अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के धन पर नजर रखने वाली संस्था ने पाकिस्तान को तीन महीने के लिए राहत दे दी है. अमेरिका और कुछ यूरोपीय देश पाकिस्तान को उन देशों की सूची में डालना चाहते है जो अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन नहीं करते.
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पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने मंगलवार देर रात यह जानकारी दी. पाकिस्तान बीते कुछ महीनों से इस सूची में जाने से बचने के लिए कूटनीतिक स्तर पर कोशिश कर रहा है. यह सूची उन देशों की है जिन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैसों की हेराफेरी और आतंकवादियों के लिए धन रोकने के लिए नियम बनाने और उन्हें लागू करने में नाकाम रहने का आरोप है. यह नियम फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ तय करती है. अगर पाकिस्तान को इस सूची में डाल दिया जाता है तो उसकी अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है.
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एफएडीएफ के सदस्य पिछले हफ्ते से पेरिस में बैठक कर रहे हैं. पाकिस्तान को इस सूची में डालने का प्रस्ताव अमेरिका ने किया है जिसे जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन समर्थन दे रहे हैं. फिलहाल रूस की यात्रा पर गए पाकिस्तान के विदेश मंत्री आसिफ ने ट्वीट कर बताया, "कोशिशें रंग लाई हैं. पाकिस्तान को नॉमिनेट करने पर सहमति नहीं बनी." ट्वीट के जरिए ही विदेश मंत्री ने यह भी बताया है कि तीन महीने के लिए यह प्रक्रिया रोकी गई है और एशिया प्रशांत ग्रुप से इस बारे में रिपोर्ट मांगी गई है. यह ग्रुप भी एफएटीएफ का हिस्सा है. जून में एशिया प्रशांत ग्रुप की अगली रिपोर्ट आएगी और तब इस बारे में कोई नया फैसला किया जा सकता है. पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इसके लिए मित्र देशों का आभार भी जताया है.
वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश विभाग के एक अधिकारी ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर कहा कि वे इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते कि फैसला टाला गया है या नहीं क्योंकि यह गोपनीय मामला है और जब तक सार्वजनिक रूप से घोषणा नहीं होती कुछ नहीं कहा जा सकता.
इस अधिकारी ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय पाकिस्तान में मनी लाउंड्रिंग और आतंकवाद के लिए धन रोकने के तंत्र की कमियों को लेकर चिंतित है, हालांकि पाकिस्तान ने इन कमियों को दूर करने कि लिए कई कदम उठाए हैं. पाकिस्तान ने इससे पहले एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें इस दिशा में हुई प्रगति का ब्यौरा दिया गया था. हालांकि अमेरिका इससे पहले ही अपना प्रस्ताव दाखिल कर चुका था. मुमकिन है कि पाकिस्तान की रिपोर्ट पर भी पेरिस में चर्चा हुई हो.
क्या है अमेरिकी मदद का मतलब
साल 2018 की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 25.5 करोड़ डॉलर की सैन्य मदद रोक दी. इसके पहले अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के बजट में कटौती की. जानते हैं इस अमेरिकी मदद के बारे में.
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क्या है अमेरिकी मदद
अमेरिका की वर्तमान विदेशी सहायता प्रणाली को 1961 के विदेशी सहायता अधिनियम के तहत तैयार किया गया था. इसका मकसद दुनिया भर में अमेरिकी सरकार की ओर से उठाए गए सहायता प्रयासों को ठीक से लागू करना था. अमेरिका में इस मदद को "दुनिया के साथ संसाधन वितरण" कहा जाता है.
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किस क्षेत्र में दी जाती है
इस सहायता में केवल विदेशी सैन्य और रक्षा मदद ही शामिल नहीं होती बल्कि तकनीकी, शैक्षिक और अन्य सहयोग भी शामिल होता है. यह मदद विदेशी सरकारों, सैन्य बल, कारोबारी समूह या चैरिटेबल समूह मसलन संयुक्त राष्ट्र या अन्य गैर सरकारी संगठन को दी जा सकती है.
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कितनी मदद देता है अमेरिका
कुछ अध्ययनों के मुताबिक अमेरिका कुल संघीय बजट का 1.3 फीसदी हिस्सा बतौर मदद देता है. लेकिन मदद का आंकड़ा हर साल बदलता रहता है. जानकारों के मुताबिक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं को बड़े स्तर पर मदद दी.
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कब हुआ मदद में इजाफा
1990 के दशक में ऐसी ही मदद सोवियत संघ को दी गई जो बाद में कम कर दी गई. 9/11 के हमलों के बाद मदद की सीमा बढ़ाई गई. विशेषज्ञों के मुताबिक जॉर्ज डब्ल्यू बुश द्वारा इराक और अफगानिस्तान में दी जाने वाली मदद और वैश्विक स्वास्थ्य कार्यक्रम के चलते इसमें बढ़ोत्तरी हुई.
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कैसे किया जाता है खर्च
साल 2015 के आंकड़ों मुताबिक, कुल मदद का 38 फीसदी हिस्सा दीर्घकालीन विकास सहायता के रूप में दिया जाता है. यह विश्व के उन गरीब देशों के दी जाती है जिनकी अर्थव्यवस्था तो कमजोर है ही साथ ही स्वास्थ्य मानकों में भी पिछड़े हुए हैं.
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संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा
इसका 15 फीसदी हिस्सा विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र के विकास कार्यक्रम में भी जाता है. इसके अतिरिक्त 35 फीसदी हिस्सा सैन्य और सुरक्षा सहायता है, 16 फीसदी हिस्सा मानवीय मदद मसलन भूकंप, सूखा, युद्ध आदि और 11 फीसदी राजनीतिक मदद के रूप में शामिल है.
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कौन करता है मदद का प्रबंधन
अमेरिकी विदेशी सहायता के प्रबंधन में तकरीबन 21 एजेंसियां शामिल हैं. लेकिन 1961 के कानून मुताबिक अमेरिकी सरकार ने यूनाइटेड स्टेट एजेंसी फॉर इंटररनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएआईडी) बनाई. यह एक एक अर्ध-स्वतंत्र एजेंसी है जो राष्ट्रपति, आंतरिक मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल के निर्देशों के तहत काम करती है. हालांकि इसके अलावा तमाम अन्य एजेंसियां भी विदेशों में दी जाने वाली मदद का प्रबंधन करती हैं.
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किन देशों को मिलती हैं मदद
दुनिया के 200 से भी ज्यादा देशों को अमेरिका मदद देता है. साल 2015 के आंकड़ों मुताबिक, सबसे अधिक मदद पाने मुख्य देश हैं, अफगानिस्तान, इस्राएल, इराक, मिस्र और जॉर्डन. वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट मुताबिक अफगानिस्तान को मदद का बड़ा हिस्सा सुरक्षा कारणों से मिलता है, वहीं इस्राएल को सैन्य मदद दी जाती है. मिस्र और इराक को भी सुरक्षा के लिहाज से दी मदद दी जाती है.
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अफ्रीका भी सूची में
अमेरिका से विकास के लिए जिन देशों को मदद मिलती है उनमें शीर्ष 10 में अफ्रीकी देश आते हैं. कुछ हिस्सा संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाओं को भी जाता है.
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कितना बड़ा दानी है अमेरिका
विदेशियों को मदद से लिहाज से देखा जाए तो अमेरिका सबसे बड़ा दानी है. इसके बाद दूसरे स्थान पर ब्रिटेन और तीसरे पर जर्मनी, चौथे पर फ्रांस और पांचवे पर जापान का नंबर आता है.
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पाकिस्तान के दो और अधिकारियों ने भी तीन महीने की मोहलत मिलने के बात की पुष्टि की है. अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर अपने रुख में सख्ती बढ़ा रहा है. बीते महीने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के प्रशासन ने पाकिस्तान को 2 अरब डॉलर की सहायता रोक दी. पाकिस्तान अफगानिस्तान और भारत में आतंकवादियों का समर्थन करने से इनकार करता है. उसने अमेरिका की चेतावनियों पर भी नाराजगी जताई है. हालांकि पाकिस्तान सरकार एफएटीएफ की कार्रवाई को लेकर चिंतित है क्योंकि यह फैसला वहां बैंकिंग सेक्टर को नुकसान पहुंचा सकता है. इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर होग. देश में जल्दी ही चुनाव भी होने हैं.