क्या बर्फ में धधकती आग लग सकती है? समुद्र की असीम गहराई से निकली बर्फ तुरंत आग पकड़ लेती है. ऐसी बर्फ ऊर्जा का बड़ा स्रोत बन सकती है, लेकिन उसे निकालने पर धरती बर्बाद भी हो सकती है.
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धरती में ईंधन का भंडार, ऐसी बात करते ही जेहन में तेल के कुएं, कोयले के भंडार और गैस फील्ड आते हैं. लेकिन अब वैज्ञानिक एक ऐसे स्रोत तक पहुंच रहे हैं, जिस पर अब तक ज्यादा ध्यान नहीं गया है. यह पृथ्वी पर मौजूद ऊर्जा का सबसे बड़ा भंडार है.
सागरों की असीम गहराई में अरबों टन मीथेन गैस दबी है. अत्यधिक दबाव और बहुत ही ठंडे तापमान के चलते यह मीथेन बर्फ के क्रिस्टलों के भीतर छुपी है. ऊर्जा के इस स्रोत का वैज्ञानिक नाम मीथेन हाइड्रेट है. जापान और अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अटलांटिक महासागर की गहराई से ऐसी बर्फ को निकाला है. जैसे ही उस बर्फ को चिंगारी दी, वैसे ही वह सुलग उठी. आम तौर पर इसे "फायर एंड आईस" भी कह दिया जाता है.
डॉयचे वेले से बात करते हुए वर्जीनिया पॉलिटेक्निक के जियोसाइंस के प्रोफेसर स्टीव होलब्रुक ने कहा, "आप इसके यूट्यूब वीडियोज भी देख सकते हैं. अगर आप ऐसी बर्फ के पास लाइटर या माचिस ले जाएंगे तो आग जलने लगेगी. कुछ मिनटों के लिए आप बर्फ को जला सकते हैं. असल में इस दौरान बाहर निकलती मीथेन गैस जल रही होती है. अंत में अवशेष के तौर पर पानी ही बचता है."
कुछ इस तरह जलती है मीथेन वाली बर्फतस्वीर: picture-alliance/dpa
पृथ्वी में मीथेन हाइड्रेट का भंडार दो जगहों पर मौजूद है. एक तो महासागरों की गहराई में और दूसरा आर्कटिक की बर्फ के नीचे. वैज्ञानिकों के मुताबिक असली चुनौती हजारों मीटर की गहराई में मौजूद इस भंडार तक पहुंचने की है. ओसियन फाउंडेशन के सीनियर फेलो रिचर्ड चार्टर कहते हैं, "मीथेन हाइड्रेट जीवाश्म ईंधन की उम्र को 100 साल या उससे भी लंबा कर सकते है. धरती पर गैस और तेल की जितनी मात्रा बची है, मीथेन हाइड्रेट उसके मुकाबले कहीं ज्यादा हो सकती है."
मीथेन कार्बन अणुओं से लैस प्राकृतिक गैस है. तेल और कोयले के मुकाबले इसके दहन में काफी कम सीओटू रिलीज होती है. लेकिन मीथेन के साथ एक दूसरी समस्या है. यह खुद ही ग्रीनहाउस गैस है जो पर्यावरण पर सीओटू के मुकाबले 30 गुना ज्यादा हानिकारक प्रभाव छोड़ती है. अगर इसे निकालने की प्रक्रिया में कोई लापरवाही हुई तो जलवायु परिवर्तन का खतरा और गंभीर हो जाएगा.
चार्टर के मुताबिक, "ऐसे में समुद्रों का गर्म होना तेज हो जाएगा, ध्रुवीय बर्फ तेजी से पिघलने लगेगी, इसके चलते पहले के मुकाबले और भी ज्यादा मीथेन रिसने लगेगी. हम धरती को खौलाने की हालत तक पहुंच सकते हैं."
(प्राकृतिक संसाधनों की विविधता)
प्राकृतिक संसाधनों की विविधता
ऊर्जा की लगातार बढ़ रही जरूरत पूरा करने के लिए जितना ज्यादा अक्षय ऊर्जा के स्रोतों का इस्तेमाल हो अच्छा है. हमारे आसपास मौजूद पेड़ पौधे ऐसे में बड़े काम के हैं. जानिए ऐसे पेड़-पौधों के बारे में.
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बहुगुणी सूरजमुखी
प्रकृति में अक्षय ऊर्जा के कई स्रोत मौजूद हैं. पेड़ पौधों के शौकीन लोग सूरजमुखी को सुंदरता और तेल के लिए जानते हैं, औद्योगिक स्तर पर इसका इस्तेमाल खाद्य तेल, ल्यूब्रिकेंट और बायोडीजल बनाने में होता है. जर्मनी में चार लाख हेक्टेयर के क्षेत्र में सूरजमुखी की खेती होती है.
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पुराना स्रोत
जंगलों से मिलने वाली लकड़ी का इस्तेमाल मनुष्य ऊर्जा के लिए हमेशा से कर रहा है. जर्मनी में बन रही नई इमारतों में से 15 प्रतिशत लकड़ी से बनाई जाती हैं.
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कच्चे माल से ऊष्मा
पिछले एक दशक में लकड़ी के टुकड़ों का इस्तेमाल स्टोव जलाने के लिए बढ़ा है. तेल बचाकर लकड़ी से आग जलाना एक अच्छा विकल्प है.
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स्टीम इंजन का रहस्य
रेपसीड यानी सफेद सरसों का इस्तेमाल मनुष्य सदियों से कर रहा है. मध्यकाल से ही यह दीया जलाने के लिए तेल का भी स्रोत है. 19वीं सदी में रेपसीड के तेल का इस्तेमाल इंजन में चिकनाई पैदा करने वाले ल्यूब्रिकेंट के रूप में हुआ.
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बायोगैस के नुकसान
बायोगैस प्लांट के लिए बड़े पैमाने पर मक्के और सरसों की पैदावार बढ़ाई जा रही है. लेकिन खेती के लिए जर्मनी के कई इलाकों का नक्शा ही बदल गया है, इससे कई जंगली पौधों और जानवरों के आवास पर भी असर पड़ा है.
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मक्का एक काम अनेक
मक्का दुनिया भर में सबसे ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है. इसकी पैदावार सिर्फ अक्षय ऊर्जा के मकसद से नहीं, बल्कि पशुओं और इंसानों के आहार कि लिए भी होती है. मक्के से गोंद और चिपकाने के दूसरे पदार्थ बनाए जाते हैं.
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पौधे से प्लास्टिक
मक्के, आलू और गन्ने के पौधों से प्लास्टिक बनाई जाती है. इन दिनों कई उत्पाद बायोप्लास्टिक से तैयार हो रहे हैं, जैसे थैलियां, डेयरी उत्पादों के डब्बे और रेजर जैसी सामग्री. पर्यावरण संरक्षक बायोप्लास्टिक के इस्तेमाल का समर्थन करते हैं.
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बिस्कुट भी, बायोडीजल भी
ताड़ के फल से निकाला गया तेल खाना पकाने में इस्तेमाल होता है. पिज्जा से लेकर बिस्कुट तक यह तेल तरह तरह के खानों में इस्तेमाल होता है. इस तेल का इस्तेमाल साबुन, डिटर्जेंट और मोमबत्ती बनाने में भी होता है. इससे बायोडीजल भी तैयार होता है.
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वर्षावनों की जगह लेते ताड़
ताड़ के पेड़ों के विस्तार से नुकसान भी हो रहा है. गर्मी और नमी वाले वातावरण में पैदा होने वाले ताड़ के लिए वर्षावनों का माहौल उपयुक्त है. पिछले कुछ सालों में मलेशिया और इंडोनेशिया में वर्षावनों को काट कर इन्हें उगाया जा रहा है. इससे वर्षावनों में रह रहे जीवों के लिए दिक्कत पैदा हो रही है.
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भांग बुनाई के लिए
भांग का इस्तेमाल नशे के लिए होता आया है, लेकिन इसके कई औद्योगिक फायदे भी हैं. फ्रांस में इसके रेशे से खास तरह का कागज और कपड़े भी तैयार किए जा रहे हैं.
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ताकि गर्मी बनी रहे
भांग के रेशों का इस्तेमाल ऊष्मारोधी कवच बनाने में भी किया जाता है. ये ठंडक को रोकते हैं लेकिन नमी से इनका बैर है. इसलिए इनका इस्तेमाल घरों की दीवारों और छतों को गर्म रखने के लिए घरों के अंदर परत लगाकर होता है. गर्मियों में इसकी मदद से घर ठंडा रहता है.
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चार्टर बीते 50 साल से मीथेन हाइड्रेट पर शोध कर रहे हैं. वह चेतावनी देते हुए कहते हैं कि जल्दबाजी करने के बजाए अभी अलग अलग परिस्थितियों में मीथेन हाइड्रेट के व्यवहार को समझने की जरूरत है.
बर्फ से बाहर निकलते ही मीथेन तेजी से फैलती है. ऐसे में धमाके का खतरा भी पैदा हो जाता है. कुछ वैज्ञानिकों का तो यह भी मानना है कि 2010 में मेक्सिको की खाड़ी में बीपी के ऑयल प्लेटफॉर्म पर धमाका मीथेन हाइड्रेट की वजह से ही हुआ.
अमेरिका और जापान के वैज्ञानिकों ने 2012 में अलास्का की उत्तरी ढलान से मीथेन हाइड्रेट निकालने में कामयाबी पाई. वैज्ञानिकों ने गहरी ड्रिल कर सीओटू और नाइट्रोजन के मिश्रण को जमीन के भीतर डाला. इस मिश्रण ने गहराई में दबाव को कम कर दिया और मीथेन रिसने लगी. दो दिन बाद वहां से काफी मीथेन बाहर आती गई.
वैज्ञानिक जोर देकर कह रहे हैं कि इस क्षेत्र में अभी बहुत ज्यादा रिसर्च की जरूरत है. अमेरिका का ऊर्जा मंत्रालय मीथेन हाइड्रेट पर 8 करोड़ डॉलर की फंडिंग वाली छह वर्षीय योजना बना चुका है. वैज्ञानिकों के मुताबिक फिलहाल मीथेन का व्यावसायिक इस्तेमाल तेल और गैस के मुकाबले बहुत ही ज्यादा मंहगा भी है.
वैज्ञानिक समुदाय के मन में एक बड़ी चिंता भी है. फुकुशिमा हादसे के बाद जापान बहुत तेजी से मीथेन हाइड्रेट निकालने पर काम कर रहा है. भारत और चीन भी समंदर की गहराई से संसाधन बाहर निकालने की तैयारी कर रहे हैं. रूस और कनाडा के पास बड़ा बर्फीला इलाका है, जहां मीथेन हाइड्रेट की अपार मात्रा हो सकती है. लेकिन पृथ्वी पर मौजूद बर्फ पर्यावरण के लिए ढाल का काम करती है. अगर ऊर्जा की भूख के चलते यह तहस नहस हो गई तो बहुत कुछ खत्म हो जाएगा.
(इन देशों के पास है सबसे बड़ा ऑयल रिजर्व)
इन देशों के पास है सबसे बड़ा ऑयल रिजर्व
विश्व की राजनीति तेल में सनी रहती है. जिन देशों के पास तेल है, वे या दोस्त हैं या दुश्मन. अमेरिकी एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन की यह सूची इसकी झलक भी देती है.