पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर हिस्सेदारी का कानूनी हक हासिल करने के बाद बेटियों को अब उत्तराधिकार में भी अधिकार मिलना बड़ी कामयाबी है. भारत के खाप पंचायतों वाले समाज में यह सामाजिक लिहाज से भी मील का पत्थर है.
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अपने तरह के इस अनूठे मामले में पैत्रिक संपत्ति में शादीशुदा बेटी को हिस्सा देने से आगे जाकर देश की सर्वोच्च अदालत ने मालिकाना हक देने की बात कही है. वह भी पिता द्वारा बेटी को उसके भाई और मां को नजरअंदाज कर संपत्ति का वारिस और मालिक घोषित करना साहसिक फैसला है.
यह मामला उत्तराधिकार के कानून में संपत्ति के बटवारे से इतर किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं अर्जित संपत्ति को हस्तांतरित करने के अधिकार की भी स्पष्ट व्याख्या करता है. खासकर सोसाइटी एक्ट के तहत एक पिता अपनी शादीशुदा बेटी को पत्नी और बेटे को नजरंदाज कर मकान का मालिकाना हक अपने जिंदा रहते ही सौंप सकता है.
अदालत ने कोलकाता की पक्षकार ग्रुप हाउसिंग सोसायटी की उस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि पिता ने बेटी को फ्लैट के मालिकाना हक में हिस्सेदारी या वारिसों की सूची में शामिल नहीं किया था. दरअसल प्रतिवादी पक्षकारों पत्नी और हाउसिंग सोसायटी का सोसाइटी एक्ट के हवाले से दावा था कि संपत्ति के मालिक ने मकान के अंशधारकों और वारिस की सूची में पत्नी और बेटे को शामिल किया था. इसलिए वसीयत या किसी अन्य माध्यम से संपत्ति मालिक पत्नी और बेटे के बजाय बेटी को मकान का उत्तराधिकारी घोषित नहीं कर सकता है.
भारत में महिलाओं के लिए ऐसे कई कानून हैं जो उन्हें सामाजिक सुरक्षा और सम्मान से जीने के लिए सुविधा देते हैं. देखें ऐसे कुछ महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार...
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पिता की संपत्ति का अधिकार
भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार देता है. अगर पिता ने खुद जमा की संपति की कोई वसीयत नहीं की है, तब उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति में लड़की को भी उसके भाईयों और मां जितना ही हिस्सा मिलेगा. यहां तक कि शादी के बाद भी यह अधिकार बरकरार रहेगा.
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पति की संपत्ति से जुड़े हक
शादी के बाद पति की संपत्ति में तो महिला का मालिकाना हक नहीं होता लेकिन वैवाहिक विवादों की स्थिति में पति की हैसियत के हिसाब से महिला को गुजारा भत्ता मिलना चाहिए. पति की मौत के बाद या तो उसकी वसीयत के मुताबिक या फिर वसीयत ना होने की स्थिति में भी पत्नी को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. शर्त यह है कि पति केवल अपनी खुद की अर्जित की हुई संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है, पुश्तैनी जायदाद की नहीं.
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पति-पत्नी में ना बने तो
अगर पति-पत्नी साथ ना रहना चाहें तो पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने और बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांग सकती है. घरेलू हिंसा कानून के तहत भी गुजारा भत्ता की मांग की जा सकती है. अगर नौबत तलाक तक पहुंच जाए तब हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा 24 के तहत मुआवजा राशि तय होती है, जो कि पति के वेतन और उसकी अर्जित संपत्ति के आधार पर तय की जाती है.
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अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय
कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अर्जित की गई संपत्ति का जो चाहे कर सकती है. अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई और दखल नहीं दे सकता. महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चो को बेदखल भी कर सकती है.
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घरेलू हिंसा से सुरक्षा
महिलाओं को अपने पिता या फिर पति के घर सुरक्षित रखने के लिए घरेलू हिंसा कानून है. आम तौर पर केवल पति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कानून के दायरे में महिला का कोई भी घरेलू संबंधी आ सकता है. घरेलू हिंसा का मतलब है महिला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या प्रताड़ना.
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क्या है घरेलू हिंसा
केवल मारपीट ही नहीं फिर मानसिक या आर्थिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा के बराबर है. ताने मारना, गाली-गलौज करना या फिर किसी और तरह से महिला को भावनात्मक ठेस पहुंचाना अपराध है. किसी महिला को घर से निकाला जाना, उसका वेतन छीन लेना या फिर नौकरी से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेना भी प्रताड़ना है, जिसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला बनता है. लिव इन संबंधों में भी यह लागू होता है.
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पुलिस से जुड़े अधिकार
एक महिला की तलाशी केवल महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है. महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले पुलिस हिरासत में नहीं ले सकती. बिना वारंट के गिरफ्तार की जा रही महिला को तुरंत गिरफ्तारी का कारण बताना जरूरी होता है और उसे जमानत संबंधी उसके अधिकारों के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए. साथ ही गिरफ्तार महिला के निकट संबंधी को तुरंत सूचित करना पुलिस की ही जिम्मेदारी है.
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मुफ्त कानूनी मदद लेने का हक
अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है तो महिलाओं के लिए कानूनी मदद निःशुल्क है. वह अदालत से सरकारी खर्चे पर वकील करने का अनुरोध कर सकती है. यह केवल गरीब ही नहीं बल्कि किसी भी आर्थिक स्थिति की महिला के लिए है. पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता समिति से संपर्क करती है, जो कि महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देने की व्यवस्था करती है.
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साथ ही उत्तराधिकार नियमों के मुताबिक भी वादी के बेटे और पत्नी उक्त संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकते हैं क्योंकि एक बेटे के लिए पिता की संपत्ति में कानूनी हक मांगने का कानूनी अधिकार है. पक्षकारों की तीसरी दलील बेटी के शादीशुदा होने की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज कर कहा कि अव्वल तो बेटा और पत्नी विवादित मकान को पैत्रिक संपत्ति नहीं कह सकते हैं. क्योंकि यह प्रतिवादी ने स्वयं खरीदी थी. इसलिए इस संपत्ति को उत्तराधिकार के दायरे में नहीं रखा जा सकता है.
जहां तक सोसायटी एक्ट के प्रावधानों का सवाल है तो अदालत ने कहा कि संपत्ति के मालिक ने पत्नी और बेटे के गैरजिम्मेदाराना रवैये से आजिज आकर संपत्ति का उत्तराधिकार शादीशुदा बेटी को दिया है. इसमें संपत्ति के पंजीकरण के समय खरीददार द्वारा पत्नी और बेटे को वारिस बनाना इस बात का पुख्ता आधार नहीं है कि उन्हें ही उत्तराधिकार मिलेगा. संपत्ति का मालिक किसी भी समय वारिस को बदल सकता है और किसी और को वारिस बना सकता है.
अदालत का यह फैसला महिलाओं के कानूनी हक की लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने में अहम हथियार साबित होगा. इस लिहाज से यह फैसला कानून के अलावा सामाजिक महत्व के लिहाज से खासा अहम कहा जा सकता है.