.
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अलग देश की जंग
ये यूनिट अब इराक और अमेरिकी सेना के साथ मिल कर काम कर रही है. कुर्द लोग अपने लिए एक अलग देश के लिए भी लड़ रहे हैं.
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विरोध
कुर्द लोग ईरान, सीरिया, इराक और तुर्की के कुछ हिस्सों को मिलाकर अपना अलग देश चाहते हैं. लेकिन इसका काफी विरोध होता है. तुर्की तो कुर्द बागियों के खिलाफ कार्रवाई भी कर रहा है.
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"लड़ते रहेंगे"
एक महिला कुर्द सैनिक का कहना है कि वो अपनी सरमजीन की हिफाजत के लिए लड़ रही है. अब वो सरजमीन चाहे ईरान के कब्जे में हो या इराक के. इनके सामने चाहे इस्लामिक स्टेट हो या कोई और दूसरी ताकत, वो अपनी अपनी सरजमीन की आजादी के लिए लड़ती रहेंगी.
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आईएस की कोई परवाह नहीं
इस समय ये महिलाएं पुरुष कुर्दों के साथ उत्तरी इराक में स्थित फजलिया नाम के एक देहाती इलाके में लड़ रही हैं. एक 32 वर्षीय महिला फाइटर का कहना है, “ये सच है कि इस्लामिक स्टेट खतरनाक है, लेकिन हमें उसकी परवाह नहीं है.”
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"मैं भी दूंगी जबाव"
वहीं एक अन्य फाइटर का कहना है कि उसने पेशमर्गा में शामिल होने का फैसला उस वक्त किया था जब हर तरफ से ये खबरें आ रही थीं कि इस्लामिक स्टेट के चरमपंथी महिलाओं के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते हैं. “मैंने फैसला किया कि मैं भी उनको जवाब दूंगी.”
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विवाद
हालांकि उत्तरी इराक में इन महिलाओं की मौजूदगी को लेकर विवाद भी हो रहा है. ईरान ने कुर्दिस्तान की क्षेत्रीय सरकार पर इन महिलाओं को बेदखल करने का दबाव बढ़ दिया है. 2016 में कुर्द लड़ाकों की ईरानी सेना के साथ कम से कम छह बार झड़पें हो चुकी हैं.
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गर्व
इन महिलाओं के पुरुष कमांडर हाजिर बाहमानी कहते हैं कि इनके साथ पुरुषों जैसा ही बराबर सलूक किया जाता है और उन्हें इन महिलाओं पर गर्व है. इन्हें छह हफ्ते की स्नाइपर ट्रेनिंग भी दी गई है.