हर तरफ से पड़ रहे दबाव के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने आप्रवासी परिवारों के बच्चों को मां-बाप से अलग न करने वाले एक्जीक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत किए.
बिना दस्तावेजों के अमेरिका आने वाले आप्रवासी परिवारों को हिरासत केंद्रों में रखा जाता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की नीतियों के चलते ऐसे परिवारों के बच्चों को माता-पिता से अलग केंद्रों में रखा जा रहा था. इस नीति की अमेरिका के भीतर और दुनिया भर में कड़ी निंदा हुई. डिटेंशन सेंटरों से ऐसे कई वीडियो आए जिनमें बिलखते बच्चों को उनके मां बाप से अलग किया जा रहा था. बच्चे भी रो रहे थे और मां बाप भी. इन दृश्यों ने जनमानस में ट्रंप की नीतियों के प्रति आक्रोश जगाया. चारों तरफ से बढ़ते दबाव के बीच ट्रंप को आखिरकार यह फैसला वापस लेना पड़ा.
बुधवार को राष्ट्रपति ने आप्रवासी परिवारों को अलग न करने का वचन देने वाला एक्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी किया. इस आदेश के तहत अब अवैध तरीके से अमेरिका पहुंचने वाले परिवारों के बच्चों को अलग नहीं किया जाएगा. लेकिन जिन बच्चों को इस आदेश से पहले ही परिवारों से अलग किया जा चुका है, उन्हें इस ऑर्डर से राहत नहीं मिलेगी. अमेरिकी इमीग्रेशन अधिकारियों के मुताबिक पांच मई 2018 से 9 जून 2018 के बीच 2,342 बच्चों को उनके परिवारों से अलग किया गया.
मां बाप से अलग किए गए हजारों बच्चेतस्वीर: Getty Images/J. Moore
एक्जीक्यूटिव ऑर्डर पर दस्तखत करने के बाद ट्रंप ने कहा, "यह परिवारों को साथ रखने के लिए है. मुझे परिवारों को अलग अलग करने का दृश्य पंसद नहीं आया." लेकिन ट्रंप ने एक बार फिर कहा कि उनका प्रशासन अवैध रूप से अमेरिका में दाखिल होने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने में कोई रियायत नहीं देगा.
नए आदेश के तहत कानूनी कार्रवाई पूरी होने तक हिरासत में रखे गए आप्रवासियों को उनके परिवार के साथ रखा जाएगा. ट्रंप के मुताबिक उनकी पत्नी मेलानिया और बेटी इवांका ट्रंप ने उन पर इस पुरानी नीति को रद्द करने का दबाव बनाया.
आप्रवासियों से जुड़ी नीति पर यू टर्न लेने से पहले ट्रंप ने कहा था कि "आप यह काम एक्जीक्यूटिव ऑर्डर से नहीं कर सकते." राष्ट्रपति के मुताबिक अमेरिकी संसद आप्रवासन सुधारों से जुड़ी नीतियों को पास कर ऐसा आसानी से कर सकती है. ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के नेता पॉल रायन ने कहा कि संसद सदस्य गुरुवार को परिवारों को साथ रखने वाले विधेयक पर मतदान करेंगे.
(अच्छे जीवन के लिए दुनिया में भागदौड़ मची हुई है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया के तकरीबन 24.4 करोड़ लोग अब उन देशों में नहीं रहते जहां वे पैदा हुए थे. साथ ही करीब 2.3 करोड़ लोग अपना देश छोड़ने की तैयारी में हैं. )
भाग कर कहां जाते हैं लोग?
अच्छे जीवन के लिए दुनिया में भागदौड़ मची हुई है. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया के तकरीबन 24.4 करोड़ लोग अब उन देशों में नहीं रहते जहां वे पैदा हुए थे. साथ ही करीब 2.3 करोड़ लोग अपना देश छोड़ने की तैयारी में हैं.
तस्वीर: picture alliance/dpa/Str
यूरोप नहीं आते
ऐसा माना जाता है कि अच्छे जीवन के लिए ये प्रवासी यूरोप का रुख करते हैं. हालांकि एक जर्मन संस्था "ब्रेड फॉर द वर्ल्ड" के मुताबिक दुनिया के तकरीबन 90 फीसदी शरणार्थी विकासशील देशों में रहते हैं. उसमें भी एक बड़ा वर्ग अफ्रीकी देशों में रहता है. पैसे न होने के कारण ये लोग लंबी यात्रायें नहीं करते और पड़ोस के देशों में चले जाते हैं.
तस्वीर: picture alliance/dpa/Str
सोमालिया से इथियोपिया
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक इथियोपिया शरणार्थियों को जगह देने वाला दुनिया का पांचवां बड़ा देश है. यहां अधितकर शरणार्थी पड़ोसी देश सोमालिया से आते हैं जहां 1990 के दशक से ही गृह युद्ध की स्थिति बनी हुई है. संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ें मुताबिक सोमालिया से तकरीबन 10 लाख लोग भागकर इथियोपिया गये. इसके बाद केन्या का नंबर आता है जो शरणार्थियों का एक बड़ा ठिकाना बनकर सामने आया है.
तस्वीर: DW/S. Schlindwein
अन्य देशों की नीतियां
इथियोपिया की तरह ही, युगांडा भी शरणार्थियों को लेकर नरम नीति रखता है. यही कारण है कि गृह युद्ध झेल रहे कांगों और दक्षिण सूडान से भागकर लोग युगांडा में शरण लेते हैं. हालांकि दक्षिण सूडान की यात्रा इन लोगों के लिए बेहद ही खतरनाक होती है और छिपते-छिपाते ये लोग वहां से निकल पाते हैं.
तस्वीर: DW/S. Schlindwein
अमेरिका भी ठिकाना
अमेरिकी राष्ट्रपति मेक्सिको और अमेरिका के बीच दीवार खड़ी करने का समर्थन करते हैं. द माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट मुताबिक अमेरिका में तकरीबन 1.1 करोड़ लोग बिना रेजिडेंसी परमिट के रहते हैं, जिनमें से तकरीबन आधे मेक्सिको से आये हैं. इसके अलावा अल सल्वाडोर, ग्वाटेमाला जैसे देशों से आने वालों के लिए मेक्सिको ट्रांजिट की तरह काम करता है.
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एशिया भी नहीं अछूता
सिर्फ अमेरिका और अफ्रीका ही नहीं बल्कि एशिया भी शरणार्थियों की समस्या से जूझ रहा है. स्टडी के मुताबिक म्यांमार और बांग्लादेश से तमाम लोग थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया का रुख करते हैं. इसमें से अधिकतर रोहिंग्या मुसलमान हैं. अगस्त के आखिरी हफ्ते में म्यांमार के रखाइन प्रांत में हुई हिंसा के बाद से अब तक बड़ी तादाद में रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश गए हैं.