वैज्ञानिकों ने मलेरिया के खिलाफ जंग में उतारने के लिए अपने नए हथियार का एलान कर दिया है. जीवविज्ञानियों ने मलेरिया फैलाने वाले मच्छर में ही कुछ ऐसे बदलाव किए हैं कि बीमारी को फैलने से रोका जा सके.
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विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल दुनिया भर में मलेरिया से छह लाख से भी ज्यादा लोगों की जान चली जाती है. शोधकर्ताओं ने मलेरिया फैलाने वाले मच्छर पर जेनेटिक इंजीनियरिंग की तकनीक का इस्तेमाल कर उनकी आनुवंशिक संरचना को इस तरह बदल दिया है कि वे ज्यादातर नर मच्छरों को ही जन्म दें. मादाओं की कमी होते होते आगे चलकर एक स्थिति ऐसी आती है कि उनकी पूरी की पूरी आबादी ही मिट जाए.
नेचर कम्यूनिकेशंस नाम के जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बताया है कि इस तरह मच्छरों में लिंग का चुनाव करने की तकनीक से मच्छरों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार होती है जिसमें 95 फीसदी मच्छर नर होते हैं. आम तौर पर सामान्य आबादी में अगर प्राकृतिक चुनाव हो तो नर और मादा जनसंख्या की संभावना 50 फीसदी यानि आधी आधी होती है. इस तरह कृत्रिम तरीके से तैयार हुई मच्छरों की पूरी पीढ़ी में इतनी कम मादाओं के होने के कारण पूरी की पूरी आबादी लुप्त होने की तरफ बढ़ चलती है और इससे इंसानों में मलेरिया फैलने का खतरा कम हो जाता है. मादा मच्छर ही इंसान का खून चूसते समय मलेरिया के परजीवी को इंसानों में छोड़ती जाती है.
इस शोध का नेतृत्व करने वाली इंपीरियल कॉलेज लंदन में प्रोफेसर आंद्रिया क्रिसैंटी बताती हैं, "मलेरिया हमें कमजोर बना रहा है और अक्सर जानलेवा भी साबित होता है. हमें इससे निपटने के नए नए तरीके ढूंढने की सख्त जरूरत है." क्रिसैंटी आगे कहती हैं, "पहली बार ऐसा कुछ हुआ है कि हम लैब में मादा संतानों के जन्म को रोक पाए हैं और इस तरह हमें इस बीमारी को मिटाने का नया तरीका मिला है."
मलेरिया के कीटाणु को फैलाने वाले सबसे खतरनाक एनोफिलीज मच्छर पर असर करने वाले ऐसे किसी तरीके को ढूंढने के लिए पिछले छह सालों से काम चल रहा है. इसमें वैज्ञानिक नर मच्छर के जीन में एक खास एन्जाइम डीएनए के टुकड़े को इन्जेक्ट करते हैं. इससे वयस्क होने पर जब मच्छर प्रजनन की प्रक्रिया में जुड़ता है तब उसके वीर्य में मादा संतान के जन्म के लिए जरूरी एक्स क्रोमोजोम नहीं होते. नतीजा यह होता है कि नई पीढ़ी में ज्यादातर नर ही होते हैं. ऐसा पीढ़ी दर पीढ़ी होता रहता है कि जीएम नर मच्छर अगली पीढ़ी में भी जीएम नर ही पैदा करते हैं.
एक अनुमान के मुताबिक हर साल दुनिया में 10 लाख लोगों की मौत मलेरिया के कारण होती है. कंपकपी के साथ तेज बुखार मलेरिया के संकेत हैं. इस बीमारी के कारण बच्चों की मौत की संभावना सबसे अधिक होती है.
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मच्छर से मलेरिया
अफ्रीका का सबसे खतरनाक जीव सिर्फ 6 मिलीमीटर लंबा है. इसे मादा एनोफेलीज मच्छर के नाम से जाना जाता है. यह संक्रामक रोग मलेरिया के लिए जिम्मेदार है. एक अनुमान के मुताबिक हर साल दुनिया में 10 लाख लोगों की मौत मलेरिया के कारण होती है. कंपकपी के साथ तेज बुखार मलेरिया के संकेत हैं. इस बीमारी के कारण बच्चों की मौत की संभावना सबसे अधिक होती है.
मलेरिया पीड़ित को अगर मच्छर काट ले तो वह मलेरिया के विषाणु को औरों तक फैला देता है. शोधकर्ताओं ने इस मच्छर में विषाणु को प्रोटीन से चिह्नित किया है जो हरे रंग में चमकता है. लार ग्रंथि में जाने से पहले मच्छर की आंत में पैरासाइट प्रजनन करता है.
मलेरिया पैरासाइट का जैविक नाम प्लाज्मोडियम है. बीमारी की शोध के लिए वैज्ञानिकों ने एनोफेलीज मच्छरों को संक्रमित किया और उसके बाद पैरासाइट को लार ग्रंथि से अलग किया. इसमें पैरासाइट का संक्रामक रूप जमा है. इस तस्वीर में दाहिनी तरफ मच्छर है और बीच में है हटाई गई लार ग्रंथि.
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विषाणु चक्र
मलेरिया पैरासाइट घुमावदार होते हैं, वो एक दायरे में घुमते हैं. यहां शोधकर्ताओं ने उन्हें तरल पदार्थ के साथ शीशे के टुकड़े पर रखा. पैरासाइट को यहां पीले रंग से चिह्नित किया गया है. और जिस पथ पर घूमते हैं उसे नीले रंग से पहचाना जा सकता है. वो तेजी से चलते हैं. एक पूरा चक्कर लगाने के लिए सिर्फ 30 सेकेंड लेते हैं. बाधा पहुंचने पर वे अपने घुमावदार पथ से हट जाते हैं. सीधी रेखा पर भी चल सकते हैं.
इंसान के शरीर में दाखिल होने के बाद विषाणु मनुष्य के लीवर में कुछ दिनों के लिए ठहर जाता है. इस दौरान मरीज को पता नहीं चलता. प्लाज्मोडियम मरीज की लाल रक्त कणिकाओं को तेजी से प्रभावित करता है, और लीवर में इस परजीवी की संख्या तेजी से बढ़ती चली जाती है. लीवर में यह मेरोजोइटस का रूप लेता है, जिसके बाद रक्त कोशिकाओं पर हमला शुरू हो जाता है और इंसान बीमार महसूस करने लगता है.
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शरीर में बढ़ता पैरासाइट
रक्त कोशिका में दाखिल होने के बाद पैरासाइट एक से तीन दिन के भीतर बढ़ने लगता है. इसके बाद वे लाल रक्त कणिका या लीवर कोशिका में प्रवेश कर जाता है. यहां परजीवी का विखंडन होता है. परजीवियों की संख्या बढ़ने पर कोशिका फट जाती है. नतीजतन इंसान को ठंड के साथ बुखार आने लगता है. माइक्रोस्कोप में इसे आसानी के साथ देखा जा सकता है. बैंगनी रंग का यह रोगाणु अलग नजर आ रहा है.
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मच्छरदानी में मौत
शोधकर्ताओं ने एक ऐसी मच्छरदानी बनाई है जिसमें जाल में कीटनाशक लगे हुए हैं. मच्छरदानी के संपर्क में आते ही मच्छर मर जाते हैं.
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दवा का छिड़काव
जब मलेरिया का प्रकोप हद से ज्यादा बढ़ जाता है तो उसके लिए दूसरे उपाए किए जाते हैं. मुंबई की इस तस्वीर में मच्छरों को मारने के लिए दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है. डीडीटी कीटनाशक का इस्तेमाल प्रभावशाली होता है. हालांकि यह स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक होता है.
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रैपिड टेस्ट
खून की एक बूंद से किया गया रैपिड टेस्ट मिनटों में बता सकता है कि मरीज को मलेरिया है या नहीं. यहां डॉक्टर विदआउट बॉर्डर की एक कार्यकर्ता, अफ्रीकी देश माली में लड़के पर रैपिड टेस्ट कर रही हैं. इस लड़के में मलेरिया की पुष्टि हुई. उपचार के दो दिन बाद वह स्वस्थ हो गया. हालांकि रैपिड टेस्ट हमेशा भरोसेमंद नहीं होते.
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दवा बेअसर
दवाइयों की मदद से रक्त में मौजूद विषाणु को खत्म या फिर बढ़ने से रोका जा सकता है. हालांकि दवाओं का असर पैरासाइट पर कम होता जा रहा है. लंबे समय से इस्तेमाल की जा रही मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन अब कुछ इलाकों में प्रभावशाली नहीं है. नई दवाओं की खोज मलेरिया की प्रतिरोधक क्षमता की समस्या से निपटने का एक रास्ता है.
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कब आएगा टीका
मलेरिया के लिए अब तक कोई टीका नहीं है. शोधकर्ता टीका बनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. रिपोर्टों के मुताबिक इस मामले में सफलता जल्द मिल सकती है.
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क्रिसैंटी के सहयोगी रॉबर्टो गालिजी कहते हैं, "रिसर्च की अभी सिर्फ शुरुआत है लेकिन मुझे बहुत उम्मीद है कि इस नए तरीके से मलेरिया को हर जगह से मिटाने का एक सस्ता और असरदार तरीका मिलेगा." कुछ पर्यावरणविद इस तरीके का विरोध कर रहे हैं. उनका तर्क है कि इस तरह के कृत्रिम तरीकों से प्रकृति में जैव विविधता का संतुलन बिगड़ेगा. उन्हें डर है कि अगर किसी जगह मच्छर की किसी एक प्रजाति को मिटा दिया जाता है तो उनकी जगह आस पास से आई हुई कोई दूसरी, पहले से भी खतरनाक प्रजाति ले सकती है.