पिछले हफ्ते पेरिस में करीब 200 देशों द्वारा तय पर्यावरण संधि को दुनिया भर में ऐतिहासिक संधि बताया जा रहा है. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस का कहना है कि इसमें संदेह है कि संधि को ऐतिहासिक कहा जा सकता है.
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पहले कुछ सकारात्मक बातें. हाल के सालों में मानवजाति के प्रतिनिधियों द्वारा इस ग्रह पर हमारे भविष्य की सुरक्षा के लिए संधि तय करने और उस पर हस्ताक्षर करने में विफलताओं के बाद पेरिस संधि आगे की ओर एक कदम है. पिछले एक दशक की बहस को देखें तो लगता है कि वे लोग जो जलवायु परिवर्तन और इसके मानव निर्मित होने को नकारते रहे हैं, अब दलील की प्रतिस्पर्धा हार रहे हैं. अमेरिका में कुछ रिपब्लिकन नेता इसे भविष्य में भी नकारते रहेंगे, लेकिन उनकी दलीलें अब इतिहास के कचरेदान में होंगी, भले ही रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार कह रहे हों कि वे जीतने पर पेरिस संधि को नहीं मानेंगे. भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन करने वाले चीन और भारत ने भी अपना रवैया बदल लिया है. अधिकांश पश्चिमी देश अब अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने की ओर बढ़ रहे हैं, भले ही यह बहुत धीमी गति से हो रहा हो.
ग्रैहम लूकस
पेरिस का घोषित लक्ष्य ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना है. यह लक्ष्य तय करना अत्यंत जरूरी था, भले ही इसे पूरा करने में अब देर हो गई हो. वैज्ञानिकों का मानना है कि सदी के अंत तक धरती का तापमान दो से तीन डिग्री तक बढ़ सकता है. इसके गंभीर नतीजे होंगे. हम अभी ही अब तक के रिकॉर्ड बाढ़, तूफान और सूखे का सामना कर रहे हैं. समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, समुद्रतट डूब रहे हैं. इसकी वजह से लोगों का व्यापक विस्थापन हो रहा है. ये कोई संयोग नहीं है, इसकी वजह जलवायु परिवर्तन है.
पेरिस संधि जलवायु परिवर्तन की लहर को किस हद तक रोक पाएगी? दरअसल पेरिस में हुई संधि किसी पर कुछ करने की जिम्मेदारी नहीं देती. किसी खास तारीख पर जीवाश्म ऊर्जा का इस्तेमाल बंद करना तय नहीं किया गया है. कोयला और तेल जलाने वाले देशों के लिए कोई सजा तय नहीं की गई है, क्योंकि वे या तो अपने लोगों का जीवनस्तर बनाए रखना चाहते हैं या उसे बेहतर बनाना चाहते हैं. संधि पर दस्तखत करने वालों ने उत्सर्जन करने, अपना लक्ष्य तय करने और अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है. लेकिन इसकी निगरानी कोई नहीं करेगा, किसी को संधि को नजरअंदाज करने की सजा नहीं मिलेगी.
हकीकत यह है कि पेरिस की पर्यावरण संधि छह साल पहले कोपेनहेगन की तरह विफलता नहीं है. यह सही दिशा में उठाया गया छोटा सा कदम है. कुछ साल बाद लोग पीछे मुड़कर देखेंगे और कहेंगे, "यह वह घड़ी थी जब लोगों ने महसूस किया कि दांव पर क्या है. त्रासदी यह है कि हममें उस समय और कुछ करने की हिम्मत नहीं थी."
कार्बन डाय ऑक्साइड, कांचघर प्रभाव, उत्सर्जन, जलवायु परिवर्तन के असर, ये शब्द हर रोज मीडिया में सुनाई देते हैं. लेकिन इन शब्दों के पीछे क्या है? पर्यावरण संरक्षण के बारे में अपनी जानकारी टेस्ट कीजिए.
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सवाल
धरती कितनी गर्म हो गई है?
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जवाब
सन 1850 के करीब औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में धरती एक डिग्री गर्म हुई है. वैज्ञानिकों को डर है कि उनके द्वारा तय 2 डिग्री की सीमा को 2100 तक बचा पाना संभव नहीं है. आलोचक 2 डिग्री सेल्सियस की सीमा को यूं भी ज्यादा मानते हैं और नए सर्वेक्षणों की रोशनी में 1.5 डिग्री की सीमा पर जोर दे रहे हैं.
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सवाल
सन 2100 तक धरती के 2 डिग्री गर्म होने के क्या परिणाम होंगे?
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जवाब
धरती का तापमान यदि तेजी से बढ़ता है तो तीस लाख लोग तटीय क्षेत्रों में आने वाली बाढ़ से खतरे में पड़ जाएंगे. इसके अलावा 2 अरब लोग सूखे की वजह से पानी की कमी का शिकार होंगे. 20 से 30 प्रतिशत प्रजातियां खत्म हो जाएंगी क्योंकि धरती के गर्म होने से उनकी प्रकृति के अनुरूप ढलने की क्षमता खत्म हो जाएगी.
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सवाल
कांचघर प्रभाव कैसे पैदा होता है?
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जवाब
कोयला, खनिज तेल और गैस. बिजली बनाने, घर को गर्म करने, मोटर चलाने या औद्योगिक उत्पादन के लिए इन प्राकृतिक ईंधनों को जलाने से कार्बन डाय ऑक्साइड पैदा होता है जो वातावरण में घुल जाता है. कांचघर प्रभाव उत्पन्न करने में कार्बन डाय ऑक्साइड की 65 प्रतिशत जिम्मेदारी है.
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सवाल
पिछले साल कौन से देश मौसम में तेज बदलाव से प्रभावित थे?
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जवाब
पर्यावरण संगठन जर्मन वॉच के अनुसार सर्बिया, अफगानिस्तान और बोजनिया-हैर्त्सेगोविना में 2015 में खतरनाक मौसमी घटनाएं हुई. 1995 से बाढ़, तूफान और सूखे जैसी मौसमी परेशानियों का शिकार सबसे ज्यादा होंडुरास, म्यांमार, हैती और फिलीपींस जैसे दक्षिण के छोटे देश हुए हैं.
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सवाल
जलवायु परिवर्तन पर समुद्र का खारापन क्यों बढ़ता है?
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जवाब
समुद्र के पानी पर कांचघर गैस कार्बन डाय ऑक्साइड का रासायनिक असर होता है. रासायनिक प्रक्रिया से पानी अल्कली का हिस्सा कम हो जाता है. इसका समुद्र में अल्गी और कोराल जैसे जीवों पर बुरा असर होता है. पानी में अम्ल जितना ज्यादा होगा चूने के खोल गलने लगते हैं और कोराल मरने लगते हैं.
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सवाल
जलवायु परिवर्तन में किसकी ज्यादा भूमिका है?
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जवाब
एयरबस ए 320 से उड़ान भरने वाला यात्री 248 किलो कार्बन डाय ऑक्साइड पैदा करता है. उसी दूरी को तय करने के लिए फोल्क्सवागेन की नई कार 179 ग्राम कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित करती है. पर्यावरण के लिए सबसे अच्छा है रेल से सफर करना. इस दूरी के लिए प्रति यात्री कार्बन डाय ऑक्साइड का उत्सर्जन 11 किलो है.