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प्रयोगशाला में बना छोटा दिमाग

१६ सितम्बर २०१३

वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में "छोटा दिमाग" बनाने में कामयाबी हासिल कर ली है. यह बहुत विकसित तो नहीं लेकिन दिमाग को समझने में जरूर मददगार होगा.

तस्वीर: IMBA/M. A. Lancaster

इंसानी दिमाग के ऊतकों को विकसित करने में सफलता ऑस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने हासिल की है. टेस्ट ट्यूब "लघु मस्तिष्क" को तंतु कोशिकाओं से तैयार किया गया है और यह इंसानी दिमाग की गड़बड़ियों को समझने में मदद करेगा. छोटा दिमाग, लघु मस्तिष्क या मिनी ब्रेन सुनना ऑर्गनॉयड की तुलना में ज्यादा मानवीय लगता है. हालांकि वियेना इंस्टीट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में युर्गेन क्नोबलिश और उनके सहयोगी ऑर्गनॉयड ही विकसित कर रहे हैं. क्नोबलिश ने एक घूमते गोलाकार पात्र की ओर इशारा करते हुए कहा, "वे उस फ्लास्क में हैं और उन्हें धीमे धीमे हिलाया जा रहा है, यह जरूरी है कि उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलें." क्नोबलिश ने बताया कि घूमते बायो रिएक्टर इस तंत्र को काम करने लायक बनाने में सबसे अहम कड़ी साबित हुए जो उनके सहयोगी मैडलिन लांकास्टर की खोज थी.

बहुत से न्यूरोलॉजिस्ट क्नोबलिश की खोज से सहमत और उत्साहित हैं. उनका मानना है कि इससे इंसानी दिमाग की गड़बड़ियों को समझने में मदद मिलेगी. पर आखिर यह वैज्ञानिक करना क्या चाहते हैं? क्नोबलिश ने समझाया, "इसका उद्देश्य इंसानी दिमाग के विकास के प्राथमिक चरणों को विकसित करना है. क्योंकि आप जानते हैं कि बायो मेडिकल रिसर्च की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इंसानी प्रक्रिया और इंसानी रोगों को समझने के लिए हमें जानवरों पर प्रयोग करने पड़ते हैं. निश्चित रूप से हम इंसानों पर कोई प्रयोग नहीं कर सकते और इसलिए हमें मॉडल की जरूरत है."

तस्वीर: IMBA/M. A. Lancaster

इंसानी दिमाग के ऊतक लैबोरेटरी में पहले भी विकसित किए गए हैं लेकिन वैज्ञानिकों को इससे पहले कभी तीन आयामों वाला वैसा आकार नहीं मिला जैसा वियेना के इन वैज्ञानिकों ने तैयार किया है. उन्होंने एक वयस्क इंसान की तंतु कोशिका से न्यूरोएक्टेडर्म नाम का ऊतक तैयार किया है. यह कोशिकाओं का वह युग्म है जिनसे दिमाग और तंत्रिका तंत्र विकसित होता है. इन ऊतकों को घूमते बायो रिएक्टर में खास पोषक तत्व दिए जा रहे हैं.

लगातार बढ़ते ऊतक

वैज्ञानिक मैडलिन लांकास्टर का कहना है कि ऊतकों के लगातार बढ़ने से भारी उत्साह है. लांकास्टर ने कहा, "मैंने उन्हें एक दो दिन के अंतर पर देखा है, वो लगातार बढ़ रहे हैं. और तब ऐसा पल भी आया जब मुझे लगा कि उनका बढ़ना रुकेगा भी या नहीं क्योंकि वो काफी बड़े हो गए थे, करीब 3-4 मिलीमीटर तक जो उनके बढ़ने की सीमा है. अब तक इस्तेमाल की गई दूसरी किसी भी विधि की तुलना में यह काफी ज्यादा है. उन्हें बढ़ते देखना तो मेरे लिए तो यह काफी चौंकाने वाला था. वास्तव में मुझे इतनी उम्मीद नहीं थी."

इसका बढ़ना तो ठीक है लेकिन यह मिनी ब्रेन सचमुच दिमाग से कितना जुड़ा है? डॉ डीन ब्रुनेट ब्रिटेन की कार्डिफ यूनिवर्सिटी में न्यूरोलॉजी की प्रोफेसर हैं. वो इस रिसर्च में शामिल नहीं थी लेकिन उनका कहना है कि यह अच्छा लग रहा है, दिमाग की जटिलता से काफी नीचे का स्तर है लेकिन एक हिस्से से दूसरे हिस्से में संकेतों को हासिल करने और संपर्क बनाने में सक्षम दिखता है जो सचमुच बेहद अहम और शायद दिमाग का सबसे बुनियादी हिस्सा है."

उधर प्रयोगशाला में युर्गेन क्नोबलिश बताते हैं कि माइक्रोस्कोप के जरिये क्या देखा जा सकता है. क्नोबलिश ने कहा, "सैद्धांतिक रूप से हम इंसानी दिमाग के कई हिस्सों को यहां देख सकते हैं. हम कॉर्टेक्स देख सकते हैं, हिप्पोकैम्पस देख सकते हैं और यहां तक कि एक विकसित होती आंख भी देख सकते हैं. अलग अलग तौर पर देखने से ये दिमाग के हिस्से हैं लेकिन पूरा ऑर्गेनॉयड दिमाग की संरचना से मेल नहीं खाता."
क्नोबलिश की टीम मानती है कि ऑर्गेनॉयड इंसानी दिमाग की पूरी जटिलता हासिल नहीं कर पाएगा. रक्त के प्रवाह के साथ ही पोषक तत्वों और ऑक्सीजन की कमी इसके आगे के विकास में बाधा डालेगी. क्नोबलिश का कहना है, "मै अक्सर इसकी तुलना ऐसी कार से करता हूं जिसमें इंजिन छत पर है, एग्जॉस्ट पाइप सामने की ओर, गियरबॉक्स बीच में और पहिये ऊपर की तरफ हैं. ऐसी कार यह जानने में इस्तेमाल की जा सकती है कि इंजिन काम कैसे करता है क्योंकि यह सारे हिस्सों से सही तरीके से जुड़ा है लेकिन इस कार को आप कभी चला नहीं सकेंगे."

रिपोर्टः केरी सायरिंग/एनआर

संपादनः आभा एम

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