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समाज

उलझती ही जा रही है नागा समस्या

प्रभाकर मणि तिवारी
४ अगस्त २०२१

केंद्र के साथ ऐतिहासिक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर के छह साल बीत जाने के बावजूद केंद्र ने नागालैंड की समस्या पर कथित रूप से चुप्पी साध रखी है. इसके विरोध में उग्रवादी संगठन एनएससीएन ने मंगलवार को 12 घंटे का बंद रखा.

1947 में देश के आजाद होने के समय नागा समुदाय के लोग असम के एक हिस्से में रहते थे.तस्वीर: Mahesh Bhat

एनएससीएन के आह्वान पर हुए 12 घंटे के बंद का असर अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के नागा बहुल इलाकों पर भी पड़ा. दूसरी ओर, राज्य के तमाम विधायकों ने आम राय से सदन में प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले नागालैंड की राजनीतिक समस्या के समाधान की मांग की है. बीते 24 वर्षों से नागा समस्या के स्थायी समाधान के लिए जारी शांति प्रक्रिया अब भी किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं नजर आ रही है. छह साल पहले जिस फ्रेमवर्क समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए केंद्र सरकार अपनी पीठ थपथपा रही थी, वह भी समस्या के समाधान की राह नहीं खोल सका है. कभी अलग झंडे तो कभी अलग संविधान की मांग ने इस शांति प्रक्रिया की राह में लगातार रोड़े अटकाए हैं.

क्या है नागा समस्या?

वर्ष 1947 में देश के आजाद होने के समय नागा समुदाय के लोग असम के एक हिस्से में रहते थे. देश आजाद होने के बाद नागा कबीलों ने संप्रभुता की मांग में आंदोलन शुरू किया था. उस दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा भी हुई थी जिससे निपटने के लिए उपद्रव वाले इलाकों में सेना तैनात करनी पड़ी थी. उसके बाद साल 1957 में केंद्र सरकार और नागा गुटों के बीच शांति बहाली पर आम राय बनी. इस सहमति के आधार पर असम के पर्वतीय क्षेत्र में रहने वाले तमाम नागा समुदायों को एक साथ लाया गया. बावजूद इसके इलाके में उग्रवादी गतिविधियां जारी रहीं.

तीन साल बाद नागा सम्मेलन में तय हुआ कि इस इलाके को भारत का हिस्सा बनना चाहिए. उसके बाद वर्ष 1963 में इसे राज्य का दर्जा मिला और अगले साल यानी 1964 में यहां पहली बार चुनाव कराए गए. अलग राज्य बनने के बावजूद लेकिन नागालैंड में उग्रवादी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका. 1975 में तमाम उग्रवादी नेताओं ने हथियार डाल कर भारतीय संविधान के प्रति आस्था जताई, लेकिन यह शांति क्षणभंगुर ही रही. वर्ष 1980 में राज्य में सबसे बड़े उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) का गठन किया गया और उसके बाद राज्य में उग्रवाद का लंबा दौर जारी रहा.

राज्य में शांति बहाली के मकसद से केंद्र सरकार ने सबसे बड़े उग्रवादी संगठन एनएससीएन (आई-एम) के साथ ठीक 24 साल पहले वर्ष 1997 में युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्रेमवर्क एग्रीमेंट यानी समझौते के प्रारूप पर हस्ताक्षर करने के बाद शांति प्रक्रिया के मंजिल तक पहुंचने की कुछ उम्मीद जरूर पैदा हुई थी. हालांकि इस प्रक्रिया में अक्सर गतिरोध पैदा होते रहे हैं.

एनएससीएन (आई-एम) शुरू से ही असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नागा-बहुल इलाकों को मिला कर नागालिम यानी ग्रेटर नागालैंड के गठन की मांग करता रहा है. इलाके के यह तीनों राज्य केंद्र से कोई भी समझौता करने से पहले बाकी राज्यों की संप्रभुता बरकरार रखने की अपील करते रहे हैं.

वर्तमान स्थिति क्या है?

एनएससीएन (आईएम) ने छह साल पहले हुए फ्रेमवर्क समझौते पर भारत सरकार की कथित चुप्पी के विरोध इलाके के नागा बहुल इलाकों में 12 घंटे के बंद की अपील की थी. इसका असर नागालैंड के अलावा पड़ोसी मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नागा बहुल इलाकों पर भी पड़ा. संगठन ने एक बयान में कहा है, "छह साल बीत जाने के बाद भी भारत सरकार की ओर से अब तक कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिली है. नागाओं के साथ ऐसा सलूक नहीं किया जा सकता.'' उसका दावा है कि केंद्र सरकार अपने वादे को पूरा करने में नाकाम रही है.

तस्वीर: Mahesh Bhat

दरअसल, नगालैंड में स्थायी शांति लाने के प्रयास जून से ही ठप्प हैं. क्योंकि केंद्र सरकार ने एनएससीएन की ओर से अवैध रूप से टैक्स की वसूली रोक दी है. संगठन की दलील है कि केंद्र सरकार का यह फैसला ठीक नहीं है. यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि यह उग्रवादी संगठन अपनी स्थापना के समय से ही राज्य के तमाम लोगों, व्यापारियों और सरकारी कर्मचारियों तक से टैक्स वसूलता रहा है.

विधानसभा में भी चर्चा

नागालैंड विधानसभा के वर्षाकालीन अधिवेशन के पहले दिन भी सदन में नागालैंड समस्या छाई रही. सदन में आम राय से पारित एक प्रस्ताव में नागा राजनीतिक समस्या के शीघ्र समाधान की अपील की गई. प्रस्ताव में तमाम नागा संगठनों से इस दिशा में सामूहिक प्रयास करने की भी अपील की गई है. दूसरी ओर, राज्य के सभी सांसदों और विधायकों ने शांति प्रक्रिया तेज करने की दिशा में काम करने और नागा मुद्दे के शीघ्र समाधान के लिए केंद्र पर दबाव बनाने का फैसला किया है.

क्या है फ्रेमवर्क समझौता?

केंद्र सरकार ने तीन अगस्त, 2015 को एनएससीएन के इसाक मुइवा गुट के साथ एक फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन उसके प्रावधानों को गोपनीय रखा गया था. बाद में वर्ष 2017 में नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप जैसे सात विद्रोही गुटों को शांति समझौते में शामिल किए जाने से कुछ नागा संगठनों ने निराशा जताई थी और इसे शांति प्रक्रिया को लंबा खींचने का बहाना बताया था. कुछ दिनों पहले एनएससीएन ने फ्रेमवर्क समझौते के प्रावधानों को सार्वजनिक करते हुए लंबे अरसे तक शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ रहे एन.रवि पर साझा संप्रभुता का हवाला देते हुए मूल समझौते में कुछ लाइनें बदलने का आरोप लगाया था.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एनएससीएन अलग संविधान और जांच की मांग पर अड़ा है जबकि केंद्र सरकार इसके लिए तैयार नहीं है. यही शांति प्रक्रिया की राह में सबसे बड़ी बाधा है. अब एनएससीएन ने एक बार फिर शांति प्रक्रिया और केंद्र की मंशा पर सवाल उठाए हैं. पर्यवेक्षकों की राय में इससे आने वाले दिनों में राज्य में नए सिरे से अशांति पैदा होने के आसार हैं.

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