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भारत में नागरिकता का प्रमाण है क्या?

चारु कार्तिकेय
१९ फ़रवरी २०२०

असम में अदालत के सामने 15 दस्तावेज दिखाने के बाद भी एक महिला अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाई. ऐसे मामले नागरिकता पर जारी बहस के बीच लोगों की चिंताओं को बढ़ा रहे हैं.

Indien Protest von muslimischen Frauen
तस्वीर: DW/A. Ansari

असम की जुबैदा बेगम के साथ जो हुआ है उससे भारत में नागरिकता के प्रमाणन को लेकर कई सवाल उड़ खड़े होते हैं. 50 वर्षीय जुबैदा को असम के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने पहले ही विदेशी घोषित कर दिया था. अब वह गुवाहाटी हाई कोर्ट में भी इस फैसले के खिलाफ मुकदमा हार गई हैं. हाई कोर्ट का कहना था कि जुबैदा एक भी ऐसा दस्तावेज पेश नहीं कर पाईं, जो उन्हें भारतीय नागरिक साबित कर सके. 

वहीं जुबैदा ने एक नहीं बल्कि 15 अलग अलग कागजात अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए थे. इनमें पैन कार्ड, राशन कार्ड, बैंक पासबुक, भू-राजस्व भुगतान की रसीद, मतदाता सूची में उनके, उनके माता-पिता के और उनके भाई-बहनों के नाम शामिल थे. इसके अलावा उन्होंने गांव के मुखिया के प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत किए, जिन्हें आम तौर पर पहचान के प्रमाण के तौर पर मान लिया जाता है.

लेकिन अदालत ने कहा कि जुबैदा जिन व्यक्तियों की बेटी और बहन होने का दावा कर रही हैं, वह उनसे अपना रिश्ता साबित नहीं कर पाईं.

तस्वीर: picture-alliance/AP Photo/A. Nath

जुबैदा अब इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे पाएंगी या नहीं, ये स्पष्ट नहीं है क्योंकि वे बेहद गरीब हैं और आगे की कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए संसाधन जुटाने की उनमें हिम्मत नहीं है. उन्होंने एक टीवी चैनल को बताया कि उनके पति लंबे समय से बीमार हैं और वह ही घर चलाती हैं. उन्हें सबसे ज्यादा चिंता अपनी बेटी की है जो पांचवीं कक्षा में पढ़ती है. जुबैदा अभी से ऐसे हाल में पहुंच चुकी हैं कि कभी कभी उनकी बेटी को रात को खाली पेट ही सो जाना पड़ता है.

जुबैदा के मामले से पता चलता है कि भारत में नागरिकता साबित करने का एक बड़ा अभियान शुरू तो हो गया है लेकिन इसे साबित करने की पुख्ता व्यवस्था अब भी नहीं है. असम में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद अगस्त 2019 में जब नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस (एनआरसी) में शामिल किए जाने के योग्य लोगों के नामों की घोषणा हुई तो पाया गया कि कम से कम 19 लाख लोगों के नाम उसमें नहीं थे.

मीडिया में आई एक और खबर के अनुसार जिस दिन हाई कोर्ट ने जुबैदा की चुनौती खारिज की, उसी दिन मुनींद्र बिस्वास नामक व्यक्ति की भी ऐसी ही याचिका खारिज करते हुए अदालत ने कहा कि चुनाव पहचान पत्र भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है.

तस्वीर: Reuters

नागरिकता को लेकर जारी बहस से पश्चिम बंगाल और देश के और भी कुछ हिस्सों में घबराहट का माहौल बन चुका है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनावी सभाओं के साथ साथ लोकसभा में कहा था कि एनआरसी पूरे देश में लागू होगी. लेकिन नागरिकता का पुख्ता प्रमाण क्या होगा, इसकी जानकारी कहीं पर भी उपलब्ध नहीं है. इस वजह से लोग आनन फानन अपने और अपने परिवार से जुड़े जितने किस्म के प्रमाण पत्र हो सकते हैं, उन्हें ढूंढ़ने, बनवाने और सहेज कर रखने में व्यस्त हो गए हैं. डर ये है कि कहीं अगर वाकई एनआरसी पूरे देश में लागू हो गई तो कैसे खुद को उस से बाहर होने से बचाया जाए.

कुछ विशेषज्ञों का कहना है जुबैदा के मामले में हाई कोर्ट का फैसला तकनीकी रूप से सही है. उनका कहना है कि एनआरसी में शामिल होने के लिए वो दस्तावेज प्रस्तुत करने होते हैं जो यह साबित कर सकें कि सम्बंधित व्यक्ति या उसके पूर्वज असम में 1971 से पहले से रह रहे हैं. इन कागजात की दो तरह की सूची है. लिस्ट ए और लिस्ट बी. लिस्ट ए में उन कागजात की सूची है जो साबित कर सकते हैं कि व्यक्ति या उसके पूर्वज 1971 से पहले से असम में रह रहे हैं. 1971 के बाद पैदा हुए व्यक्ति को लिस्ट बी में बताए हुए कागजात प्रस्तुत करने हैं जिनकी मदद से वे अपना और 1971 से पहले से रह रहे पूर्वज का संबंध दिखा सकें. इनमें शामिल हैं पैन कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र इत्यादि जिनमें व्यक्ति का और उनके पूर्वज का नाम हो. 

तस्वीर: Getty Images/AFP/B. Boro

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ये शर्तें पूरी नहीं होती हैं, तो व्यक्ति को विदेशी घोषित किया जा सकता है और यही जुबैदा के साथ हुआ है. लेकिन कुछ लोगों की राय यह भी है कि ये तकनीकी आधार विशेष समुदायों के लोगों के खिलाफ भेदभाव करने के और उन्हें निशाना बनाने के बहाने हैं. सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील अब्दुल मोबीन कहते हैं कि जुबैदा के मामले में जब उनके भाई को नागरिक मान लिया है तो उन्हें भी क्यों नहीं माना जा सकता? मोबिन कहते हैं कि ये फैसला पक्षपात से प्रभावित है.

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