भारत दुनिया के उन चंद देशों में शामिल है जिसके उत्तर कोरिया के साथ लंबे समय से नजदीकी रिश्ते रहे हैं. अलग थलग पड़ चुके उत्तर कोरिया के साथ रिश्ते रख कर भारत आखिर क्या हासिल करना चाहता है?
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हाल में भारत के विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने उत्तर कोरिया का दौरा किया और वहां के कई मंत्रियों और उच्चाधिकारियों से मुलाकात की. पिछले 20 वर्षों में भारत के किसी आला अधिकारी का यह पहला उत्तर कोरिया दौरा था. हालांकि दोनों देशों के बीच राजनयिक संपर्क दशकों से रहा है.
राजनीतिक पर्यवेक्षक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ कहते हैं कि वीके सिंह का उत्तर कोरिया दौरा अलग थलग पड़े एक कम्युनिस्ट देश के साथ भारत के रिश्तों को बनाए रखने के प्रयासों का हिस्सा है.
चीन के बाद भारत उत्तर कोरिया का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार है. उत्तर कोरिया के निर्यात में 3.5 प्रतिशत भारत को जाता है जबकि वह भारत से अपने आयात का 3.1 प्रतिशत हिस्सा मंगाता है. इसका मतलब है कि उत्तर कोरिया भारत को 9.7 करोड़ डॉलर का सामान बेचता है और वहां से इतनी ही रकम का सामान खरीदता भी है. अमेरिका के मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी की एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा दिया गया है.
देखिए दुनिया को चौंकाने वाली मुलाकातें
हाथ मिला कर अभिवादन करना एक आम बात है. लेकिन जब दो राजनीतिक धुर विरोधियों के बीच हाथ मिलाया जाता है तो विश्व राजनीति में खलबली मच जाती है. दुनिया नजर गड़ा कर देखती है कि अब क्या होगा. एक नजर ऐसी ही मुलाकातों पर.
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उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया
परमाणु हथियारों और धमकियों के बीच जब उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जेइ इन ने हाथ मिलाकर मुलाकात की तो दुनिया की निगाहें इस पर टिक गई. दोनों देशों के नेताओं के बीच यह मुलाकात 27 अप्रैल 2018 को पनमुनजोम नाम के गांव में हुई. यह गांव उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमा पर स्थित है. यह वही गांव है जहां कोरियाई युद्ध के संघर्षविराम का फैसला लिया गया था.
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इस्राएल और फलीस्तीन
एक दूसरे के कट्टर विरोधी इस्राएल और फलीस्तीन के नेताओं ने साल 1993 में मुलाकात कर ओस्लो समझौते पर दस्तखत किए थे. महीनों चली बातचीत के बाद इस्राएल के तत्कालीन प्रधानमंत्री यित्जाक राबिन और फलीस्तीनी नेता यासिर अराफात के बीच 13 सितंबर 1993 को एक मुलाकात हुई थी. यह मुलाकात अमेरिकी राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस में हुई. और, इसके गवाह बने थे तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन.
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अमेरिका और क्यूबा
एक दूसरे के कट्टर विरोधी रहे अमेरिका और क्यूबा के बीच कड़वहाहट सबसे पहले साल 2013 में कम होती दिखी. नेल्सन मंडेला के अंतिम सस्कार पर पहुंचे क्यूबा के नेता राउल कास्त्रो और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हाथ मिलाया था. साल 2015 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध बहाल किए गए. साल 2016 में ओबामा ने क्यूबा की यात्रा कर इतिहास रच डाला.
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ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड
ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड के बीच भी ऐसा पल आया. साल 2012 में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने आयरलैंड का दौरा किया. साथ ही आइरिश रिपब्लिकन सेना के प्रमुख मार्टिन मैकगुइनेस से मुलाकात कर हाथ मिलाया. दोनों पक्षों के बीच टकराव का लंबा इतिहास रहा है. आयरिश रिपब्लिकन सेना उत्तरी आयरलैंड से ब्रिटिश शासन को खत्म कर आयरलैंड में शामिल होना चाहती थी. लेकिन यह ब्रिटेन में ही रहा.
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चीन और ताइवान
साल 1949 का गृहयुद्ध, और फिर दर्दनाक विभाजन के दशकों बाद चीन और ताइवान के नेता पहली बार साल 2015 में सिंगापुर में मिले. अपनी इस मुलाकात में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ताइवान के राष्ट्रपति मा यिंग-चिओ ने करीब एक मिनट तक हाथ मिलाकर मुस्कराहटें साझा की. लेकिन इस मुलाकात की राजनीतिक कीमत मा यिंग-चिओ को अपने घर में चुकानी पड़ी और साल 2016 में वह चुनाव हार गए.
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नई दिल्ली के एक थिकटैंक ऑब्जर्वर फाउंडेशन के रिसर्च फेलो अभिज्ञान रेज ने डीडब्ल्यू को बताया, "शीत युद्ध के दौर में भारत गुटनिरपेक्ष रहा, उसी की विरासत भारत-उत्तर कोरिया के संबंध हैं. शीत युद्ध खत्म होने के बाद भारत ने उत्तर कोरिया सहित उन देशों के साथ संपर्क रखने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई जिन्हें पश्चिमी दुनिया 'समस्या वाले देश' समझती थी."
कोरियाई प्रायद्वीप में हाल के सालों में तनाव बहुत बढ़ गया है. परमाणु हथियार और बैलेस्टिक मिसाइल बनाने के उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन के इरादों ने क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाई है.
ऐसे में, क्या भारत पश्चिम दुनिया और उत्तर कोरिया के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है? इस पर रेज कहते हैं, "यह अभी साफ नहीं है कि उत्तर कोरिया को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के करीब लाने में भारत क्या भूमिका निभा सकता है. मुझे लगता है कि उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच तनाव कम होने की संभावना को भारत अपने हितों के लिए उत्तर कोरिया के साथ संबंध बढ़ाने के एक अवसर के रूप में देखता है." उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की सिंगापुर में मुलाकात की कोशिशें हो रही हैं.
क्यों रो पड़े उत्तर कोरियाई शासक किम जोंग उन
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भारत सरकार मानती है कि अगर उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जाती है तो उसे इस कम्युनिस्ट देश के साथ रिश्ते मजबूत करने चाहिए. उधर, कुछ विशेषज्ञ उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी वार्ताओं में भारत की भूमिका से इनकार करते हैं.
वैसे भारत अपने प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान के साथ उत्तर कोरिया की परमाणु गतिविधियों को लेकर चिंतित रहा है. पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के जनक अब्दुल कदीर खान ने 2004 में उत्तर कोरिया और ईरान को परमाणु तकनीक बेचने की बात कबूली थी.
वहीं, किसी देश का नाम लिए बगैर उत्तर कोरिया ने वीके सिंह के दौरे के समय जारी एक बयान में कहा, "एक मित्र देश होने के नाते डीपीआरके (डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया) कभी कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा जो भारत की सुरक्षा के लिए चिंता पैदा करे."
कोरिया के बांटने वाली जंग
25 जून 1950 को कोरियाई युद्ध शुरू हुआ. इसमें सोवियत रूस समर्थित उत्तर कोरिया की तरफ से 75000 सैनिक पश्चिम समर्थित दक्षिण कोरिया से भिड़ने चले. जुलाई आते आते अमेरिकी सेना भी दक्षिण कोरिया की ओर से आ गई.
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अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद के खिलाफ
अमेरिकी अधिकारियों के लिए यह अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद के खिलाफ जंग थी. उनके पास इस युद्ध का विकल्प एक ही था रूस और चीन के साथ जंग या फिर कुछ लोग जिसकी चेतावनी देते है यानी तीसरा विश्वयुद्ध. अमेरिका इससे बचना चाहता था.
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50 लाख लोगों की मौत
1953 के जुलाई के अंत में जंग खत्म हुई तो सब मिला कर 50 लाख लोगों की जान जा चुकी थी. इसमें आधे से ज्यादा आम लोग थे. 40 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक कोरिया में मारे गए और 1 लाख से ज्यादा घायल हुए.
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जापानी साम्राज्य का हिस्सा
बीसवीं सदी की शुरुआत से ही कोरिया जापानी साम्राज्य का हिस्सा था. दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद अमेरिका और रूस को यह तय करना था कि दुश्मनों के साम्राज्य का क्या किया जाए. 1945 में अमेरिका के दो अधिकारियों ने इसे 38 वें समानांतर के साथ दो हिस्से में बांटने का फैसला किया.
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38 वां समानांतर
यह वो अक्षांश रेखा है जो पृथ्वी की भूमध्य रेखा से उत्तर में 38 डिग्री पर स्थित है. यह यूरोप, भूमध्यसागर, एशिया, प्रशांत महासागर, उत्तर अमेरिका, और अटलांटिक सागर से होकर गुजरती है. कोरियाई प्रायद्वीप में इसके एक तरफ उत्तर तो दूसरी तरफ दक्षिण कोरिया है.
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रूस और अमेरिका
दशक का अंत होते होते दो राष्ट्र अस्तित्व में आ गए. दक्षिण में साम्यवाद विरोधी नेता सिंगमान री को अमेरिका का थोड़े ना नुकुर के साथ समर्थन मिला तो उत्तर में साम्यवादी नेता किम इल सुंग को रूस का वरदहस्त. दोनों में से कोई अपनी सीमा में खुश नहीं था और सीमा पर छिटपुट संघर्ष लगातार हो रहे थे. जंग शुरू होने के पहले ही दोनों ओर के 10 हजार से ज्यादा सैनिक मारे जा चुके थे.
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कोरिया की जंग और शीत युद्ध
इतना होने पर भी अमेरिकी अधिकारी उत्तर कोरिया के हमले से हतप्रभ थे. उन्हें इस बात की चिंता थी कि यह दो तानाशाहों के बीच सीमा युद्ध ना होकर दुनिया को अपने कब्जे में करने की साम्यावादी मुहिम का पहला कदम है. यही वजह थी कि तब फैसला करने वालों ने हस्तक्षेप नहीं करने जैसे कदमों के बारे में सोचना गवारा नहीं किया. उत्तर कोरिया सोल की तरफ बढ़ा और अमेरिकी सेना साम्यवाद के खिलाफ तैयार होने लगी.
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साम्यवादियों की शुरुआती बढ़त
पहले यह जंग सुरक्षात्मक थी और मित्र देशों पर भारी पड़ी. उत्तर कोरिया की सेना अनुशासित, प्रशिक्षित, और उन्नत हथियारों से लैस थी जबकि री की सेना भयभीत, परेशान और हल्के से उकसावे पर मैदान छोड़ने के लिए तैयार थी. यह कोरियाई प्रायद्वीप के लिए सबसे सूखे और गर्म दिन थे. अमेरिकी सैनिक भी बेहाल थे.
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नई रणनीति
गर्मी खत्म होते होते अमेरिकी सेना के जनरलों ने युद्ध को नई दिशा दी. अब उनके लिए कोरियाई युद्ध का मतलब हमलावर जंग हो गई जिसमें उन्हें उत्तर कोरिया को साम्यवादियों से आजाद कराने का लक्ष्य रखा. शुरुआत में बदली नीति सफल रही और उत्तर कोरियाई सैनिकों को सोल से खदेड़कर 38 वें समानांतर के पार पहुंचा दिया गया.
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चीन का डर और दखल
जैसे ही अमेरिकी सेना सीमा पार कर उत्तर में यालू नदी की ओर बढ़ी चीन को अपनी सुरक्षा का डर सताने लगा और उसने इसे चीन के खिलाफ जंग कह दिया. चीनी नेता माओत्से तुंग ने अपनी सेना उत्तर कोरिया में भेजी और अमेरिका को यालू की सीमा से दूर रहने को कहा.
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चीन से लड़ाई नहीं
अमेरिका राष्ट्रपति ट्रूमैन चीन से सीधा युद्ध नहीं चाहते थे क्योंकि इसका मतलब होता एक और बड़ा युद्ध. अप्रैल 1951 में अमेरिकी सेना के कमांडर को बर्खास्त किया गया और जुलाई 1951 में राष्ट्रपति और नए सैन्य कमांडर ने शांति वार्ता शुरू की. 38 समानांतर पर लड़ाई भी साथ साथ चल रही थी. दोनों पक्ष युद्ध रोकने को तैयार थे लेकिन युद्धबंदियों पर समझौता नहीं हो पा रहा था.
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युद्ध खत्म हुआ
आखिरकार दो साल की बातचीत के बाद 27 जुलाई 1953 को संधि पर दोनों पक्षों के दस्तखत हुए. इसमें युद्धबंदियों को जहां उनकी इच्छा हो रहने की आजादी मिली, नई सीमा रेखा खींची गई जो 38 पैरलल के करीब ही थी और इसमें दक्षिण कोरिया को 1500 वर्गमील का इलाका और मिल गया. इसके साथ ही 2 मील की चौड़ाई वाला एक असैन्य क्षेत्र भी बनाया गया. यह स्थिति आज भी कायम है.
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इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज में उत्तर कोरिया के विशेषज्ञ जगन्नाथ पांडा कहते हैं कि भारत अकेला देश है जो 1990 के दशक से कोरियाई प्रायद्वीप को परमाणु हथियारों से मुक्त करने की मांग उठाता रहा है. भारत उस परमाणु प्रसार नेटवर्क को लेकर भी चिंता जताता रहा है जिसका हिस्सा पाकिस्तान और उत्तर कोरिया रहे हैं.
पांडा कहते हैं, "इस क्षेत्र में भारत के लिए विकल्प सीमित हैं. वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य नहीं है, वह छह पक्षीय कोरियाई वार्ता का हिस्सा नहीं है और कोरियाई विवाद से जुड़े पक्षों दक्षिण कोरिया, चीन, जापान और अमेरिका में से कोई भी भारत की भूमिका के बारे दिलचस्पी नहीं रखता."
लेकिन रेज कहते हैं कि वीके सिंह का उत्तर कोरिया दौरा भारत की तरफ से अंतरराष्ट्रीय समुदाय को इस बात का संकेत है कि वह एशियाई सुरक्षा के ताने बाने में अहम साझीदार है और इसीलिए बड़ी वैश्विक घटनाओं को वह चुपचाप तमाशाई की तरह नहीं देख सकता.
ऐसी है उत्तर कोरिया की राजधानी
उत्तर कोरिया की गिनती दुनिया के सबसे गरीब देशों में होती है. लेकिन इस कम्युनिस्ट देश ने अपनी राजधानी को चकाचक बना रखा है. वहां चौड़ी-चौड़ी सड़कें, गगनचुंबी इमारतें, बड़े बड़े चौक और सब कुछ बहुत व्यवस्थित दिखता है.
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प्योंगयांग की पहचान
ये है प्योंगयांग का मशहूर रयुगयोंग होटल, जिसमें 105 मंजिलें हैं. इसका निर्माण 1987 में शुरू हुआ था और अब तक पूरा नहीं हुआ है. फिर भी, ये प्योंगयांग की बड़ी पहचान बन चुका है.
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शानदार परेड
सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी की कांग्रेस हो या फिर कोई अन्य अहम राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मौका, प्योंगयांग में ऐसी परेड जरूर होती है.
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नदी के किनारे
ताएदोंग नदी प्योंगयांग शहर के बीचों बीच से गुजरती है. 439 किलोमीटर लंबी ताएदोंग उत्तर कोरिया की एक बड़ी नदी है.
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उत्तर कोरिया की संसद
उत्तर कोरिया की संसद को सुप्रीम पीपुल्स असेंबली कहते हैं. 687 सदस्यों वाली इस संसद में सत्ताधारी वर्कर्स पार्टी के 607 सदस्य हैं.
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चीन से दोस्ती का जश्न
ये तस्वीर 2009 की है जब चीन और उत्तर कोरिया के राजनयिक संबंधों की 60वीं वर्षगांठ पर प्योंगयांग में एक रंगारंग कार्यक्रम हुआ था.
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खाली सड़कें
प्योंगयांग में चौड़ी-चौड़ी सड़कें है, लेकिन उन पर वाहन इक्का दुक्का ही दिखाई देते हैं. अपने परमाणु कार्यक्रम के कारण उत्तर कोरिया बरसों से आर्थिक प्रतिबंध झेल रहा है.
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प्रोपेगैंडा
प्योंगयांग में इस तरह के होर्डिंग बहुत आम हैं जिनमें अकसर सत्ताधारी पार्टी की तारीफ लिखी होती है. इस तरह कई होर्डिंगों में पश्चिम विरोधी बातें भी होती हैं.
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ऊंची ऊंची इमारतें
राजधानी में गगनचुंबी इमारतें. लेकिन सहायता एजेंसियों का कहना है कि प्योंगयांग की चमक दमक से परे ग्रामीण इलाकों में लोग बहुत ही दयनीय हालत में रहते हैं.
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नेता का सम्मान
उत्तर कोरिया के संस्थापक किम इल सुंग का यह स्मारक प्योंगयांग के सबसे अहम स्थानों में से एक है. उन्होंने ही 1948 में कम्युनिस्ट देश उत्तर कोरिया की स्थापना की थी.
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प्योंगयांग का मतलब
प्योंगयांग शब्द का अर्थ है समतल भूमि या शांतिपूर्ण भूमि. 32 लाख से ज्यादा की आबादी के साथ यह उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा शहर है.
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प्योंगयांग एयपोर्ट
प्योंगयांग के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर ज्यादा हलचल नहीं रहती. यहां सरकारी एयरलाइन एयर कोरयो के अलावा सिर्फ एयर चाइना के विमान आते हैं.
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ताकत का प्रदर्शन
उत्तर कोरिया में होने वाली सैन्य परेडों की तस्वीरें दुनिया भर के मीडिया में जगह बनाती हैं. गरीबी और भुखमरी के लिए आलोचना झेलनी वाली सरकार ताकत पेश करने में कोई कसर नहीं छोड़ती.