आतंकवादी दुनिया को पहले से ज्यादा असुरक्षित बना रहे हैं. वहीं डाटा जमा करना भी अरबों डॉ़लर का कारोबार बन चुका है. इनके चलते दुनिया में हर किसी की निगरानी होने लगी है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/J. C. Bott
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इमारतों के अंदर हो या खुली जगहों पर, लोगों पर हर जगह नजर रखी जा रही है और वह भी कई तरीकों से. हमारे सेलफोन लगातार बताते रहते हैं कि हम कहां हैं. गूगल में हर सर्च हमारे डिजिटल प्रोफाइल को मुकम्मल करता रहता है. चाहे आम लोग हों या राजनीतिज्ञ, हम सबने दूसरे लोगों द्वारा इकट्टा किये जा रहे अपने डाटा के ऊपर नियंत्रण खो दिया है. कौन किस पर नजर रख रहा है और क्यों, ये बात हाल में बर्लिन में फोटो प्रदर्शनियों में दिखाई गई.
1970 के दशक में किसी की निगरानी ऐसे की जाती थी. एक व्यक्ति और बहुत सारे मॉनिटर. क्या ये शख्स तस्वीरों पर नियंत्रण रख सकता है?
और अगर वह कोई अपराध देखता भी है तो वह बहुत दूर है. इस बीच तकनीक और बेहतर हो गई है. यूरोपीय सीमा पुलिस फ्रोंटेक्स के कर्मी मध्य सागर पर उड़ान भर रहे हैं. वे शरणार्थियों की नावों को पकड़ने के लिए हाई रिजॉल्यूशन कैमरों की मदद लेते हैं. इससे उन्हें घटनास्थल के करीब जाने की जरूरत नहीं. जूलियान रोएडर ने अपनी तस्वीर में इसी पहलू पर ध्यान दिया है. कलाकार रोएडर कहते हैं, "दूरी भले ही बहुत ज्यादा हो लेकिन इस दूरी को तकनीक और रिकॉर्डिंग सिस्टम की मदद से भर दिया गया है."
ड्रोनों से निगरानी भी, हमले भीतस्वीर: Getty Images/I. Brekken
लोगों की निगरानी हमेशा से हो रही है. पहले कहा जाता था कि ऊपर वाला सब देख रहा है. वह हर चीज और हर किसी को देखता था और वह भी बिना तकनीक के. प्रकृति में भी लोगों को ध्यान रखना पड़ता था. नीदरलैंड की एक कहावत है कि खेतों की आंखें होती हैं और जंगल के कान. ये तस्वीर 16वीं सदी की है. लोगों को पता था कि उन्हें देखा जा रहा है.
किसी को डर लगता है कि कोई उनकी बात सुन रहा है, तो कोई दूसरा इस डर से खुद दूसरों की बातें सुनता है. एक राजा का काल्पनिक जासूसी यंत्र. आज की मशीनों से कितना मिलता जुलता है. आज इसकी जगह बड़े रडारों ने ले ली है. फोटोग्राफी म्यूजियम की यूकिको यामागाता इसकी वजह समझाती हैं, "मैं समझती हूं कि ये मामला ज्यादा अहम होता जा रहा है क्योंकि सरकारी एजेंसियां जासूसी करने की अपनी क्षमता बढ़ा रही है और तकनीक इसमें मदद दे रही है. और इस तरह की गतिविधियों के लिए लोगों की सहनशीलता भी बढ़ रही है क्योंकि आतंकवाद और भारी हिंसा के कारण डर और उन्माद की संस्कृति फैल रही है."
इसीलिए सालों तक न्यू यॉर्क में सभी मुसलमानों की हर दिन निगरानी की गई. पुलिस की एक विशेष टुकड़ी के गोपनीय दस्तावेजों के जरिये पता चला कि खरीदारी, प्रार्थना और स्पोर्ट जैसी चीजों की जासूसी की गई. समाचार एजेंसी एपी ने 2011 की इसकी रिपोर्ट भी दी. ये जासूसी के वो तरीके हैं जिन्हें सब लोग कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी के जासूसी विभाग की सूचनाओं से जानते हैं. तब पोस्ट बॉक्स तक जाने वाला हर इंसान संदिग्ध हो सकता था.
(कलाकारों की निगाहों से जासूसी)
कलाकारों की निगाहों से जासूसी
पहले लोगों पर ईश्वर की नजर होती थी, अब लोग निगरानी करने वाली सरकारों से घबराते हैं. बर्लिन की तीन प्रदर्शनियों में कलाकार जासूसी की दुनिया से पर्दा उठाने की कोशिश कर रहे हैं.
तस्वीर: Edu Bayer
छुपे रुस्तम
पूर्वी जर्मन खुफिया पुलिस स्टाजी की आर्काइव से ली गई यह तस्वीर ट्रेनिंग के लिए इस्तेमाल होती थी कि जासूस अपने को सामान्य नागरिक कैसे दिखा सकते हैं. यह बर्लिन के फोटोग्राफर सिमोन मेनर की प्रदर्शनी में दिखाई जा रही है.
तस्वीर: Simon Menner/BStU
सबूत की तस्वीर
प्रदर्शनी में कलाकारों की ऐसी तस्वीरें भी दिखाई जा रही है जो जासूसी के सबूत देती हैं. न्यू यॉर्क के आर्टिस्ट एडु बायर की यह तस्वीर लीबिया के तानाशाह गद्दाफी के खुफिया दफ्तरों की तस्वीरों के कलेक्शन में शामिल है.
तस्वीर: Edu Bayer
जासूस बना कलाकार
एंड्रू हैमरंड ने यह तस्वीर अमेरिकन मिडवेस्ट के एक नियोजित इलाके में एक चर्च के ऊपर लगाए गए कैमरे से ली है. उन्होंने इंटरनेट का इस्तेमाल कर कैमरे को ऑपरेट किया और उससे छोटे से शहर और उसके निवासियों की तस्वीरें लीं.
तस्वीर: Andrew Hammerand
रंगीन सेंसर
बेल्जियम के आर्टिस्ट मिश्का हेनर ने डच लैंडस्केप नामक सिरीज तब तैयार की जब उन्हें पता चला कि रंगीन धब्बों की मदद से गूगल मैप शाही महल और सेना के बैरकों जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण इमारतों को सेंसर कर रहा है.
तस्वीर: Mishka Henner
धीरे धीरे आता डर
यह तस्वीर साल 1546 की है, जिसमें एक इंसान को जंगल की ओर बढ़ते दिखाया गया है. पेड़ों के कान और धरती की आंखें बता रही हैं कि वह अकेला नहीं है, उसकी निगरानी हो रही है. इंसान के साथ एक खरगोश है जो डर का परंपरागत प्रतीक है.
तस्वीर: Kupferstichkabinett, Staatliche Museen zu Berlin/J. Anders
दिव्य आंखें
जाक कैलो की यह तस्वीर साल 1628 की है. इसमें ईश्वर की दिव्य आंखों को इंसानियत के ऊपर निगरानी करते दिखाया गया है. लेकिन आजकल दिव्य उपस्थिति की प्रतीक आंखें बिग ब्रदर का पर्याय बन गई हैं जो लोगों को हर कहीं देखती रहती है.
तस्वीर: Kupferstichkabinett, Staatliche Museen zu Berlin/D. Katz
घूरती निगाहें
प्रदर्शनी में सीसीटीवी से ली गई बैंक डकैती की भी तस्वीरें हैं, जो अमेरिकी अखबारों के आर्काइव से ली गई हैं. ये तस्वीरें लाइपजिष में विजुअल आर्ट्स के प्रोफेसर गुंटर कार्ल बोस के कलेक्शन से हैं जो उन्होंने ई-बे पर खरीदी थीं.
तस्वीर: Günter Karl Bose
कसैले सबक
प्रदर्शनियों में तस्वीरों के अलावा वीडियो भी दिखाई जा रही है. इनमें हीतो श्टायर्ल की व्यंग्य फिल्म हाव टू बी सीन भी शामिल है. इस फिल्म में लोगों को यह सलाह दी गई है कि डिजीटल तकनीक का इस्तेमाल करते हुए अगोचर कैसे रहें.
तस्वीर: Hito Steyerl, courtesy of the artist and Andrew Kreps Gallery, New York
वैकल्पिक सच
साइडेन की स्टिकी फ्लोर्स 9 चैनल वाला वीडियो इंस्टॉलेशन है जिसमें एक बार और रेस्तरां का सीसीटीवी वीडियो दिखाया जा रहा है. स्वीडन की साइडेन अपने काम में अक्सर वैकल्पिक कथानकों के विचार की छानबीन करती हैं.
तस्वीर: Ann-Sofi Sidén, courtesy of the artist and Galerie Barbara Thumm
सीमा की सुरक्षा
हाई परफॉर्मेंस कैमरा नाम की इस कृति में बर्लिन के फोटोग्राफर यूलियान रोएडर ने यूरोपीय संघ के उन यंत्रों को कैद किया है जिनका इस्तेमाल ईयू अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए करता है. पूर्वी जर्मनी में जन्मे रोएडर का काम अक्सर निगरानी से जुड़ा होता है.