अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चेतावनी दी है कि 2014 के बाद उसका एक भी सैनिक अफगानिस्तान में नहीं रहेगा. अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई ने साझा सुरक्षा समझौते पर साइन से इनकार करने बाद अमेरिका ने यह कहा.
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ओबामा ने रक्षा विभाग से कहा कि वह साल के अंत तक पूरी तरह अमेरिकी सेना की वापसी के लिए योजना तैयार रखे. और अफगानिस्तान को कहा है कि वह इस संभावना के लिए तैयार रहे कि 2014 के बाद वहां एक भी अमेरिकी सैनिक नहीं होगा.
मंगलवार को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई से फोन पर बात करने के बाद ओबामा ने यह रुख दिखाया. हालांकि इस बात का भी अंदाजा लगाया जा रहा है कि अफगानिस्तान में नए राष्ट्रपति के आने पर दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा समझौता हो सकता है और पूरी सेना की वापसी टल सकती है.
करजई से नाखुश अमेरिका
25 जून से अब तक यह पहली बार हुआ है जब ओबामा और करजई के बीच बातचीत हुई है. अमेरिका की अफगानिस्तान से नाराजगी द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते पर करजई के हस्ताक्षर नहीं करने के कारण है. द्विपक्षीय समझौते के तहत प्रस्तावित था कि अमेरिकी और नाटो सैनिकों के अफगानिस्तान से 2014 के अंत में वापसी के बाद भी कुछ सैन्य दल अफगानिस्तान में रह कर आतंकवाद निरोधी अभियानों और सैन्य प्रशिक्षण कार्यक्रमों में अफगानिस्तान की मदद करेंगे.
तस्वीर: Noorullah Shirzada/AFP/Getty Images
अमेरिका के खिलाफ अपने रवैये से करजई अमेरिका को नाराज करते आए हैं. इस महीने अमेरिकी अधिकारियों की आपत्ति के बावजूद 65 कैदियों की रिहाई भी ऐसा ही एक कदम था. करजई की मांग थी कि अमेरिका को अफगान गांवों और रहवासी इलाकों पर हवाई हमले रोकने चाहिए. और तालिबान को शांति वार्ता करनी चाहिए और ग्वांतानामों में कैद अफगान तालिबानियों को रिहा करे.
मुश्किल है रुकना
अमेरिका का कहना है कि सुरक्षा समझौते के बगैर वे अफगानिस्तान में दिसंबर 2014 के बाद एक भी सैनिक नहीं रखेंगे. ओबामा और करजई के बीच तनातनी के बावजूद कई अमेरिकी सलाहकारों का मानना है कि अमेरिकी सेना को कुछ और समय अफगानिस्तान में रुकना चाहिए. अमेरिकी रक्षा विभाग को लगता है कि अफगान सैनिकों के प्रशिक्षण और आतंकवाद निरोधी अभियानों के लिए करीब दस हजार सैनिकों वहां रुकना जरूरी है. कुछ सलाहकार इससे कम की बात भी कर रहे हैं. मंगलवार को दोनों राष्ट्रपतियों के बीच हुई बातचीत के बाद अमेरिकी सेना की वापसी के इंतजाम की तैयारी तेज किए जाने के संकेत मिले हैं.
जंग और जिंदगी के बीच अफगानिस्तान
पुरस्कृत फोटोग्राफर मजीद सईदी की तस्वीरें सालों से जंग की आग में झुलसते अफगानिस्तान के हालात दिखाती हैं.
तस्वीर: Majid Saeedi
नशे में डूबा बचपन
अफगानिस्तान में नशा एक बड़ी समस्या है. बचपन से ही अफीम की लत लगने का खतरा रहता है. नशे के शिकार बच्चों के कोई आधिकारिक आंकड़े नहीं हैं लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अनुसार यह संख्या करीब तीन लाख है.
तस्वीर: Majid Saeedi
त्रासदी के खिलौने
काबुल में दो छोटी लड़कियां कृत्रिम हाथ से खेल रही हैं. इस तस्वीर के लिए मजीद सईदी को कई अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया.
तस्वीर: Majid Saeedi
मुझे कहना है
मजीद सईदी ने 16 साल की उम्र में फोटोग्राफी करना शुरू किया. तब से वह लोगों के जीवन के संघर्ष को अपनी तस्वीरों में दिखाते आए हैं. उनकी तस्वीरें श्पीगल, वॉशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स जैसी नामचीन पत्रिकाओं में छप चुकी हैं.
तस्वीर: Majid Saeedi
अफगान बच्चे
दसियों सालों से अफगान जंग के साए में जी रहे हैं. सईदी की तस्वीरें उनकी जिंदगी से रूबरू कराती हैं, जैसे यह अफगान बच्चा जो एक धमाके में अपने हाथ खो बैठा.
तस्वीर: Majid Saeedi
दास्तां सुनाते खंडहर
अफगानिस्तान के अतीत की कहानी सिर्फ लोग ही नहीं, देश भर में इमारतों के खंडहर भी सुनाते हैं.
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सावधान!
काबुल में हर सुबह सैनिकों की ट्रेनिंग होती है. जर्मन सेना भी अफगान सेना की ट्रेनिंग में मदद कर रही है. मकसद है कि जब 2014 के अंत में जर्मन सेना अफगानिस्तान से वापसी करे तो अफगान सेना परिस्थितियों का खुद मुकाबला कर सके.
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मुश्किल बचपन
अफगानिस्तान में अच्छी शिक्षा व्यवस्था की भी कमी है. कई बच्चों को परिवार को सहारा देने के लिए बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर काम में लगना पड़ता है.
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पढ़ाई मयस्सर नहीं
1979 के बाद से देश में शिक्षा व्यवस्था पर बेहद खराब असर पड़ा. जर्मन सरकार द्वारा 2011 में जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार अफगानिस्तान के 72 फीसदी पुरुष और 93 फीसदी महिलाओं को कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली है.
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गुड़ियां बनाते हाथ
एक मलेशियाई गैर सरकारी संगठन द्वारा दिए जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रम में लड़कियां गुड़ियां बनाना सीख रही हैं. मकसद हैं उन्हें आत्मनिर्भर बनाना.
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तालिबान का बदला
2011 में ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद तालिबान हमले में चार लोग मारे गए और 36 घायल हुए. यह तस्वीर इनमें से दो पीड़ितों की है.
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अफगान खेल
अफगानिस्तान में बॉडी बिल्डिंग को पुरुष बेहद पसंद करते हैं. कसरत के बाद आराम करते दो नौजवान.
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जंग की फसल
पिछले तीस सालों ने अफगान जीवन को बहुत प्रभावित किया है. यहां के खेत और खलिहान भी जंग के शिकार हुए हैं.
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मदरसे
2011 की तस्वीर. कंधार के एक मदरसे में पढ़ते बच्चे.
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मारने को तैयार
अफगानिस्तान में कुत्तों की आम लड़ाई लोकप्रिय है. कुत्तों को मुकाबले में लड़ने और मारने का प्रशिक्षण दिया जाता है.
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अलग थलग
मनोवैज्ञानिक बीमारियों से जूझ रहे लोग बाकियों से अलग कई बार आमानवीय परिस्थितियों में रखे जाते हैं. हेरात शहर के एक अस्पताल का दृश्य.
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बदकिस्मती
अकरम ने अपने दोनो हाथ खो दिए. सोने से पहले वह अपने दोनों कृत्रिम हाथ निकाल कर अलग रख देता है. उसके जैसे कई और बच्चे हैं जो ऐसी बदनसीबी को झेल रहे हैं.
तस्वीर: Majid Saeedi
मकसद
मजीद सईदी अपनी तस्वीरों के जरिए समाज के बारे में बहुत सी जरूरी बातें कहने की कोशिश करते हैं. पिछले दिनों पेरिस में उन्हें 2014 के लूकास डोलेगा पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
तस्वीर: Maryam Ashrafi
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इस बीच अमेरिकी सुरक्षा सेनाओं के प्रमुख जनरल मार्टिन डेंप्से अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सेना से मिलने पहुंचे. डेंपसी के साथ सफर कर रहे पत्रकारों से उन्होंने कहा, "मैं नौजवान सैनिकों से यह नहीं कह सकता कि वे बिना द्विपक्षीय सुरक्षा समझौते के इस देश में डटे रहें. हम उस स्थिति में हैं जहां हमें दूसरे विकल्पों के बारे में योजना बनानी शुरू करना होगी."
पड़ोसियों को खतरा
अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के पूरी तरह हट जाने की बात से पड़ोसी देशों में चिंता की लहर फैली हुई है. खासकर पाकिस्तान में, जहां अधिकारियों ने चेतावनी भी दी है कि अफगानिस्तान में गृह युद्ध की स्थिति में पूरे इलाके को नुकसान उठाना पड़ सकता है. पाकिस्तानी अधिकारियों को इस बात की चिंता भी है कि अमेरिका के बिना अफगान सेना आतंकवाद से लड़ने में कमजोर पड़ सकती है.
अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के सुरक्षा समझौते को पिछले साल वहां के करीब 3000 लोया जिरगा कबायली नेताओं ने समर्थन दिया था. लेकिन करजाई ने इस समझौते पर दस्तखत यह कह कर टाल दिए कि यह फैसला आने वाला राष्ट्रपति करेगा. फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि अगले राष्ट्रपति करजाई की ही तरह इस समझौते को टालेंगे या इसका समर्थन करेंगे.