पाकिस्तान के उत्तरी क्षेत्र में स्थित पहाड़ी इलाके से चरमपंथियों के सफाए की सरकार की कोशिशें और तालिबान के फाटा पर नियंत्रण के बीच चल रहे संघर्ष में लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा से वंचित हो रहे हैं.
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पुराने घरों के मलबे पर दौड़ते भागते या फिर रिफ्यूजी कैंपों के बाहर बैठे बच्चे. यहां बिना शिक्षा पाए हजारों बच्चे बड़े हो रहे हैं. क्योंकि स्कूलों को या तो आतंकियों ने बम से उड़ा दिया है या फिर उन्हें राहत कैंपों में तब्दील कर दिया गया है. 2001 में अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद तालिबान वहां से भाग कर सीमा पार पाकिस्तान में दाखिल हो गया. उसके बाद से ही स्कूल कट्टरपंथियों के निशाने पर हैं.
तालिबान ने पाकिस्तान के उत्तरी इलाकों के निवासियों पर अपना कानून लागू करना शुरू कर दिया. गैर इस्लामी करार देते हुए धर्मनिरपेक्ष स्कूली शिक्षा पर रोक लगा दी गई. मामला तब और खराब हो गया जब सेना ने 18 जून को तालिबान के खिलाफ अभियान छेड़ दिया. इसकी वजह से करीब दस लाख लोगों को उत्तरी वजीरिस्तान में अपना घरबार छोड़ना पड़ा. फाटा में सात जिले आते हैं. इस प्रकार से हजारों बच्चों की स्कूली शिक्षा पर असर पड़ा है.
अधिकारियों का कहना है कि यहां हालात बहुत गंभीर हैं और तुरंत इस समस्या को अधिकारियों द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए. पिछले एक दशक के दौरान फाटा इलाके में तालिबान ने 750 स्कूल को तबाह कर दिया, जिनमें 422 स्कूल सिर्फ लड़कियों के लिए थे. इस वजह से क्षेत्र के 50 फीसदी बच्चे शिक्षा से वंचित हैं. फाटा में शिक्षा निदेशालय के डिप्टी डायरेक्टर इश्तियाकुल्ला खान के मुताबिक, "सैन्य अभियान के समाप्त होने और तालिबान की हार के बाद हम दोबारा स्कूल बनाएंगे."
ताजा विस्थापन के पहले भी फाटा में प्राथमिक स्कूलों में नामांकन दर बहुत कम थी. स्कूल में दाखिला लेने में लड़कों के मुकाबले लड़कियों का प्रदर्शन काफी खराब था. जहां लड़कियों का नामांकन दर 25 फीसदी था वहीं लड़कों का नामांकन दर 42 फीसदी था. साल 2007-2013 के दौरान स्कूल छोड़ने वालों की संख्या में तेज उछाल आया है. 2013 में स्कूल छोड़ने वालों का आंकड़ा 73 फीसदी तक पहुंच गया. क्षेत्र में तालिबान ने अपनी गतिविधि तेज कर दी और परिवारों को सुरक्षित ठिकानों की तलाश में अपना घर छोड़ना पड़ा.
सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए खान कहते हैं कि करीब 5,18,000 प्राथमिक छात्र पिछले एक दशक के दौरान बिना शिक्षा के घर पर बैठे हैं. स्थानीय सरकार खाना, दवाई और छत जैसी बुनियादी जरूरतें मुहैया कराने के लिए जूझ रही है. ऐसे में शिक्षा ठंडे बस्ते में पड़ती दिख रही है. सैकड़ों बच्चों की दोबारा स्कूल जाने की उम्मीद खत्म हो रही है.
एए/एमजे (आईपीएस)
भाषा सीखते बच्चे
पहली कक्षा में कैसे सीखते हैं दुनिया भर के बच्चे अक्षर लिखना और किताबें पढ़ना. देखें तस्वीरों में
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चीनः जितनी जल्दी उतना अच्छा
चीन में तीन साल के बच्चे पहली बार अक्षर देखते हैं और छह साल की उम्र से लिखना शुरू करते हैं. पांचवी कक्षा तक उन्हें 10,000 अक्षर सीखने होते हैं. कड़ी मेहनत का काम. क्योंकि चीनी अक्षर किसी नियम पर नहीं बने हैं. उन्हें बस वैसा का वैसा याद करना पड़ता है.
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जापानः स्कूल खत्म होने तक
जापान के स्कूली बच्चों के लिए लिखना सीखने की प्रक्रिया पहली कक्षा में खत्म नहीं होती. नवीं कक्षा तक हर साल नए अक्षर सिखाए जाते हैं. मूल जापानी शब्द लिखना सीखने के लिए उन्हें 2100 अक्षर सीखने पड़ते हैं. रोज अभ्यास जरूरी है नहीं तो याद होना मुश्किल.
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मिस्रः एक नई भाषा
मिस्र के बच्चे जब लिखना सीखते हैं तो इसके लिए उन्हें नई भाषा सीखनी पड़ती है. क्योंकि इलाकों में बोली जाने वाली बोली मानक अरबी से बहुत अलग है. सरकारी स्कूलों में हर कक्षा में करीब 80 बच्चे होते हैं, इसलिए हर बच्चा उतने अच्छे से सीख नहीं पाता. कुछ बच्चे तो अच्छे से लिखना और पढ़ना कभी नहीं सीख पाते.
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मोरक्कोः सिर्फ अरबी नहीं
कुछ समय पहले तक मोरक्को में बच्चे सिर्फ अरबी भाषा सीखते थे. 2004 से वहां पहली कक्षा में बैर्बर भाषा तामाजिघ्थ सिखाई जाने लगी है. इस कारण बैर्बर इलाके में निरक्षर लोगों की संख्या कम हुई है. 2011 से यह भाषा आधिकारिक बना दी गई है.
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पैराग्वेः आदिवासियों की भाषा
लैटिन अमेरिका में आदिवासियों की भाषा को आगे बढ़ाया जा रहा है. पैराग्वे के बच्चे स्पैनिश तो सीखते ही हैं साथ गुआरानी भी सीखते हैं. लेकिन मुख्य भाषा के तौर पर एक ही चुनी जा सकती है. किसी जमाने में सुंदर लिखना ही सबसे अच्छा था लेकिन आज बच्चों को प्रिंट वाले अक्षर भी सीखने पड़ते हैं.
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कनाडाः नियमों पर नहीं
कनाडा में हर जगह इंग्लिश ही नहीं है यहां एक भाषा इनूक्टिटूट भी है. यह उत्तरी नूनावुट में एस्किमो लोगों की भाषा है. सही शब्द लिखना इसमें कोई मुश्किल नहीं. क्षेत्रीय बोलियों को समझना भी आसान है. जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा जाता है.
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इस्राएलः मदद की जरूरत
इस्राएली बच्चों को हिब्रू सीखना आसान बनाने के लिए अक्षरों की मदद ली जाती है. पहली कक्षा के बच्चों को व्यंजन के साथ कौन सा स्वर लगेगा बताने के लिए अलग अलग स्वरों की तस्वीर बना कर इन्हें अक्षरों के रूप में काट लिया जाता है. फिर इन्हें व्यंजनों के साथ जोड़ना बताया जाता है. लेकिन यह सब सिर्फ पहली कक्षा तक.
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ग्रीकः कई स्वर
कौन सा आई लिखना है... ग्रीस में पहली क्लास के बच्चे अक्सर ये सवाल पूछते हैं. आई स्वर के लिए ग्रीक में छह अलग अलग वर्ण हैं. ई और ओ भी दो तरीके से लिखे जाते हैं. इसके लिए कोई नियम नहीं हैं. इन्हें रटना ही पड़ता है. इसलिए शुरुआती कक्षाओं में शुद्ध लिखना अलग से सिखाया जाता है.
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सर्बियाः एक भाषा, दो लिपियां
सर्बियाई भाषा किरील लिपी में लिखी जा सकती है और लैटिन में भी. बच्चों को दोनों ही सीखनी पड़ती हैं. पहली कक्षा में बच्चे किरील लिपी सीखते हैं और दूसरी कक्षा में लैटिन. कुछ समय बाद बच्चे खुद तय करते हैं कि वह कौन सी लिपी में लिखना चाहते हैं.
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भारतः कई भाषाएं कई लिपियां
भारत की राष्ट्रीय भाषा भले ही हिन्दी हो लेकिन हर राज्य की अपनी अलग भाषा है और अलग लिपी भी. इसलिए पहली कक्षा में बच्चे को हिन्दी, इंग्लिश और राज्य की भाषा सिखाई जाती है. ये जरूरी नहीं कि बच्चे की अपनी मातृभाषा भी इन तीनों में से एक हो. भारत में 22 आधिकारिक भाषाएं हैं.
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पाकिस्तानः दाएं से या बाएं से
किस तरफ से लिखना है, दाएं से या बाएं से. पाकिस्तान में बच्चे दोनों तरफ से लिखना सीखते हैं. क्योंकि पहली कक्षा में उर्दू और इंग्लिश दोनों सिखाई जाती हैं. बच्चों को अंग्रेजी लिखने में परेशानी आती है.
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ईरानः फारसी
ईरान में कई भाषाएं बोली जाती हैं. बच्चे स्कूल में फारसी लिखना सीखते हैं. फारसी मातृभाषा होने पर भी इसे लिखना मुश्किल हो सकता है. इसे इंडो जर्मन भाषा कहा जाता है. सबसे पहले बच्चे सीधी रेखा, वक्र रेखा और तिरछी लकीरें खींचना सीखते हैं इसके बाद शुरू होता है अक्षर ज्ञान.
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जर्मनीः सुन कर लिखें
20 साल पहले जर्मनी में सुन कर लिखने की परंपरा कई स्कूलों में शुरू हुई थी जिस पर काफी बहस है. पहली कक्षा में अक्षरों के साथ एक तस्वीर होती है, जो उस अक्षर का उच्चारण बताती है, ठीक अंग्रेजी के ए फॉर एप्पल जैसी... जर्मन में एफ तो उच्चारण में एफ होता है लेकिन वी का उच्चारण फ जैसा और जे का य जैसा.. इस कारण शब्दों का उच्चारण भी बदल जाता है, हिज्जे भले ही अंग्रेजी जैसे लगे.
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पोलैंडः शुरू से शुरू
पोलैंड में पहली कक्षा से नहीं बल्कि शून्य कक्षा से स्कूल शुरू होता है, यानी एक तरह का किंडरगार्टन. इस क्लास में जाना बच्चों के लिए अनिवार्य है. यहां ये खेल खेल में अक्षरों से पहचान करते हैं. औपचारिक तौर पर लिखने की शुरुआत पहली कक्षा में होती है.