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युद्ध की जो मार आज यूरोप पर पड़ी है उससे कब तक बचेगा रूस

१८ जुलाई २०२२

यूक्रेन में रूसी युद्ध की आंच पूरा यूरोप झेल रहा है. महंगाई, यूरो की घटती कीमत, ऊर्जा संकट और भोजन की कमी का असर इन देशों में साफ महसूस हो रहा है. रूस इन संकटों से कब तक बचा रहेगा?

तेल और गैस के लिए यूरोप रूस पर बहुत ज्यादा निर्भर है
तेल और गैस के लिए यूरोप रूस पर बहुत ज्यादा निर्भर हैतस्वीर: Christoph Hardt/Panama Pictures/picture alliance

पूरे यूरोप में हताशा के संकेत बढ़ते जा रहे हैं. इटली के फूड बैंक में ज्यादा लोग खाना लेने पहुंच रहे हैं. नेचुरल गैस का कोटा तय कर रहे और कोयले के संयंत्र को दोबारा चालू करा रहे जर्मन अधिकारियों को अपना एयरकंडीशनर बंद करना पड़ रहा है. एक बड़ी सार्वजनिक सेवा टैक्स देने वालों के लिए बेलआउट की मांग कर रही है. डेयरियां सोच में डूबी हैं कि वो अपना दूध कैसे पाश्चुराइज करेंगी. डॉलर के मुकाबले यूरो बीते 20 सालों के सबसे निचले स्तर पर चला गया है और मंदी की भविष्यवाणियां तेज हो गई हैं.

दबाव के ये बिंदु बता रहे हैं कि कैसे रूसी सरकार यूरोप में उद्योग को ऊर्जा देने वाली गैस को रोक कर यहां ऊर्जा संकट के लिए रास्ता बना रही है. इसके नतीजे में कोविड-19 की महामारी से उबरती अर्थव्यवस्था के फिर मंदी में डूबने के प्रबल आसार बन रहे हैं. 

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इस बीच युद्ध के कारण बढ़ी ऊर्जा की कीमतें रूस को फायदा पहुंचा रही हैं. तेल और गैस का एक प्रमुख निर्यातक देश का सेंट्रल बैंक प्रतिबंधों के बीच भी सालों काम करने का अनुभव रखता है. उसने ना सिर्फ रूबल को स्थिर कर दिया है कि बल्कि आर्थिक अलगाव के बावजूद महंगाई को भी नियंत्रित करने में सफलता पाई है.

हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि लंबे दौर में रूस पूरी तरह से टूटने से बचने की कोशिश में युद्ध की बड़ी कीमत चुकायेगा. आर्थिक ठहराव गहरा होगा, निवेश खत्म होंगे और लोगों की आय कम होगी.

यूरो की कीमत 20 साल के सबसे निचले स्तर पर हैतस्वीर: BARBARA GINDL/APA/picturedesk.com/picture alliance

महंगाई और ऊर्जा संकट

कम समय के लिए जो यूरोप के सामने चुनौतियां हैं उनमें सबसे बड़ी है महंगाई और ऊर्जा की घटती सप्लाई में फंसे बगैर सर्दियों का सामना करना. यूरोप रूसी गैस पर बहुत ज्यादा निर्भर है और ऊंची कीमतें की आंच फैक्ट्रियों, खाने के खर्चों और ईंधन के टैंकों तक सबसे ज्यादा पहुंच रही है. 

ज्यादा ईंधन का इस्तेमाल करने वाले स्टील, कृषि जैसे उद्योगों में अनिश्चितता है. अगर संकट बढ़ता है घरों की ऊर्जा बचाने के लिए इन फैक्ट्रियों में ऊर्जा का कोटा तय किया जा सकता है.

जर्मन शहर म्यूनिख के पास पीडिंग में मोल्केराई बेर्षटेसगाडनर लैंड एक विशाल सामुदायिक डेयरी है. इसने 2 लाख लीटर ईंधन जमा कर के रखा है जिससे कि दूध को पाश्चुराइज करने और उसे ठंडा करने के लिए बिजली और गैस की सप्लाई नहीं रहने पर भी जेनरेटर के जरिये ऊर्जा मिलती रहे.

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इस सामुदायिक डेयरी के करीब 1800 किसान सदस्य हैं जिनकी 50,000 गायें हर दिन 10 लाख लीटर दूध पैदा करती हैं. डेयरी की गायों का दूध हर दिन निकाला जाता है और अगर बिजली नहीं रही तो लाखों लीटर दूध को सुरक्षित रखने का कोई जरिया नहीं होगा. डेयरी के प्रबंध निदेशक बर्नहार्ड पॉइंटनर ने कहा, "अगर डेयरी काम नहीं करेगी तो किसान भी नहीं कर पायेंगे. किसानों को दूध फेंकना पड़ेगा." यह डेयरी एक घंटे में जितनी बिजली खर्च करती है उससे एक घर को एक साल तक ऊर्जा दी जा सकती है. डेयरी ने ना सिर्फ ईंधन बल्कि पैकिंग में काम आने वाले सामान का भी भंडार जुटा रखा है जिससे कि ऊर्जा की सप्लाई में कमी से बेअसर रख सके. हालांकि उनका यह भी कहना है, "हमने बहुत जमा कर रखा है...लेकिन यह सिर्फ कुछ हफ्तों में ही खत्म हो जायेगा."

यूरोपीय देशों में खाने पीने की चीजों के दाम बढ़ गये हैंतस्वीर: Abdulhamid Hosbas/AA/picture alliance

भोजन की मुश्किल

आर्थिक दिक्कतें खाने की मेज तक पहुंच रही हैं. ग्राहकों के समूह ने आकलन किया है कि एक आम इटैलियन परिवार को इस साल अपने खाने पर 681 यूरो ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ रही है. लॉम्बार्डी के फूड बैंक के अध्यक्ष दारियो बोगियो मार्जेट का कहना है, "मौजूदा स्थिति को लेकर हम सचमुच चिंता में हैं क्योंकि हमसे सहयोग लेने वाले परिवारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है." यह फूड बैंक दर्जनों समाजसेवी संगठनों का समूह है जो कई जगहों पर सूप किचेन चलाते हैं जहां जरूरतमंद लोगों को खाना दिया जाता है. इस साल इनके खर्चे में हर महीने 5000 यूरो से ज्यादा की बढ़ोत्तरी हुई है.

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पेरिस के एक उपनगर में रहने वाली अकेली मां जेसिका लोबली राशन की बढ़ती कीमतों पर बारीकी से नजर रख रही हैं. उन्होंने दूध, दही का इस्तेमाल कम कर दिया है जबकि न्यूटेला और ब्रैंडेड कुकीज खाना छोड़ दिया है. एक स्कूल किचेन में काम करके हर महीने 1300 से 2000 यूरो प्रति महीने कमाने वाली लोबली कहती हैं, "स्थिति और बिगड़ेगी लेकिन जिंदा रहने के लिए हमें खाना पड़ेगा." हर महीने उनका खाने का बजट 150 से 200 यूरो रहता है जो जून में घट कर 100 यूरो हो गया. लोबली का कहान है कि उनका परिवार सर्दियों में ज्यादा नहीं खाता लेकिन उन्हें सितंबर की चिंता है. तब उन्हें अपनी 15 साल की बेटी और 8 साल के बेटे के लिए स्कूल की जरूरी चीजें भी खरीदनी होंगी तब उनका बजट बिगड़ जायेगा.

फ्रेंच राष्ट्रपति का कहना है कि सरकार ऊर्जा बचाने के लिए रात में सार्वजनिक बत्तियों को बंद करने और इसी तरह के दूसरे कदम उठाने जा रही है. इसी तरह जर्मनी अधिकारी आम लोगों और कारोबारियों से ऊर्जा बचाने की गुहार लगा रहे हैं. इसके साथ ही सरकारी दफ्तरों में एयरकंडीशनर की सेटिंग बदली जा रही है या फिर उन्हें बंद किया जा रहा है.

रूस से गैस की सप्लाई में कटौती

रूस ने करीब दर्जन भर यूरोपीय देशों की गैस की सप्लाई या तो बंद कर दी है या फिर उनमें कटौती कर रहा है. एक प्रमुख पाइपलाइन को पिछले हफ्ते नियमित मरम्मत के लिए बंद कर दिया गया. इसके साथ ही डर यह भी है कि रूस और जर्मनी के बीच गैस की सप्लाई करने वाली नॉर्ड स्ट्रीम 1 पाइपलाइन के जरिये गैस की सप्लाई दोबारा शुरू नहीं होगी. जर्मनी में रूसी गैस के सबसे बड़े आयातक यूनीपर ने सरकारी मदद की गुहार लगाई है. उसे ऊंची कीमतों पर गैस खरीदनी पड़ रही है जबकि ग्राहकों से वह एक तय कीमत ही वसूल सकता है.

आईएनजी बैंक के प्रमुख यूरोजोन अर्थशास्त्री कार्स्टेन ब्रेस्की इस साल के आखिर में मंदी को आता देख रहे हैं क्योंकि ऊंची कीमतें लोगों की क्रय शक्ति को घटा देंगी. यूरोप में लंबे समय का आर्थिक विकास इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकारें अक्षय ऊर्जा पर आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ने के लिए भारी निवेश जुटा पाती हैं या नहीं. ब्रेस्की का कहना है, "बिना निवेश और संरचनात्मक बदलाव के सिर्फ उम्मीद ही रखी जा सकती है कि सब कुछ पहले जैसा होगा, लेकिन यह होगा नहीं."

मॉस्को में मैक्डॉनल्ड की जगह शुरू हुए रेस्तरां में उमड़ी भीड़तस्वीर: Evgenia Novozhenina/REUTERS

रूस की आर्थिक किलेबंदी

एक तरफ जहां रूस मुसीबतों में घिरा है वहीं रूस ने रूबल की विनिमय दर, स्टॉक मार्केट और महंगाई की दर को सरकार की भारी दखल से ही सही स्थिर कर लिया है. रूसी तेल को एशिया में ज्यादा खरीदार मिल रहे हैं हालांकि छूट वाली कीमत पर दूसरी तरफ पश्चिमी खरीदार उनसे किनारा कर रहे हैं. 2014 में क्राइमिया को यूक्रेन से अलग करने के बाद भारी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करते रूस ने अपनी आर्थिक किलेबंदी कर ली.

इस दौरान कर्ज को काफी कम किया गया और कंपनियों पर दबाव बनाया गया कि वो अपने लिए पार्ट्स और भोजन के स्रोत रूस के अंदर ही खोजें. हालांकि विदेशी कारोबार बंद हो गये हैं और रूस ने विदेशी कर्ज के मोर्चे पर करीब एक शताब्दी के दौर में पहली बार डिफॉल्ट किया है. इसके बाद भी रूसी शहरों में फिलहाल तात्कालिक रूप से कोई संकट नजर नहीं आ रहा है. रूसी युवा अब भी रेस्तरांओं में जा रहे हैं ये और बात है कि मॉल में विदेशी ब्रांड की चमचमाती दुकानों पर ताला पड़ा है. मैकडॉनल्ड की जगह लेने वाला रेस्तरां उसी के जैसा खाना परोस रहा है कुछ और ऐसे रेस्तरांओं का भी यही हाल है.

मॉस्को से 440 किलोमीटर दूर कम समृद्ध राज्य निझ्नी नोवोगोरोद में रहने वाली सोफिया सुवोरोवा का पारिवारिक बजट थोड़े तनाव में है. उन्होंने बताया, "हम व्यवहारिक रूप से बाहर से खाना ऑर्डर नहीं कर रहे हैं. अगर आपके पास छोटे बच्चे हों तो थोड़ी सुविधा रहती है क्योंकि हम कैफे में उतना नहीं जाते. हमने मनोरंजन थोड़ा कम किया है जैसे कि कंसर्ट या फिर थियेटर, हम बच्चों को तो यह सब मुहैया करा रहे हैं लेकिन बड़ों के लिए कटौती हो रही है."

रूबल युद्ध से पहले के मुकाबले मजबूत स्थिति में हैतस्वीर: Petr Svancara/CTK/dpa/picture alliance

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि रूबल युद्ध के पहले से भी मजबूत नजर आ रहा है और महंगाई भी घट रही है लेकिन यह तस्वीर भ्रामक है. सरकार ने देश के बाहर मुद्रा भेजने पर रोक लगा दी है और निर्यातकों पर दबाव डाला गया है कि वो तेल और गैस की कीमतों का भुगतान रूबल में वसूल करें. इन कदमों ने रूबल को मजबूती दी है. जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स में रूसी अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ यानिस क्लुगे ने हाल ही में एक विश्लेषण लिखा है. इसमें उन्होंने कहा है कि महंगाई दर ने आंशिक रूप से अपना मतलब खो दिया है क्योंकि इसमें पश्चिमी देशों के गायब हो रहे सामानों की कीमत नहीं शामिल की गई है, दूसरी तरफ कम महंगाई का मतलब मांग में कमी भी है.

2020 में करीब 28 लाख रूसी लोग विदेशी या फिर मिलीजुली फर्मों में काम करते थे. अगर सप्लायरों को भी इसमें शामिल कर लिया जाए तो करीब 50 लाख यानी रूस के कामकाजी लोगों में से 12 फीसदी सीधे तौर पर विदेश निवेश पर निर्भर थे.

विदेशी कंपनी रूसी हाथों में जा सकती हैं और संरक्षणवाद और सरकारी नौकरियां बड़े पैमाने पर लोगों को बेरोजगारी से बचा लेंगी लेकिन अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में बहुत कम उत्पादक होगी. क्लुगे का कहना है, "इसके नतीजे में लोगों की वास्तविक औसत आय में भारी कमी आयेगी."

एनआर/ओएसजे (एपी)

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