नरेंद्र मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं पाकिस्तान के साथ रिश्तों को संवारने की कोशिशों में लगे हुए हैं. लेकिन उन्हें लगातार मुंह की खानी पड़ी है. पठानकोट पर पाकिस्तान का ताजा रुख एक और बड़ी शिकस्त है.
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जब देश के शीर्षस्थ विधिवेत्ता फाली एस नरीमान ने राष्ट्रपति भवन में बोलते हुए यह याद दिलाया कि लोकतंत्र में एक व्यक्ति के हाथ में कार्यपालिका की सारी शक्तियां केंद्रित नहीं होनी चाहिएं, तो सुनने वाले समझ गए कि उनका इशारा किस तरफ है. जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब वे अफसरों के साथ सीधा संपर्क कायम किए रहते थे और सभी विभागों में फैसले उनकी राय से ही लिए जाते थे. मंत्रियों की भूमिका गौण हो गई थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने अपनी कार्यशैली में कोई बदलाव नहीं किया. लेकिन भारत सरकार की घरेलू और विदेश नीति को केवल एक व्यक्ति द्वारा चला सकना संभव नहीं है, और यह बात उन्हें अब तक समझ में नहीं आई है.
मोदी के नाकाम प्रयास
नरेंद्र मोदी ने सोचा कि यदि विदेशी नेताओं के साथ दोस्ती और आत्मीयता के अनौपचारिक संबंध स्थापित कर लिए जाएं, तो इससे भारत और उनके देशों के बीच संबंध भी अच्छे हो जाएंगे. प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्हें विदेश नीति का कोई अनुभव नहीं था. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को 'बराक' कहकर अपनी बेतकल्लुफी जाहिर की (और इसके लिए देश-विदेश में उनका मखौल भी उड़ाया गया), चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ साबरमती के तट पर झूले में पींगे बढ़ाईं और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पोती की शादी में अचानक बिन बुलाए पहुंच कर परिवार के सदस्य जैसी घनिष्ठता दर्शायी. लेकिन इस सब का असर कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि राष्ट्रों के संबंध उनके हितों पर आधारित होते हैं, नेताओं के बीच दोस्ती पर नहीं. यही कारण है कि भारत की विदेश नीति इस समय जितने बुरे हाल में है, वैसे हाल में वह कभी नहीं रही.
दोस्ती की बांह पर आतंकियों के हमले
भारत और पाकिस्तान के बीच जब भी शांति वार्ता की कोशिशें होती हैं, तभी कुछ ऐसा होता है कि माहौल बिगड़ जाता है. एक नजर उन घटनाओं पर जिन्होंने दोनों देशों को बार बार बातचीत की मेज से युद्ध के उन्माद तक पहुंचाया.
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कारगिल युद्ध
अटल बिहारी वाजपेयी और नवाज शरीफ की अगुवाई में भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती नए मुकाम पर थी. बसें चल रही थीं, आम लोग आसानी से इधर उधर आ रहे थे. तभी मई 1999 में भारत प्रशासित कश्मीर की चोटियों पर पाकिस्तानी सैनिकों का कब्जा हुआ. इसके बाद नवाज शरीफ का तख्तापलट हुआ और कारगिल के मास्टरमाइंड जनरल परवेज मुशर्रफ सत्ता में आए.
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आगरा सम्मेलन
जून 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी और तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ की आगरा में शिखर बैठक हुई. माना जाता है कि दोनों नेता कश्मीर विवाद को हल करने के काफी करीब पहुंच चुके थे. लेकिन तभी कुछ ऐसा हुआ कि एक झटके में सारी वार्ता विफल हो गई. इसे ऐतिहासिक चूक कहा जा सकता है.
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संसद पर हमला
13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर आतंकवादी हमला हुआ. हमले में छह पुलिसकर्मी, दो सुरक्षाकर्मी, एक बागवान और पांच आतंकवादी मारे गए. इस हमले के बाद भारतीय सेनाएं पाकिस्तान सीमा पर तैनात कर दी गई. पहली बार गणतंत्र दिवस की परेड रोक दी गई. अमेरिका के दखल से युद्ध टला.
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समझौता एक्सप्रेस
भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की प्रतीक बनी रेल सेवा भी आतंकवादी हमले का शिकार बनी. फरवरी 2007 में दिल्ली से लाहौर जा रही समझौता एक्सप्रेस ट्रेन की दो बोगियों में धमाके हुए. 68 लोगों की मौत हुई. पाकिस्तान का आरोप है कि धमाके हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों ने किए.
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हमलों की बाढ़
2008 में भारत के कई शहरों में आतंकवादी हमलों की बाढ़ सी आई. रामपुर, जयपुर, अहमदाबाद, बेंगलुरू, दिल्ली और पूर्वोत्तर भारत में कई हमले हुए. तत्कालीन यूपीए सरकार लाचार सी दिखने लगी. भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव उपजने लगा.
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मुंबई हमले
और 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले ने नई दिल्ली के सब्र का बांध तोड़ दिया. विदेशी एजेंसियों की मदद से बहुत जल्दी यह साफ हो गया कि आतंकी हमले के दौरान कराची से निर्देश ले रहे हैं. तब से अब तक नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच शांति वार्ता पुराने रूप में बहाल नहीं हो सकी है.
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पास आकर दूर हुए
नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के बीच एक बार शांति वार्ता की कोशिशें शुरू हुई. शुरुआत सकारात्मक हुई लेकिन कश्मीरी अलगाववादियों से पाकिस्तानी उच्चायुक्त की मुलाकात के बाद वार्ता की कोशिशें फीकी पड़ने लगी. जम्मू कश्मीर में सरहद पर दोनों देशों के बीच समय समय पर गोली बारी होने लगी.
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गुरदासपुर और ऊधमपुर हमला
जुलाई 2015 में पंजाब के गुरुदासपुर में हुए आतंकवादी हमले और उसके हफ्ते भर बाद जम्मू के ऊधमपुर में भारतीय सुरक्षाबलों पर हमले हुए. हमलों में आतंकवादियों से ज्यादा सुरक्षाबल के जवान मारे गए. इन हमलों का असर भारत और पाकिस्तान के बीच भविष्य में होने वाली बातचीत पर पड़ना तय है.
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बारूद का ढेर
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल इस्लामाबाद जाकर पाकिस्तानी अधिकारियों से मिलने वाले हैं. भारत का मानना है कि पाकिस्तान भारत पर हमलों के लिए आतंकवादियों का इस्तेमाल कर रहा है. भारतीय मीडिया के मुताबिक पाकिस्तान भारत के सब्र का इम्तिहान ले रहा है.
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अमेरिका उच्च तकनीकी के हस्तांतरण के लिए कठिन शर्तें रखता रहा है और अभी भी वह कोई ढील देने को तैयार नहीं है. चीन ने एक बार फिर पाकिस्तान-स्थित आतंकवादी सरगना मसूद अजहर के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने को वीटो कर दिया है. और अब पाकिस्तान ने घोषणा कर दी है कि वह भारत के साथ कोई संवाद नहीं चाहता.
वादे के भरोसे बैठा भारत
प्रधानमंत्री बनने के पहले नरेंद्र मोदी पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देने की बात किया करते थे. लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसके ठीक उल्टा रवैया अपनाया. अपने शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को बुलाया, पठानकोट में वायुसेना के अति संवेदनशील ठिकाने पर आतंकवादी हमला हो जाने के बाद भी पाकिस्तान के जांच दल को वहां जाने की अनुमति दी जबकि उस दल में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का एक अफसर भी शामिल था.
इस अभूतपूर्व छूट के बावजूद पाकिस्तान ने भारतीय जांच दल को अपने यहां आने की अनुमति देने से साफ इंकार कर दिया. और पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने तो यह कह कर जले पर नमक ही छिड़क दिया कि भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद स्थगित है और विदेश सचिव स्तर की वार्ता नहीं होने जा रही. जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि पाकिस्तान ने वार्ता जारी रखने का वादा किया था और वह होनी चाहिए. यानि अब हालत यह हो गई है कि पहले जहां पाकिस्तान वार्ता के लिए अनुनय-विनय किया करता था, वहीं अब भारत उससे बातचीत जारी रखने की भीख मांग रहा है. विदेश नीति की विफलता का इससे बड़ा सुबूत और क्या हो सकता है?
लप्पी-झप्पी से कोई फायदा नहीं
पाकिस्तान के अंदरूनी घटनाक्रम और भारत के प्रति उसके ताजा रवैये से पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि अब वहां निर्वाचित सरकार का शासन केवल एक आवरण है जिसके पीछे बैठकर सेना ही सत्ता के सारे सूत्रों को संचालित कर रही है. शरीफ खानदान की इच्छा के विरुद्ध पंजाब में कुछ आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सेना का अभियान और भारत के प्रति बदली नीति इसका ताजातरीन प्रमाण है.
चीनी योद्धाओं के बीच प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐतिहासिक यात्रा पर चीन पहुंचे हैं. मोदी की चीन यात्रा को दुनिया की प्रमुख आर्थिक सत्ता बनने की कोशिश कर रहे दोनों देशों के बीच नए संबंधों की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है.
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परंपरागत स्वागत
शियान हवाई अड्डे पर परंपरागत ड्रैगन लोक नृत्य के साथ मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया गया. हवाई अड्डे और रास्ते में हिन्दी में भारत और चीन के बीच दोस्ताना संबंधों वाले बैनर लगे थे. "हिन्दी चीनी बहती नदी की अटूट धारा", "हिन्दी चीनी दोस्ती सदियों पुरानी" जैसे नारे प्रधानमंत्री के स्वागत में लिखे गए.
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मोदी मोदी के नारे
मोदी हवाई अड्डे से सीधे शंगरीला होटल के लिए रवाना हुए. होटल तक के मार्ग पर सड़कों के दोनों ओर खड़े लोगों ने हाथ हिलाकर मोदी का अभिवादन किया. कई लोगों ने सड़कों पर मोदी मोदी के नारे भी लगाए.
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मूर्तियों के बीच मोदी
मोदी शियान शहर के विश्व सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल युद्ध स्मारक वॉरियर्स म्यूजियम देखने गए. यहां चीनी सम्राट हुयांग की सेना के शहीद जवानों की याद में मिट्टी की हजारों मूर्तियां कतारबद्ध तरीके से रखी हुई हैं.
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बीजिंग नहीं शियान
शियान राष्ट्रपति शी जिनपिंग का गृहनगर है. यह शहर चीन की चार प्रमुख प्राचीन राजधानियों में से एक रहा है. शियान में एक दिन के प्रवास के दौरान मोदी चीनी राष्ट्रपति के साथ शिखर बैठक करेंगे. यह चीन में पहली बार किसी देश के प्रमुख के साथ चीनी राष्ट्रपति की राजधानी बीजिंग के बाहर बैठक है.
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पहला चीन दौरा
प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी का यह पहला चीन दौरा है. गत वर्ष भारत यात्रा पर आए चीनी राष्ट्रपति ने मोदी को अपने देश आने का न्योता दिया था. उनके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, विदेश सचिव एस जयशंकर और वरिष्ठ अधिकारी भी इस दौरे पर गए हैं.
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बौद्ध मंदिर के दर्शन
प्रधानमंत्री मोदी शियान के प्राचीन दा शिंग शान बौद्ध मंदिर के दर्शन करने भी गए. उनके होटल से लेकर इस मंदिर तक चप्पे चप्पे पर शहर के लोग उनकी एक झलक पाने को आतुर खड़े दिखे.
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लोगों से रूबरू
मंदिर में दर्शन के बाद प्रधानमंत्री की कारों का काफिला अचानक एक चौराहे पर रुक गया और चीनी पुलिस में अफरातफरी मच गई क्योंकि इस बीच मोदी अपनी कार से उतरकर भीड़ की ओर बढ़ चले.
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सुरक्षा का घेरा
मोदी ने भीड़ में लोगों से हाथ भी मिलाया और मोबाइल पर लोगों को तस्वीरें खींचने का मौका भी दिया. मोदी सुरक्षा और भीड़ की परवाह किए बिना लोगों से रूबरू हो रहे थे. भीड़ को देखते हुए चीनी पुलिस ने उनके चारों ओर एक मानवीय घेरा बना दिया ताकि सरकारी मेहमान की सुरक्षा को किसी तरह का जोखिम पैदा न हो.
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पाकिस्तानी मामलों की अमेरिकी विशेषज्ञ क्रिस्टीन सी फेयर का निष्कर्ष है कि यदि कश्मीर भी पाकिस्तान को मिल जाए, तब भी भारत के प्रति पाकिस्तानी सेना का शत्रुता भाव कम नहीं होने वाला और दोनों देशों के बीच संबंध सुधरने नहीं वाले. युद्धों में लगातार हारने का भी उस पर कोई असर नहीं होगा क्योंकि पाकिस्तानी सेना केवल तभी हार मानेगी जब वह युद्ध करने के कतई काबिल नहीं रहेगी. जब तक ऐसी स्थिति नहीं आती, वह भारत के खिलाफ 'जिहाद' के नाम पर आतंकवाद का इस्तेमाल करती रहेगी.
अभी भी वक्त है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस हकीकत को समझें कि देशों के बीच संबंध आपसी हितों की पूर्ति और लेन-देन के आधार पर बनते-बिगड़ते हैं. 2001 के बाद से भारत-पाक संबंधों में कोई खास सुधार नहीं आया है. न व्यापार बढ़ा है और न ही सियाचिन पर ही कोई सहमति बन पायी है. स्पष्ट है कि लप्पी-झप्पी के आधार पर कूटनीति को नहीं चलाया जा सकता. पाकिस्तान के ताजा रुख से उन्हें यह समझने में मदद मिल सकती है.