आर्थिक मोर्चे पर कमजोर स्थिति से गुजर रहा पाकिस्तान दुनिया के सामने एक साफ-सुथरी छवि पेश करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहा है. वहीं जानकार पाकिस्तान के दावों और इरादों पर संदेह जता रहे हैं. जानते हैं संदेह के कारण.
तस्वीर: Pakistan Prime Minister Press Office
विज्ञापन
पाकिस्तान सरकार ऐसा भरोसा दिलाना चाहती है कि देश किसी बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार विदेशी पत्रकारों के हालिया पाकिस्तान दौरे के दौरान देश के प्रधानमंत्री इमरान खान, सेना प्रमुख कमर जावेद बाजवा और अन्य सरकारी अधिकारी अपने बयानों और संदेशों में यही कहने की कोशिश करते रहे. कुछ टिप्पणियों को आधिकारिक रूप से छापा गया तो कुछ नहीं छापी गईं. लेकिन सारे बयानों में एक ही संदेश था. यही कि पाकिस्तान विवादों से थक गया है, पाकिस्तान चरमपंथ के खिलाफ है, पाकिस्तान शांति वार्ताओं के लिए तैयार है और ही पाकिस्तान भ्रष्टाचार से लड़ रहा है.
जोर इस बात पर दिया गया कि पाकिस्तान की सत्ता को सेना नहीं, बल्कि राजनीतिज्ञ चला रहे हैं और इसमें सेना उनका साथ दे रही है. सुनने में यह बेहद अच्छा लगता है. लेकिन बस एक समस्या है. जो भी पाकिस्तान और उसके मुद्दों को करीब से जानते हैं, वे ऐसे बदलावों और पहल पर भरोसा करने में कतराते हैं.
भारत-पाकिस्तान कारोबार करें तो होगा फायदा ही फायदा
वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत और पाकिस्तान अगर कृत्रिम कारोबारी बाधाओं को दूर कर संभावनाओं को भुनाने पर जोर दें तो दोनों देशों के बीच 37 अरब डॉलर तक का कारोबार हो सकता है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/A. Nabil
2 से 37 अरब डॉलर
विश्व बैंक की रिपोर्ट कहती है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कारोबार की जबरदस्त संभावनाएं है. टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट के हवाले से लिखा है कि अभी दोनों देशों के बीच महज 2 अरब डॉलर का व्यापार होता है लेकिन अगर सारी संभावनाओं को भुनाया जाए तो यह कारोबार 37 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/K.M. Chaudary
ग्लास हाफ फुल
रिपोर्ट "ग्लास हाफ फुल: प्रोमिस ऑफ रीजनल ट्रेड" में कहा गया है कि अगर दोनों देश कृत्रिम बाधाओं को दूर करने के लिेए एक साथ आ जाएं तो भारत और पाकिस्तान के कारोबार में बढ़ोतरी हो सकती है. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान की संभावित कारोबार वृद्धि को लेकर भी बात की गई है.
तस्वीर: imago/photothek
विश्वास स्थापित हो
पाकिस्तान का दक्षिण एशियाई देशों के साथ मौजूदा कारोबार महज 5.1 अरब डॉलर का है, लेकिन अगर नीतिगत बाधाओं को दूर कर लिया जाए तो यह कारोबार 39.7 अरब डॉलर के पार पहुंच सकता है. भारत और पाकिस्तान के बीच करतारपुर कॉरिडोर मसले पर बनी सहमति को दोनों पक्षों में विश्वास स्थापित करने वाला कदम बताया गया है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/J. Macdougall
क्या है बाधाएं
रिपोर्ट में भारत-पाकिस्तान की जिन कृत्रिम बाधाओं को खत्म करने की जरूरत बताई गई है, उनमें पहली है कारोबारी ट्रैरिफ से जुड़े मसले, उच्च लागत और आपसी विश्वास की कमी. वरिष्ठ अर्थशास्त्री और इस डॉक्यूमेंट को तैयार करने वाले संजय कथुरिया ने इस्लामाबाद में पत्रकारों से कहा है कि अगर दोनों देशों में आपसी विश्वास बढ़ता है तो कारोबार बढ़ेगा ही बढ़ेगा.
तस्वीर: AP
हवाई सेवा का हाल
भारत और पाकिस्तान के हवाई परिवहन का आंकड़ा भी रिपोर्ट में दिया गया है. इसमें बताया गया है कि पाकिस्तान की दक्षिण एशियाई देशों के साथ हवाई परिवहन कम है. पाकिस्तान की भारत और अफगानिस्तान के साथ हफ्ते में केवल छह उड़ानें हैं. वहीं श्रीलंका और बांग्लादेश के साथ 10 और नेपाल के साथ केवल एक ही है लेकिन मालदीव और भूटान के साथ कोई उड़ान नहीं है.
तस्वीर: Imago/Star-Media
भारत है आगे
वहीं भारत का हवाई परिवहन व्यवस्था काफी मजबूत है. भारत में श्रीलंका के साथ 147 साप्ताहिक उड़ानें हैं, इसके बाद 67 बांग्लादेश के साथ, मालदीव के साथ 32, नेपाल के साथ 71, अफगानिस्तान के साथ 22 और भूटान के साथ 23 हैं.
तस्वीर: picture-alliance/imageBroker
'एमएफएन' स्टेटस
रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान का भारत को एमएफएन स्टेटस (मोस्ट फेवरड नेशन) न देना भी पाकिस्तान के लिए एक बड़ी बाधा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कारोबार बढ़ाने के लिए जब कोई देश दूसरे देश को रियायतें और सुविधाएं देता है ताकि दोनों पक्षों में कारोबार में इजाफा हो, तो इस खास दर्जे को एफएफएन स्टेटस कहा जाता है.
तस्वीर: Getty Images/Sajjad Qayyum
7 तस्वीरें1 | 7
भारत भी पकिस्तान पर यकायक भरोसा कर लेगा, ऐसा तो नहीं लगता. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने रॉयटर्स से बातचीत में कहा, "पाकिस्तान को अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में चल रहे आतंकवादी गुटों पर विश्वसनीय और तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए." उन्होंने कहा कि पाकिस्तान, आतंकवादी गुटों द्वारा भारत में आतंकवादी हमलों के बाद अमूमन एक सी बात कहता है, जिसका मकसद सिर्फ अंतरराष्ट्रीय दबाव को कम करना होता है. इसके बाद वह वापस अपने ढर्रे पर लौट आता है और आतंकवादी गुट पाकिस्तान से ऑपरेट करते रहते हैं.
क्या है मजबूरी
अब सवाल उठता है कि ऐसा क्या है जो पाकिस्तान को इस बदलाव के लिए मजबूर कर रहा है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक इस्लामाबाद को फौरी तौर पर दोस्तों की जरूरत है. पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि भारत पाकिस्तान को फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स से ब्लैकलिस्ट करवाने के लिए पैरवी कर रहा है. यह टास्क फोर्स इस बात की निगरानी करती है कि क्या देश मनी लॉड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण को रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास हो रहे हैं. अगर पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट हो जाता है तो उसकी बैंकिंग व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो सकती है.
तस्वीर: DW/I. Jabeen
पाकिस्तान की मजबूरी के अगर और कारण खंगाले जाएं तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भूमिका भी इसमें अहम नजर आती है. दरअसल पाकिस्तान देश में बढ़ रहे बजट और चालू खाते के घाटे से निपटने के लिए आईएमएफ से मिलने वाले बेलआउट पैकेज के करीब है. हालांकि पाकिस्तानी अधिकारी कहते हैं कि दुनिया जिन बदलावों की बात कर रही है, उसका आईएमएफ के पैकेज से कोई खास लेना-देना नहीं है. इमरान खान के नेतृत्व वाली सरकार लगातार कह रही है कि वह हर मोर्चे पर शांति कायम करने के लिए प्रतिबद्ध है.
अफगानिस्तान मसले पर तालिबान और अमेरिका को एक टेबल पर लाने में पाकिस्तान की भूमिका अहम है. ईरान यात्रा के दौरान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का सीमावर्ती इलाकों के लिए एक संयुक्त बल बनाने जैसे मुद्दे पर सहमति बनाना इसी शांति पहले के उदाहरण बताए जा रहे हैं.
शांति प्रक्रिया की ओर कदम
पाकिस्तान प्रशासन लगातार दावा कर रहा है कि वह अपनी जमीन पर चरमपंथी ताकतों पर नकेल कस रहा है, क्योंकि भविष्य में चरमपंथ उसके लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकता है. इसी मुहिम के तहत देश के 32 हजार ऐसे मदरसों पर भी कार्रवाई की गई जो भविष्य में चरमपंथियों को पैदा कर सकते थे. प्रधानमंत्री इमरान खान का कहना है, "अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते नहीं, बल्कि देश के भविष्य के लिए हम अपनी जमीन पर आंतकी गुटों को पनाह नहीं देंगे. इस काम में सेना और खुफिया एजेंसी सरकार का पूरा साथ दे रही हैं."
इमरान खान को कितना जानते हैं आप?
पाकिस्तान में बदहाल अर्थव्यवस्था और कुशासन का आरोप झेल रहे प्रधानमंत्री इमरान खान की मुश्किलें लगातार बढ़ रहीं हैं. क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान का अब तक का सफर बेहद दिलचस्प है, चलिए जानते हैं.
तस्वीर: Saiyna Bashir/REUTERS
पूरा नाम?
क्या आप इमरान खान का पूरा नाम जानते हैं? उनका पूरा नाम है अहमद खान नियाजी इमरान, लेकिन बतौर क्रिकेटर और राजनेता वह दुनिया के लिए हमेशा इमरान खान रहे हैं.
तस्वीर: Reuters/C. Firouz
करियर की शुरुआत
इमरान खान के क्रिकेट करियर की शुरुआत 16 साल की उम्र में हुई, जब उन्होंने 1968 में लाहौर की तरफ से सरगोधा के खिलाफ पहला फर्स्ट क्लास क्रिकेट मैच खेला.
तस्वीर: picture-alliance/Dinodia Photo Library
पढ़ाई से पहले क्रिकेट
1970 में वह पाकिस्तान की राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बन गए. यानी उनकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी और उनके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का आगाज हो चुका था.
तस्वीर: Getty Images
इंग्लिश क्रिकेट में धाक
बाद में वह पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए. वहां भी उनके खेल के चर्चे होने लगे. वह 1974 में ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी इलेवन के कप्तान बने. उन्होंने काउंटी क्रिकेट भी खेला.
तस्वीर: picture-alliance/Dinodia Photo Library
पाकिस्तान की कप्तानी
इमरान खान 1982 में पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के कप्तान बने. बतौर कप्तान उन्होंने 48 टेस्ट मैच खेले जिनमें से पाकिस्तान ने 14 जीते, आठ हारे और बाकी ड्रॉ रहे.
तस्वीर: Getty Images/AFP/S. Dupont
वनडे करियर
इमरान ने 139 एकदिवसीय मैचों में पाकिस्तानी टीम का नेतृत्व किया. इनमें से 77 जीते, 57 हारे और एक मैच का कोई नतीजा नहीं निकला.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
वर्ल्ड चैंपियन
पाकिस्तान ने अब तक सिर्फ एक बार क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीता है और 1992 में यह कारनामा इमरान खान की कप्तानी में हुआ था.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/S. Holland
सबसे सफल कप्तान
इमरान पाकिस्तान के लिए सबसे सफल कप्तान साबित हुए, जिनकी तुलना अकसर भारत के पूर्व कप्तान कपिल देव से हुई है. दोनों ऑलराउंडरों के रिकॉर्ड भी प्रभावशाली रहे हैं.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/B.K. Bangash
सियासत में कदम
इमरान खान ने 1996 में पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ पार्टी बना कर सियासत में कदम रखा. 2013 के आम चुनाव में उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर रही और 2018 में पहले पर.
तस्वीर: Aamir QureshiAFP/Getty Images
निजी जीवन
इमरान खान अपनी निजी जिंदगी को लेकर भी सुर्खियों में रहते हैं. 65 साल की उम्र में उन्होंने तीसरी शादी की. इससे पहले सेलेब्रिटी जमैमा और टीवी एंकर रेहाम खान उनकी पत्नी रह चुकी हैं.
तस्वीर: PIT
गंभीर आरोप
रेहाम खान ने अपनी किताब में इमरान पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि किसी महिला को इमरान की पार्टी में तभी बड़ा पद मिलता है जब वह इमरान के साथ हमबिस्तर हो.
तस्वीर: Facebook/Imran Khan Official
पाकिस्तान के ट्रंप
कई लोग इमरान खान पर पॉपुलिस्ट होने का आरोप लगाते हैं. चरमपंथियों के प्रति उनकी नरम सोच पर कई लोग सवाल उठाते हैं. कई कट्टरपंथियों से उनके करीबी रिश्ते रहे हैं.
तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/B.K. Bangash
अमेरिका के आलोचक
प्रधानमंत्री बनने से पहले इमरान खान आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग और उसमें पाकिस्तान की भागीदारी पर सवाल उठाते रहे हैं. वे इसे पाकिस्तान की कई मुसीबतों की जड़ मानते थे. लेकिन पीएम बनने के बाद उन्हें पता चला कि अमेरिका से रिश्ते कितने जरूरी हैं.
तस्वीर: YouTube/PTI Scotland
भ्रष्टाचार के खिलाफ
इमरान खान हमेशा से पाकिस्तान में भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाते रहे थे. पूर्व पीएम नवाज शरीफ खास तौर से उनके निशाने पर रहे. लेकिन आज वो खुद बदहाल अर्थव्यवस्था और कुशासन का आरोप झेल रहे हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/T. Mughal
लोकप्रियता
इमरान खान युवाओं में बेहद लोकप्रिय रहे हैं. नया पाकिस्तान बनाने का उनका नारा युवाओं की जुबान पर रहा. 2012 में वह एशिया पर्सन ऑफ द ईयर चुने गए. लेकिन अब उनकी छवि बदल रही है. उन पर अपने चुनावी वादों को पूरा ना करने के आरोप लग रहे हैं.
तस्वीर: AP
15 तस्वीरें1 | 15
वहीं सेना भी कह रही है कि वह 10 करोड़ से भी ज्यादा लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर लाना चाहती है इसके लिए इंजीनियरिंग और शिक्षा पर खर्च अहम है. पाकिस्तान यात्रा के दौरान विदेशी पत्रकारों को सेना की ओर से बनाए गए मॉर्डन स्कूलों में घुमाया गया. साथ ही एक रिहेबिटिलेशन सेंटर भी दिखाया गया जो टीनएजर्स में फैल रही चरमपंथी सोच से निपटने के लिए बनाया गया है.
इमरान खान द्वारा पेश की जा रही बदलाव की तस्वीर उस वक्त कुछ अटपटी लगने लगती है जब असद उमर को देश के वित्त मंत्री के पद से हटा दिया जाता है. वहीं एजाज शाह को देश का नया गृह मंत्री बनाया जाता है, जो सैन्य ताकतों के करीबी माने जाते हैं. लंबे वक्त से उनका नाम कई चरमपंथियों गुटों के साथ भी जोड़ा जाता रहा है.
विशेषज्ञों की राय
पाकिस्तान के ये कदम विशेषज्ञों को पाकिस्तान की नीतियों पर भरोसा करने से रोकते हैं. जानकार अब भी मानते हैं कि पाकिस्तानी सत्ता में अब भी सेना का बराबर का दखल है. पाकिस्तान में सुरक्षा मामलों से जुड़े एक वरिष्ठ सूत्र ने रॉयटर्स को बताया कि सरकार के पास चरमपंथी गुटों के खिलाफ कार्रवाई की कोई भी ठोस योजना नहीं है.
पाकिस्तान में 2013 से 2015 तक भारत के उच्चायुक्त रहे टीसीए राघवन कहते हैं, "पाकिस्तान सरकार की कैबिनेट फेरबदल, नए पाकिस्तान की अवधारणा को धुंधला करती है." इस मसले पर पाकिस्तान गृह मंत्रालय कोई प्रतिक्रिया नहीं देता है. जानकार मानते हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में अगर पाकिस्तानन वाकई बदल रहा है, तो दुनिया को यह भरोसा दिलाने के लिए उसे काफी कुछ करना होगा. इसमें विदेशी पत्रकारों की पाकिस्तान यात्रा को बस एक शुरुआत ही माना जा सकता है.