अफगानिस्तान के तालिबान ने मुल्ला अख्तर मंसूर की मौत के बाद एक ऐसे 'धार्मिक स्कॉलर' को अपना नया नेता चुन लिया है, जो अपने कट्टरवादी विचारों से काबुल को शांति के पथ से और भी दूर ले जा सकता है.
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बुधवार को अफगानी राजधानी काबुल में एक मिनीबस में हुए आत्मघाती हमले में कम से कम 10 लोगों के मारे जाने की खबर आई, और लगभग उसी समय मीडिया को भेजे एक बयान में तालिबान ने अपने नए नेता मुल्ला हैबतुल्ला अखुंदजादा का नाम बताया. यह मुल्ला मंसूर के दो सबसे करीबी सहयोगियों में से एक था. तालिबानी विद्रोहियों ने अपनी खास बैठक शूरा में नए नेता को चुना. यह बैठक पाकिस्तान में हुई मानी जा रही है.
अमेरिका ने पहली बार इस तरह पाकिस्तान की सीमा में ड्रोन हमला कर किसी तालिबानी नेता को निशाना बनाया है. पाकिस्तानी प्रशासन पर काबुल और पश्चिमी देश, सभी तालिबान को शरण और मदद मुहैया कराने का आरोप लगा रहे हैं. पाकिस्तान ऐसे आरोपों से हमेशा इंकार करता रहा है. तालिबानी विद्रोही 2001 से ही अफगानिस्तान की सरकार को हटा कर अपना इस्लामी शासन स्थापित करने के लिए हिंसक संघर्ष कर रहे हैं.
पाकिस्तान की सीमा में हुए अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया मुल्ला मंसूरतस्वीर: Reuters
बीते 15 सालों से अफगानिस्तान में चले आ रहे युद्ध के हालात को बदलने के लिए अमेरिका और अफगानिस्तान की सरकारें शांति वार्ताएं करना चाहती हैं. लेकिन तालिबन प्रमुख मंसूर इन प्रयासों के खिलाफ रहा है और इस साल की शुरुआत में उसने शांति वार्ता का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था.
मंसूर को 2015 में मुल्ला मोहम्मद उमर की मौत की खबर के सामने आने पर तालिबान प्रमुख चुना गया था. माना जाता है कि मुल्ला उमर का मौत दो साल पहले ही हो चुकी थी लेकिन इस खबर को छुपाकर मुल्ला मंसूर ने तालिबान की कमान संभाल रखी थी. जब यह बात सबके सामने आई तो कई वरिष्ठ तालिबानी सदस्यों ने अपने अलग-अलग धड़े बना लिए. अब मुल्ला मंसूर की मौत के बाद इन अलगाववादी धड़ों को और मजबूती मिलने की संभावना है.
मुल्ला अखुंदजादा को एक धार्मिक स्कॉलर बताया जाता है. वह अफगान सरकार के खिलाफ युद्ध का समर्थक है और देश में विदेशी सेनाओं की मौजूदगी के खिलाफ. इस तरह वह मुल्ला मंसूर का सच्चा उत्तराधिकारी लगता है. उसके अलावा तालिबानी परंपरा के अनुसार दो सहायक चुने जाते हैं. उनमें से एक है सिराजुद्दीन हक्कानी - जो मुल्ला मंसूर का भी सहयोगी और अफगानिस्तान में कई खतरनाक हमलों को अंजाम दे चुके हक्कानी नेटवर्क का मुखिया है. दूसरे सहयोगी का नाम मुल्ला उमर बताया गया है.
तालिबान चाहते हैं कि सभी मुसलमान मुल्ला मंसूर की मौत के गम में तीन दिन तक शोक मनाएं. वहीं 2014 से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घानी एक बार फिर नए सिरे से इस नए तालिबानी नेता को बातचीत की मेज तक लाने की कोशिश कर सकेंगे क्योंकि पुराने प्रमुख ने तो इससे इंकार कर ही दिया था.
बदला हुआ अफगानिस्तान छोड़ा जर्मन सेना ने
तालिबान के सफाए के अभियानों से लेकर अफगानी सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग तक, जर्मन सेना ने अफगानिस्तान से कई भूमिकाएं निभाई हैं. अफगानिस्तान को युद्ध की तबाही से उबारने में जर्मन सेना की कोशिशों पर एक नजर.
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ऐतिहासिक दिन
जर्मन शहर बॉन में 5 दिसंबर 2001 को अफगानिस्तान मुद्दे पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ. हामिद करजई को अंतरिम अफगान सरकार का नया प्रमुख चुना गया. वे 2004 से लेकर 2014 तक देश के राष्ट्रपति रहे. दिसंबर 2001 में ही जर्मन संसद ने अफगानिस्तान में अपनी टुकड़ियां भेजने के पक्ष में वोट दिया.
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यूरोप के बाहर पहला युद्ध अभियान
11 जनवरी 2002 को 70 सैनिकों वाली पहली जर्मन टुकड़ी काबुल पहुंची. यहीं से अफगानिस्तान में जर्मन सेना के सक्रिय रूप से दखल देने की शुरुआत हुई. जर्मनी के लिए भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यह पहला मौका था जब उसने अपनी सेना यूरोप के बाहर कहीं भेजी हो.
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जान देकर जारी रखा मिशन
एक समय पर अफगानिस्तान में 5,350 जर्मन सैनिक तैनात थे, जो कि अमेरिका और ब्रिटेन के बाद सबसे बड़ी सैनिक टुकड़ी थी. इस अभियान में 55 जर्मन सैनिकों को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी.
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उत्तरी अफगानिस्तान पर फोकस
2008 की इस तस्वीर में जर्मन सेना को उत्तरी अफगानिस्तान के कुंडूस प्रांत में गश्त लगाते देखा जा सकता है. अक्टूबर 2003 से 2006 तक जर्मन सेना इस इलाके में तैनात थी. जर्मन सेना ने उत्तरी अफगानिस्तान में शांति और स्थायित्व का माहौल बनाने में अहम भूमिका निभाई.
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दिलों को जीतने की भी कोशिश
जर्मनी काबुल से बाहर जाकर प्रादेशिक पुनर्निर्माण टीम पीआरटी बनाने वाला पहला नाटो सदस्य था. टीम का उद्देश्य उत्तरी अफगानिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था के अलावा नागरिक मदद पहुंचाने वाले कई प्रोजेक्ट्स का संचालन भी था.
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अफगान सुरक्षा बलों की ट्रेनिंग
नाटो सदस्यों ने अफगानिस्तान में स्थापित चार ट्रेनिंग केंद्रों में 60 हजार से भी अधिक अफगान सुरक्षा बलों को प्रशिक्षित किया है. इसमें जर्मन सेनाओं का बड़ा योगदान रहा और इस ट्रेनिंग प्रोजेक्ट पर जर्मनी ने 2012 तक लगभग 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च किए.
तस्वीर: ISAF Handout
राष्ट्रपति का इस्तीफा
सितंबर 2009 को एक जर्मन सेना अधिकारी ने तालिबान द्वारा कब्जे में ले लिए गए टैंकरों पर हवाई हमले के आदेश दिए. इस हमले में सौ से भी ज्यादा आम नागरिकों की भी मौत हो गई. जर्मन सेना को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी. मई 2010 में अफगानिस्तान दौरे पर विवादास्पद बयान के कारण तत्कालीन जर्मन राष्ट्रपति हॉर्स्ट कोएलर को इस्तीफा देना पड़ा.
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सैनिकों की वापसी शुरू
2014 तक सभी नाटो सेनाओं को अफगानिस्तान से वापस बुलाने के निर्णय को अमल में लाते हुए जर्मन सेना ने अपनी सेनाएं 2010 से ही वापस बुलाना शुरु कर दिया. 2012 के अंत तक उत्तरी अफगानिस्तान में कैंप मार्मूल ही जर्मन सेना की प्रमुख छावनी रह गई थी.
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अंतिम ठिकाना
कैंप मार्मूल जर्मन सैनिकों का अंतिम पड़ाव रहा जिसे 2012 से ही छोटा करने के कदम उठाए जा रहे थे. 800 जर्मन सैनिकों वाला यह कैंप 2015 के बाद भी बरकरार रहेगा और अफगानी सुरक्षा बलों को सलाह और प्रशिक्षण देने का काम जारी रखेगा.
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नया अफगानिस्तान मिशन
लगभग 12 हजार विदेशी सैनिकों के 2016 के अंत तक अफगानिस्तान में ही रहने की उम्मीद है. ये अफगानी सेनाओं को प्रशिक्षण देने का काम जारी रखेंगे. 2015 में शुरू हो रहे नाटो के नए ट्रेनिंग मिशन में भी जर्मनी एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाएगा.