पाकिस्तान को आतंकवाद से खतरा है या वैलेटाइंस डे से?
१५ फ़रवरी २०१७
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि आतंकवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगाने की बजाय अब पाकिस्तान इस्लामी गुटों को खुश करने के लिए वैंलेटाइंस डे जैसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगाने को अधिक तवज्जो दे रहा है.
तस्वीर: DW/U. Fatima
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पाकिस्तान के लाहौर शहर में सोमवार को हुए आतंकी हमले में कम से कम 13 लोगों की मौत हो गई.
तो दूसरी तरफ मंगलवार को पुलिस शहरों में ऐसे युवाओं को गिरफ्तार करती नजर आई जो वसंतोत्सव के लिए पतंगें खरीद रहे थे या फिर जिनके हाथों में वैलेंटाइंस डे के मौके पर दिल जैसा दिखने वाला गुब्बारा या चॉकलेट नजर आ रही थी.
वैसे तो इन दोनों मामलों में कोई संबंध नहीं दिखता लेकिन आज पाकिस्तान की जमीनी हकीकत कुछ ऐसी ही नजर आ रही है और यही पाकिस्तानियों के गुस्से का कारण भी है. इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने वैलेंटाइंस डे सेलिब्रेशन को अशिष्ट, अनैतिक और इस्लामिक शिक्षा के खिलाफ मानते हुए इस पर बैन लगा दिया था.
सरकार विरोधी लेखों के लिए मशहूर इस्लामाबाद के सामाजिक कार्यकर्ता अरशद महमूद ने इस फैसले की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए कहा, "इस्लामी कट्टरपंथी संगठन चाहे कहीं भी हमला कर सकते हैं क्योंकि हमारे देश के नीति-निर्माताओं और सरकार को इन संगठनों के बजाय दिल के आकार वाले गुब्बारों से अधिक खतरा महसूस होता है."
ऐसी है पाकिस्तानी लोगों की आम जिंदगी
जर्मन फोटोग्राफर मालोनो टे 2014 में पाकिस्तान गए थे और उन्होंने वहां की जिंदगी को कैमरे में कैद किया. उनका कहना है, "पाकिस्तान के इश्क में गिरफ्तार होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा." देखिए उनकी नजर से पाकिस्तान को:
तस्वीर: Manolo Ty
"पाकिस्तान नाऊ"
जर्मन फोटोग्राफर मानोलो टे तीन साल पहले छह हफ्तों के लिए पाकिस्तान गए. वह सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब और खैबर पख्तूनख्वाह की संस्कृति और रहन सहन से बहुत प्रभावित हुए. इस दौरान उन्होंने 15 हजार से ज्यादा फोटो खींचे और अब इनमें से 277 तस्वीरें "पाकिस्तान नाऊ" किताब का हिस्सा हैं.
तस्वीर: Manolo Ty
कराची की शामें
कराची में समंदर किनारे अगर आप चटपटे स्नैक्स का मजा लेना चाहते हैं तो यह आपके लिए परफेक्ट जगह है. खास कर गर्मियों में जब शहर का तापमान 45 डिग्री तक पहुंच जाता है तो लोग वीकेंड पर अकसर इस तरह ठंडी लहरों का मजा लेते हैं.
तस्वीर: Manolo Ty
आज मैं आजाद हूं...
मालोनो टे का कहना है कि अकसर पश्चिमी मीडिया में पाकिस्तानी महिलाओं को घरेलू हिंसा की शिकार ही बनाया जाता है. अपनी इस तस्वीर के जरिए वह लोगों को पाकिस्तानी महिलाओं की जिंदगी की एक अलग झलक देना चाहते हैं. पढ़ी लिखी युवा पाकिस्तानी महिलाएं खुले आसमान में उड़ना चाहती हैं.
तस्वीर: Manolo Ty
डोली है सजने वाली...
मानोलो टे ने पाकिस्तान में कई शादियां भी देखीं, जो उन्हें एक उत्सव की तरह लगीं. अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तान में शादी का लंबा जश्न दावत ए वलीमा के साथ खत्म होता है, जिसमें दोस्तों और रिश्तेदारों को दावत दी जाती है.
तस्वीर: Manolo Ty
ऐतिहासिक धरोहर
10 वर्ग किलोमीटर के इलाके में पांच लाख कब्रों और मकबरों के साथ मकली का कब्रिस्तान दुनिया के सबसे बड़े कब्रिस्तानों में से एक है. 1981 में इसे विश्व विरासत घोषित किया गया. लेकिन यहां मौजूद कई मकबरों की हालत खस्ता है और इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है. यहां 14वीं से 18वीं सदी के बीच के कई ऐतिहासिक प्रतीक मौजूद हैं.
तस्वीर: Manolo Ty
जहाजों की कब्रगाह
बलूचिस्तान के तटीय गांव गड़ानी में समंदरी जहाजों को तोड़ने का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा केंद्र है. इन जहाजों को तोड़ने के बाद मजदूर इसके धातु के मलबे के हाथों से उखाड़ कर किनारे पर लाते हैं. एक जहाज को पूरी तरह खत्म करने के लिए तीन महीने का समय लग जाता है.
तस्वीर: Manolo Ty
संतुलन का खेल
कपास को लेकर जाने वाले ट्रकों को ज्यादा से ज्यादा भरा जाता है. कपास की लोडिंग के दौरान ट्रक के दोनों तरफ वजन को संतुलित रखा जाता है. आम तौर पर ऐसे ट्रक जब चलते हैं तो दो लेन के हाइवे को अकेले ही घेर लेते हैं. इस कपास से सूत और रेशे बना कर कपड़ा उद्योग में इस्तेमाल किया जाता है.
तस्वीर: Manolo Ty
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक
मानोलो टे की इस किताब में पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यकों की जिंदगी को भी दर्शाया गया है. इस तस्वीर में सिंध प्रांत के सक्खर की कुछ हिंदू महिलाओं को देखा जा सकता है. सिंध नदी के किनारे बसे शहर सक्खर के हिंदू परिवारों की मेहमाननवाजी से मानोलो खूब प्रभावित हैं.
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धोबी पछाड़
पाकिस्तान के देहाती इलाकों में कुश्ती खूब लोकप्रिय है. कुछ इलाकों में सालाना मेलों के दौरान कुश्ती की प्रतियोगिताएं होती हैं. बड़ी संख्या में लोग ऐसे मुकाबलों को देखने आते हैं. पहलवानों के लिए जहां यह अपना दमखम दिखाने का मौका होता है, वहीं स्थानीय लोगों के लिए मनोरंजन का बढ़िया साधन.
तस्वीर: Manolo Ty
इमाम से मुलाकात
मानोलो टे कहते हैं कि जब वह इस्लामाबाद की मशहूर शाह फैसल मस्जिद के इमाम से मिले तो इमाम ने उनके धर्म के बारे में पूछा. टे कहते हैं कि उन्हें लगा कि अब उन्हें इस्लाम के बारे में लंबा उपदेश मिलने वाला है. लेकिन हुआ इसका उल्टा. इमाम ने उनके धर्म का सम्मान करते हुए दुनिया के भर के धर्मों के बीच मेलजोल और प्यार के संदेश को फैलाने पर बल दिया.
तस्वीर: Manolo Ty
सूफी संस्कृति की झलक
"पाकिस्तान नाऊ" में पाकिस्तान की सूफी संस्कृति की झलक भी पेश की गई है. लाहौर में हर गुरुवार को बाबा शाह जमाल के मजार पर उनके मुरीद धमाल के जरिए उन्हें याद करते हैं. इस दरगाह पर सूफी संगीत सुनने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग जमा होते हैं.
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विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कई सालों से पाकिस्तान ऐसे हमले झेल रहा है लेकिन अपनी सुरक्षा व्यवस्था में खामियां तलाशने के बजाय हमेशा ही वह भारत और अफगानिस्तान को जिम्मेदार ठहराता रहा है. लाहौर हमले की जिम्मेदारी आतंकवादी गुट जमात-उल-अहरार ने ली है. लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान भारतीय खुफिया एजेंसियों को इसके लिए जिम्मेदार मान रहा है. कुछ तो इसे लाहौर में होने वाले संभावित अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट के खिलाफ रची गई साजिश मान रहे हैं. 2009 में श्रीलंकाई टीम पर हमले के बाद से पाकिस्तान में कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट नहीं हुआ है.
पाकिस्तानी स्तंभकार फाजी जाका ने लाहौर हमले और क्रिकेट के खिलाफ साजिश की थ्योरी को बकवास करार दिया है. विशेषज्ञ तो यह भी मानते हैं कि भारत और अफगानिस्तान जैसे देश भी आतंकवादी हमलों के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा देते हैं और अपनी कमियों को नजरअंदाज करते हैं. सामाजिक कार्यकर्ता जीनिया शौकत ने डीडब्ल्यू से बातचीत में कहा कि दुर्भाग्य तो यह है कि मीडिया भी इन हमलों को विदेशी हमला कह देता है.
चूर-चूर होते पाकिस्तानियों के ख्वाब
शरणार्थी संकट के बीच हजारों पाकिस्तानी भी यूरोप में पहुंचे हैं. ग्रीस से पाकिस्तानी इफ्तिखार अलीकी भेजी कुछ तस्वीरें भेजीं यूरोप में बेहतर जिंदगी के इन लोगों के सपने की हकीकत को बयान करती हैं.
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सफाई का काम
हजारों पाकिस्तानी अपने घरों से निकले और उनकी मंजिल जर्मनी या उसके पड़ोसी देश थे. किसी ने सोचा भी न होगा कि खतरनाक पहाड़ी और समंदरी रास्ते पर जिंदगी दांव पर लगाने के बाद उन्हें एथेंस के शरणार्थी शिविर में शौचालय साफ करना होगा.
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झूठे सब्जबाग
इनमें से ज्यादा लोग पाकिस्तान के पंजाब प्रांत हैं. एजेंटों ने उन्हें जर्मनी तक पहुंचाने का खर्चा प्रति व्यक्ति पांच लाख रुपए बताया था और सबसे ये पैसा एडवांस में ही ले लिया गया. लेकिन अब एजेंटों के दिखाए सब्जबाग झूठे साबित हो रहे हैं.
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शरण संभव नहीं
सीरिया और अन्य संकटग्रस्त देशों से आए शरणार्थियों को बालकन देशों के रास्ते जर्मनी जाने की इजाजत दी गई थी. लेकिन यूरोपीय सरकारों का मानना है कि ज्यादातर पाकिस्तानी आर्थिक कारणों से यूरोप आ रहे हैं. इसलिए उन्हें यहां शरण दिए जाने की संभावना बहुत कम है.
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रहने की शर्त
इन लोगों का कहना है कि ग्रीस में अधिकारियों ने सफाई का काम सिर्फ उन्हें ही सौंपा है. इनसे कहा गया है कि पाकिस्तानी नागरिकों को शरणार्थी शिविर में रखने की इजाजत ही नहीं है, फिर भी उन्हें वहां रहने की इजाजत सिर्फ इस शर्त पर दी गई है कि वो सफाई करेंगे.
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नाउम्मीद
ऐसे सैकड़ों पाकिस्तानी आप्रवासियों को अब उम्मीद ही नहीं है कि वो ग्रीस से आगे पश्चिमी यूरोप की तरफ जा पाएंगे और इसलिए वो वापस पाकिस्तान जाना चाहते हैं. इनमें से बहुत से मानसिक और शारीरिक बीमारियों का शिकार हैं. कई लोगों ने आत्महत्या की कोशिश भी है.
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खाना भी पूरा नहीं
ग्रीस में शरण की आस में रह रहे ज्यादातर पाकिस्तानियों का कहना है कि शिविर में उन्हें पर्याप्त खाना भी नहीं मिलता है और वो अच्छा भी नहीं होता है. कई लोगों का कहना है कि उन्हें सिर्फ जिंदा रहने के लिए रोज एक वक्त का खाना दिया जाता है. ऐसे में कई लोग बीमारियों का शिकार हैं.
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वतन वापसी भी मुश्किल
विडंबना तो ये है कि ज्यादातर लोगों के पास पासपोर्ट या अन्य दस्तावेज भी नहीं है और पाकिस्तान वापस जाना भी उनके लिए कठिन है. एथेंस में पाकिस्तानी दूतावास की तरफ से उनकी पहचान और पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया बहुत धीमी है.
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याद आते हैं बच्चे
पाकिस्तान के जिला गुजरात से संबंध रखने वाले 41 साल के सज्जाद शाह भी अब वापस वतन लौटना चाहते हैं. उनके तीन बच्चे हैं. वो कहते हैं कि कैंप में बच्चे को खेलते देख उन्हें अपने बच्चे याद आते हैं और जल्द से जल्द उनके पास जाना चाहते हैं.
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खराब हालात
अन्य देशों से संबंध रखने वाले आप्रवासियों और शरणार्थियों को यूनानी अधिकारियों ने रिहायशी इमारतों में रहने को जगह दी है जबकि पाकिस्तानियों को ज्यादातर अस्थायी शिविरों में रखा गया है. हालत इसलिए भी खराब है कि उन्हें यूरोप की कड़ी सर्दी की आदत नहीं है.
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नहीं मिलता जवाब
इन लोगों का कहना है यात्रा दस्तावेजों के लिए उन्होंने एथेंस के पाकिस्तानी दूतावास में अर्जी दी है लेकिन महीनों बाद भी कोई जबाव नहीं मिला है. कुछ लोगों ने शरणार्थी एजेंसी से भी खुद को स्वदेश भिजवाने की अपील की, लेकिन उन्होंने कहा कि इसके लिए पासपोर्ट या अन्य दस्तावेज चाहिए.
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गुहार
बहुत से लोगों ने पाकिस्तान सरकार से भी जल्द से जल्द वतन वापसी की गुहार लगाई है. एहसान नाम के एक पाकिस्तानी आप्रवासी ने डीडब्ल्यू को बताया, “न हम वापस जा सकते हैं और न आगे. बस पछतावा है और यहां टॉयलेट की सफाई का काम है.”
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पाकिस्तानी विशेषज्ञ अकील शाह और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार विक कैरी के मुताबिक पाकिस्तानी सेना के आतंकवाद विरोधी दृष्टिकोण में एक मौलिक विरोधाभास है. उनका कहना है कि पाकिस्तानी सेना उन आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है जो पाकिस्तान पर हमला करते हैं लेकिन उन गुटों की सरपरस्ती करती है जो इसके दुश्मन मुल्कों पर हमला करते हैं. मसलन हक्कानी नेटवर्क जो अफगानिस्तान में दबदबा बनाए रखने में इस्लामाबाद की मदद करता है, वहीं लश्कर-ए-तैयबा को भी कथित रूप से कश्मीर में भारतीय सुरक्षा बलों के खिलाफ पाकिस्तान से प्रोत्साहन मिलता रहा है.