हर हफ्ते कहीं न कहीं से तूफान, भारी बरसात, बाढ़, भूस्खलन और भूकंप की खबर आती है लेकिन जलवायु परिवर्तन पर शोर तभी मचता है जब कोई अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहा हो. बॉन में होने वाले जलवायु सम्मेलन से पहले भी हालत अलग नहीं.
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संयुक्त राष्ट्र ने फिर चेतावनी दी है. इस बार चेतावनी सख्त है कि प्रकृति का ऐसा दोहन जारी रहा तो दस साल के अंदर जलवायु परिवर्तन को रोकना और पलटना संभव नहीं रहेगा. धरती इतनी गर्म हो जायेगी कि भू-भाग जलमग्न हो जायेंगे, बहुत सारे इलाके रहने लायक नहीं रहेंगे और मौसम उत्पाती हो जायेगा लेकिन बहुत सारे लोगों को अभी भी इस चेतावनी पर भरोसा नहीं. तभी तो अमेरिका ने पेरिस जलवायु संधि से बाहर निकलने का फैसला किया है और बॉन में वह एक बहुत ही छोटे स्तर के प्रतिनिधिमंडल के साथ भाग ले रहा है. जब समझौते की शर्तें माननी ही नहीं तो फिर बहस किस बात की. बॉन में कोई नये लक्ष्य तय भी नहीं होने हैं, बस यह तय करना है कि पेरिस में तय लक्ष्यों को कैसे पूरा किया जाए. संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों के नेताओं ने जो वादे किये थे वे उन लक्ष्यों से कोसों दूर हैं.
सोलोमन द्वीप के लौ लैगून हिस्से में रहने वाले लोगों का समुद्र के साथ रिश्ता कई पीढ़ियों से चला आ रहा है. लेकिन अब जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते जल स्तर ने इनकी जिंदगी और अस्तित्व पर सवाल उठा दिये हैं
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पानी पर जिंदगी
उच्च ज्वार में लौ लैगून द्वीप पर पहले शायद ही कभी जलस्तर ऊपर उठता था लेकिन अब यहां अति उच्च ज्वार और तेज तूफानों का आना आम बात हो गयी है. नतीजन, अब तक प्रकृति की गोद में रहने वाले इस द्वीप का कुछ हिस्सा समुद्र में डूबने लगा है.
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समुद्र से जुड़े लोग
स्थानीय कहानियों के मुताबिक "वाने ई ऐसी" या समुद्री लोग इस कृत्रिम द्वीप में 18 पीढ़ियों से रह रहे हैं. ये लोग कहते हैं कि उन्हें समुद्र के करीब अपनापन महसूस होता है और यह समंदर उन्हें मछलियां देता है. साथ ही उन्हें मच्छरों से भी राहत रहती है.
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बढ़ता जलस्तर
अब जब यहां समुद्री जलस्तर बढ़ रहा है तो लोगों के पास पानी से ऊपर बने इन घरों को और ऊंचा करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं है.
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बच्चों का जीवन
अपने बचपन को इस समुद्र के निकट बिताते यहां के बच्चों के लिए ये पानी जीवन का अहम हिस्सा है. अपने स्कूल जाने के लिए ये बच्चे समुद्री रास्ता पार कर जाते हैं.
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जन्म से नाविक
लोग द्वीप से तट तक का रास्ता बनाना, उसे पार करना आसानी से सीख जाते हैं और जल्द ही पानी के ऊपर बने अपने घरों से तट की ओर-जाना इनकी आदत में शुमार हो जाता है.
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बदलाव के संकेत
यहां रहने वाले 52 साल के जॉन काईया इस द्वीप पर रहने वाली आइनाबाउलो जनजाति के मुखिया है. जॉन कहते हैं कि उन्होंने अपने जिंदगी में पहली बार मौसम में ऐसे बदलाव देखें हैं.
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तूफानी मौसम
लैगून पर रहने का मतलब है उष्णकटिबंधीय तूफानों को झेलना. ये तूफान पारंपरिक रूप से गर्मी के मौसम में आते थे लेकिन अब लौ लैगून पर मौसम अप्रत्याक्षित रूप से बदल रहा है.
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बहते आशियाने
बढ़ते जल स्तर और आये दिने आने वाले तूफानों ने यहां रहने वाले लोगों के घरों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है. इसलिए अब लोगों ने घरों की मरम्मत के काम ही रोक दिया है.
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समय के साथ जंग
बढ़ते जल स्तर के बीच लंबे समय तक यहां रहना एक चुनौती है. लेकिन लोग अब भी गुजर बसर कर रहे हैं लेकिन आउटहाउस को बांधने वाले पुल का नियमित रख-रखाव किया जा रहा है.
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पंछियों का अड्डा
तस्वीर में नजर आ रहा यह आउटहाउस पहले किसी घर का हिस्सा था जो आज यहां से गुजरने वाले पंछियों का अड्डा बन गया है. जलवायु परिवर्तन ने इसे लोगों से बेहद ही दूर कर दिया है
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नये पड़ोसी
लौ लैगून के लोग अब पड़ोस के द्वीप को समुद्र से बांधने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इन्हें काफी विवादों का सामना करना पड़ रहा है. भूमि विवाद का मतलब है निर्माण काम पर अदालती आदेश के बाद रोक.
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नई शुरूआत
कुछ वाने ई लोग अब भी सुरक्षित जगह के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कुछ नए कृत्रिम द्वीप बनाने की कोशिशों में हैं लेकिन अब भी इनके लिए काफी काम किया जाना बाकी है.
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विश्वास बरकरार
सोलोमन के इस द्वीप पर धर्म को बहुत अधिक तवज्जो मिलती है. बदलती परिस्थितियों में यहां के लोगों को भरोसा है कि इनकी जिदंगी को बचाने और इन्हें दूसरी जगह बसाने में चर्च जरूर मदद करेगा.
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अलविदा, अलविदा
प्रकृति के साथ तालमेल बिठा कर रहने वाले इन लोगों की जिदंगी को बढ़ते औद्योगिकीकरण के इस दौर में खतरा है, संभवत: भविष्य में यह द्वीप अपना अस्तित्व न बचा पाये और इसके साथ ही एक संस्कृति का भी अंत हो जाये.
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संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि यदि पर्याप्त प्रयास नहीं हुए तो 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन पेरिस के लक्ष्यों से 30 फीसदी ज्यादा होगा. शताब्दी के अंत तक धरती का तापमान 3 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ जायेगा. पेरिस में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इसे 2 डिग्री पर रोकना तय किया था लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार कौन हैं? एक रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई उत्सर्जन तो दुनिया की 250 कंपनियां करती हैं. इन्हें रोकना बिल्ली के गले में घंटी बांधने जैसा है. सम्मेलनों में तय फैसलों की काट वे निकाल ही लेते हैं.
सागर को तबाही से बचाने की कोशिश
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अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की एक विडंबना होती है. समझौतों की सौदेबाजी करने वाले लोग उसे लागू करने के लिए जिम्मेदार नहीं होते. इन सम्मेलनों में अधिकारी और राजनेता पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों को कम करने या बिजली के उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल घटाने के बड़े बड़े वादे करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें फैसलों की शक्ल देने में विफल रहते हैं. अक्सर पर्यावरण के मुद्दे आर्थिक मुद्दों पर हावी रहते हैं. कहीं गठबंधन सरकारों में सहमति नहीं हो पा रही है, कहीं इन कदमों को लागू करने के लिए धन का अभाव है तो कहीं पर्यावरण सुरक्षा के चक्कर में खर्च बढ़ रहा है और रोजगार मारे जा रहे हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की भी यही दलील थी और रूस तथा चीन भी ध्रुवीय इलाकों में तेल की खोज कर यही कर रहे हैं.
जर्मनी को पर्यावरण संरक्षण का अगुआ कहा जाता है, लेकिन पेरिस के लक्ष्यों को वह भी पूरा नहीं कर पायेगा. उसके फैसलों में भी आर्थिक प्राथमिकताएं अहम भूमिका निभा रही हैं, अब चाहें गाड़ियों के उत्सर्जन में कमी हो, कोयले से चलने वाले बिजलीघर हों या विमानन और नौवहन के लिए सुविधाएं हों. भले ही जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम में होने वाले बदलाव का उतना असर जर्मनी पर नहीं दिख रहा है, लेकिन यहां असमय आने वाले तूफान और बाढ़ के अलावा गर्मियों में गर्मियों का और ठंड में बर्फ का न होना तो दिख ही रहा है.
इन 10 कामों से बेहतर होगी दुनिया
जलवायु में परिवर्तन की चेतावनियां हम लगातार सुनते रहते हैं. दुनिया के नेता ना नुकुर कर रहे हैं लेकिन बहुत से काम हैं जो हम खुद शुरू करके धरती के बढ़ते तापमान को कम कर सकते हैं.
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बल्ब बदलिए
आप लैम्प तो अच्छा वाला ले आये हैं लेकिन इसमें बल्ब कौन सा है. अगर सामान्य टंगस्टन वाला बल्ब है तो इसे तुरंत एलईडी से बदल डालिए. ईमानदारी से कहें तो ये कोई बड़ा कदम नहीं लेकिन इस छोटे से कदम का असर बड़ा है. एलईडी बल्ब 90 फीसदी तक बिजली बचाते हैं.
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कपड़े धूप में सुखाइए
वर्षा वाले और ठंडे देशों में यह थोड़ा मुश्किल जरूर है लेकिन फिर भी पर्यावरण में बदलाव के कारण होने वाली मुश्किलों की तुलना में इनकी क्या बिसात. मशीनों से कपड़े सुखाने की तुलना में यही फायदेमंद है.
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रिसाइक्लिंग
दुनिया में हजारों लोगों ने रिसाइक्लिंग को रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल किया है. रिसाइकिल की गयी चीजों का इस्तेमाल इस जहां को बेहतर बनाने में बहुत कारगर है. पर अफसोस सिर्फ इतने से ही नहीं होगा.
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कपड़े ठंडे पानी से धोएं
गर्म पानी से कपड़ों के सिकुड़ने का डर रहता है लेकिन इसके अलावा एक और वजह है ठंडे पानी से कपड़े धोने की. वाटर हीटर का इस्तेमाल तो कम होगा ही, साथ ही ठंडे पानी से कपड़ों की धुलाई में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है.
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हाइब्रिड कार चलाएं
अगर आप अपनी कार पूरी तरह से छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं तो हाइब्रिड कार की सवारी कीजिए. हालांकि ध्यान रखिएगा कि इन कारों को चलाने वाली बिजली मुमकिन है कि जीवाश्म ईेंधन से ही आ रही हो.
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शाकाहारी बन जाइए
बीफ का उत्पादन दुनिया भर से जंगलों के घटने के पीछे एक बड़ा कारण है. खासतौर से इन पशुओँ के चारे के लिए. मांस वाले भोजन का कार्बन फुटप्रिंट भी शाकाहरी खाने की तुलना में करीब दुगुना होता है. अगर आप मांस खाना कम कर दें तो भी असर होगा.
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हरित ऊर्जा का उपयोग
दोबारा इस्तेमाल होने वाली ऊर्जा का चलना नया है लेकिन अब भी हम ज्यादातर कोयले जैसी जीवाश्म ईंधनों पर ही निर्भर हैं. जर्मनी में आप अपने लिए ऊर्जा कंपनी चुन सकते हैं और इनमें से कुछ हैं जो दोबारा इस्तेमाल होने वाले संसाधनों का उपयोग कर रही हैं.
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अटलांटिक के उस पार मत जाइए
पर्यावरण में बदलाव की एक बड़ी वजह है हवाई सफर. नीतियां बनाने वाले इस असर को कम करने के उपायों पर विचार कर रहे हैं लेकिन तब तक हम अपनी ओर से इतना कर सकते हैं कि फ्लाइट लेने से पहले एक बार दोबारा सोच लें. खासतौर से अगर सफर समंदर पार का हो.
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कार छोड़िए साइकिल चलाइए
कार छोड़ना पर्यावरण को बेहतर बनाने की दिशा में आपका दूसरा सबसे बड़ा कदम है. साइकिल की सवारी प्रकृति के साथ ही आपको भी तंदुरुस्त रखेगी. नीदरलैंड्स जैसे देश दुनिया के लिए अच्छी मिसाल बन सकते हैं.
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कम बच्चे पैदा कीजिए
जिस माहौल में हम जी रहे हैं उसमें धरती की सेहत के लिहाज से बच्चे पैदा करने से बुरा शायद और कुछ नहीं लेकिन अगर आप पीछे बताये गए बाकी 9 काम पूरे मन से कर रहे हों तो आपका बच्चा एक बेहतर दुनिया में जी सकेगा.
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बॉन सम्मेलन की सबसे बड़ी चुनौती अंतरराष्ट्रीय संधियों में भरोसा बहाल करने की होगी. यदि सारी दुनिया पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों में शामिल है तो उन्हें भरोसा भी होना चाहिए कि दूसरे भी इसके लिए कुछ कर रहे हैं और इन कदमों को मापने के कुछ तरीके भी होने चाहिए ताकि उन्हें परखा जा सके. 2020 में पेरिस संधि के शुरू होने से पहले सभी देशों को हिसाब-किताब करना होगा कि वे किस तरह प्रगति कर रहे हैं और इन सब के लिए तैयारी की जरूरत होगी. बॉन में एक तरह से पेरिस संधि के लिए ऑपरेटिंग सिस्टम बनाना होगा ताकि संधि न सिर्फ लागू हो सके, कामयाब भी हो सके.
बॉन सम्मेलन की अध्यक्षता फिजी कर रहा है. समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित दूसरे छोटे द्वीपों की तरह उसकी भी दिलचस्पी सम्मेलन की सफलता में है. वे न सिर्फ पर्यावरण सुरक्षा पर जोर दे रहे हैं बल्कि लक्ष्यों के पूरा न होने पर हर्जाने की मांग पर भी. आखिरकार नुकसान पैदा करने वाले को ही उसकी भरपाई भी करनी चाहिए. अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की तमाम राजनीति के बावजूद देहातों के उन किसानों को नहीं भुलाया जाना चाहिए जिनके खेतों पर सूखे की वजह से कोई फसल नहीं होती और उन किसानों को भी नहीं जिनकी फसल कटने से पहले ही बाढ़ के पानी में डूब जाती है. इससे पहले कि उन्हें घरबार छोड़ना पड़े, उनके हितों को अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों के मंच पर आना होगा.
मिटने से पहले देख लीजिये ये विश्व धरोहर
जानिये उन विश्व धरोहरों के बारे में जिन पर जलवायु परिवर्तन से मिटने का खतरा मंडरा रहा है. हो सके तो इन्हें देख भी आइए इससे पहले कि इनका अस्तित्व ही मिट जाए.
तस्वीर: Getty Images/J. Raedle
रापा नुई नेशनल पार्क, ईस्टर द्वीप, चिली
ईस्टर आइलैंड पर स्थित मोआई स्टैचू हर साल दुनिया भर के 60,000 से भी अधिक पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. इसके तटीय इलाकों में हो रहे कटाव और बढ़ते समुद्री जलस्तर के कारण इन पर समुद्र में समा जाने का खतरा है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/Maxppp/G. Boissy
बविंडी के अभेद्य वन, युगांडा
दुनिया में पाए जाने वाले कुल 880 पहाड़ी गोरिल्ला में से करीब आधे तो युगांडा के इस एक वन में पाए जाते हैं. यहां भी जलवायु परिवर्तन का असर देखने को मिल रहा है, जिससे तापमान बढ़ रहा है और इनका घर खतरे में है. इसके अलावा इन्हें देखने बड़ी संख्या में पहुंचने वाले पर्यटकों के संपर्क में आने से इन्हें इंसानों से संक्रमण लग रहे हैं.
तस्वीर: Rainer Dückerhoff
लेक मालावी नेशनल पार्क, मालावी
समुद्रों के बढ़ते जलस्तर से कई तटीय इलाके संकट में हैं, लेकिन इसके उलट घटते जलस्तर से झील के इकोसिस्टम को खतरा है, जैसे कि लेक मालावी. यहां बढ़ते तापमान के कारण पानी भाप बन कर उड़ रहा है, दिन लंबे होने के कारण बारिश से झील का पानी दोबारा भर नहीं पाता. ऊपर से पर्यटकों की भीड़ भी कृषि और इकोसिस्टम पर बुरा असर डाल रही है.
तस्वीर: DW/Johannes Beck
वाडी रम संरक्षित क्षेत्र, जॉर्डन
संकरी घाटियों, ऊंची चट्टानों और शानदार नजारे वाला करीब 30,000 हेक्टेयर में फैला इलाका. यहां चट्टानों पर 45,000 से भी अधिक नक्काशियां पाई जाती हैं, जो 12,000 साल से भी पुरानी हैं. क्लाइमेट चेंज से यहां का मौसम और भी सूखा और गर्म हो रहा है. पानी की कमी गंभीर हो रही है और रेगिस्तानी इकोसिस्टम पर बोझ बढ़ रहा है.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
रॉक आईलैंड्स, सदर्न लगून, पलाऊ
चूना पत्थर की 400 से भी ज्यादा चट्टानों से मिलकर बनता है यह पैसिफिक पैराडाइस. सुंदर लैगून, कोरल रीफ और प्राचीन गांवों को देखने हर साल 100,000 से अधिक पर्यटक पहुंचते हैं. बढ़ता तापमान और अम्लीय होता पानी कोरल रीफ को ब्लीच कर रहा है और उस पर कार्बोनेट की नई और मजबूत तहें नहीं जम पा रहीं.
तस्वीर: Matt Rand/ The Pew Charitable Trusts
स्टैचू ऑफ लिबर्टी, अमेरिका
दुनिया में यह काफी लंबे समय से आजादी के प्रतीक के तौर पर मशहूर रहा है. इस मशहूर प्रतीक पर भी बढ़ते समुद्र स्तर और तेज होते तूफानों से खतरा है. अमेरिकी तटीय इलाके में 2012 में आए तूफान सैंडी ने लिबर्टी आईलैंड के ढांचे को काफी नुकसान पहुंचाया था. कई लोगों को डर है कि स्टैचू ऑफ लिबर्टी कभी भी नष्ट हो सकता है.
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इलुलिसाट आइसफोर्ड, ग्रीनलैंड, डेनमार्क
दुनिया भर के पर्यटकों में जलवायु परिवर्तन के "ग्राउंड जीरो" यानि बढ़ते तापमान से पिघलते ग्लेशियरों को देखने के लिए ग्रीनलैंड पहुंचने की होड़ दिख रही है. ग्लोबल वॉर्मिंग की प्रक्रिया यहां देखी और सुनी जा सकती है, जब कोई हिमकण कड़कड़ा के टूटता है और पिघलता दिखता है.