अमेरिका में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि कुछ वक्त के लिए अमेरिका में मुसलामानों का आना बंद कर दिया जाना चाहिए. ट्रंप के इस बयान को सोशल मीडिया में जम कर ट्रोल किया गया.
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अमेरिका में हुआ हमला आतंकी था, इस बात की पुष्टि हो जाने के बाद राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा बयान दिया जिसने मुसलामानों को काफी आहत किया है. जहां सोशल मीडिया में अमेरिकी मुसलमानों की गुस्से से भरी प्रतिक्रिया देखने को मिली, वहीं भारत में लोगों ने ट्रंप को हंसी का पात्र बना दिया. ट्रंप की बयानबाजी की लोग भारत के नेताओं से भी तुलना कर रहे हैं और लिख रहे हैं कि ताजा बयान दिखाता है कि "बेवकूफ" नेता दुनिया में कहीं भी हो सकते हैं, वे केवल भारत में ही नहीं मिलते.
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करने से पहले से ही विवादास्पद बयान देने शुरू कर दिए थे. जानकार इसे हर वक्त सुर्खियों में बने रहने का तरीका मानते हैं. ट्रंप के बयान कभी मुस्लिम विरोधी, कभी महिला विरोधी तो कभी शरणार्थी विरोधी होते हैं. ऐसे में भारत में लोग इसे इन दिनों देश में चल रही असहिष्णुता की बहस से जोड़ कर भी देख रहे हैं और सवाल कर रहे हैं कि अगर भारत असहिष्णु है, तो ट्रंप जैसे लोगों के रहते अमेरिका क्या है.
साथ ही आमिर खान के देश छोड़ कर जाने वाले बयान पर भी चुटकी ली जा रही है कि अगर ट्रंप अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बन गए, तो आमिर भारत छोड़ कर अमेरिका नहीं जा सकेंगे.
किसी ने तो यह भी लिखा है कि अगर ट्रंप के तर्क से चला जाए, तो ओबामा विदेश यात्रा करने के बाद, दोबारा अमेरिका में प्रवेश नहीं पा सकेंगे.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ट्रंप की तुलना हिटलर से की जा रही है. लोग ट्रंप और हिटलर की नीतियों की सूची बना कर तुलना कर रहे हैं. लेकिन भारत में लोग ट्रंप को अपने नेताओं से जोड़ कर देख रहे हैं. कोई राहुल गांधी के साथ उनकी तुलना कर रहा है, कोई आजम खान से, तो कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से. ऐसा भी लिखा जा रहा है कि ट्रंप आरएसएस से नाता रखते हैं.
भारत में जिस तरह से डोनाल्ड ट्रंप को ट्रोल किया जा रहा है, उसे देख कर तो लगता है कि उनके बयान को संजीदगी से नहीं लिया गया. लेकिन यह बयान अगले साल अमेरिका में होने वाले चुनाव में अहम साबित हो सकते हैं.
परवान चढ़ता उग्र दक्षिणपंथ
इस्लामी कट्टरपंथ और शरणार्थी संकट ने पश्चिमी देशों में उग्र दक्षिणपंथ का खतरा बढ़ाया. कट्टरपंथी हमलों और शरणार्थियों से घबराए लोगों का गुस्सा इस्लाम और सरकारों पर उतर रहा है. मुख्य धारा की पार्टियां समर्थन खो रही हैं.
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बढ़ता असर
उग्र दक्षिणपंथी पार्टियों का पॉपुलिज्म यूरोप के लिए नया नहीं है, पिछले कुछ सालों से ईयू की कथित मनमानियों और आर्थिक मुश्किलों के कारण उग्र दक्षिणपंथ के लिए समर्थन बढ़ रहा था लेकिन शरणार्थियों के आने से उसमें और इजाफा हुआ है.
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फ्रांस में ले पेन
पेरिस पर आतंकी हमलों के तुरंत बाद फ्रांस में हुए स्थानीय चुनावों में मारी ले पेन की उग्र दक्षिणपंथी नेशनल फ्रंट पार्टी को फायदा पहुंचा है और वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद की सोशलिस्ट पार्टी तीसरे नंबर पर खिसक गई है.
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स्विट्जरलैंड पर भी असर
स्विट्रजरलैंड कभी भी उग्र दक्षिणपंथ का गढ़ नहीं रहा. लेकिन यूरोप के शरणार्थी संकट के बीच अक्टूबर में हुए चुनावों में आप्रवासन विरोधी स्विस पीपुल्स पार्टी एसवीपी को 11 अतिरिक्त सीटें मिली और उसने संसद की 200 में से 65 सीटें जीत लीं.
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जर्मनी में पेगीडा
जर्मनी में पिछले कई महीनों से आप्रवासन विरोधी ड्रेसडेन शहर में हर सोमवार को प्रदर्शन कर रहे हैं. हालांकि प्रदर्शनों को हर शहर में ले जाने का उनका प्रयास विफल रहा है लेकिन आप्रवासन विरोधी एएफडी पार्टी के लिए समर्थन बढ़ रहा है.
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फिनलैंड में जीत
इस साल फिनलैंड में हुए चुनावों में राष्ट्रवादी फिन्स पार्टी संसद में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. कुछ लोगों का कहना है कि आप्रवासी विरोधी भावना से शरणार्थियों का बड़ी संख्या में आना उग्र दक्षिणपंथ को बढ़ावा दे रहा है.
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पोलैंड का रास्ता
पोलैंड में पिछले दिनों हुए चुनावों में अति दक्षिणपंथी पार्टी की जीत हुई है और प्रधानमंत्री बेयाटा सीडलो की सरकार ने ईयू के कोटे के अनुसार शरणार्थियों को लेने से साफ मना कर दिया है. वह पिछले सरकार के फैसले को मानने के लिए तैयार नहीं हैं.
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हंगरी में राष्ट्रवाद
हंगरी में विक्टर ओरबान की अनुदारवादी पार्टी 2010 में ही भारी बहुमत से सत्ता में आ गई थी. तब से वह अति राष्ट्रवादी फैसले लेती रही है और यूरोपीय मूल्यों से दूर होती रही है. देश में राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों पर संदेह का बोलबाला है.
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डेनमार्क में प्रभाव
जून में हुए संसदीय चुनावों में डेनमार्क की उग्र दक्षिणपंथी पार्टी डैनिश पीपुल्स पार्टी संसद में दूसरे नंबर पर रही है. शरण को पूरी तरह बंद करने की मांग करने वाली पार्टी को 21 प्रतिशत मत मिले. सोशल डेमोक्रैट्स भी वहां शरण पर सीमा का समर्थन करते हैं.
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ग्रीस में सात प्रतिशत
ग्रीस में पिछले सितंबर में हुए संसदीय चुनावों में उग्र दक्षिणपंथी पार्टी गोल्डन डाउन को महत्वपूर्ण सफलता मिली. उसे 7 प्रतिशत मतदाताओं का समर्थन मिला और नई संसद में वह तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.