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रस्मअदायगी बनकर रह गए लोकपाल और लोकायुक्त

शिवप्रसाद जोशी
८ अक्टूबर २०२०

गोवा के लोकायुक्त के रूप में कार्यकाल पूरा करते हुए जस्टिस पीके मिश्र ने सरकारी रवैये पर गहरी खिन्नता और निराशा जताई. लेकिन ये तो एक मिसाल है, लोकायुक्त जैसा संस्थान अन्य राज्यों में कहीं भी काम करता नहीं दिख रहा है.

Indien Korruption Aktivist Anna Hazare in Neu Delhi
2012 में अन्ना हजारे तस्वीर: dapd

गोवा के लोकायुक्त पद से पिछले दिनों विदा लेते हुए जस्टिस प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने सरकार के रवैये और लोकायुक्त संस्था के प्रति उसकी संवेदनहीनता पर गंभीर आरोप लगाए. जस्टिस मिश्रा के प्रेस में प्रकाशित बयान के मुताबिक अगर उनसे एक वाक्य में पूछा जाए कि गोवा के लोकायुक्त के रूप मे भ्रष्टाचार की शिकायतों को लेकर उनका अनुभव कैसा रहा तो उनके मुताबिक वह यही कहेंगे कि लोकायुक्त की संस्था को खत्म कर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि आखिर जनता का पैसा इस पर क्यों बरबाद किया जाए. जस्टिस मिश्रा ने बताया कि अपने कार्यकाल में उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की छानबीन के बाद कार्रवाई के लिए 21 सिफारिशें सरकार के पास भेजी थीं लेकिन उनमें से एक पर भी सरकार ने कोई ऐक्शन नहीं लिया.

लेकिन यह तकलीफ सिर्फ गोवा के लोकायुक्त की नहीं है. आपको ध्यान होगा, देश में राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार मिटाने और केंद्र में लोकपाल के गठन की मांग के लिए हुए विभिन्न आंदोलनों के क्रम में 2011 का जंतरमंतर पर अन्ना हजारे आंदोलन सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा था. एक लंबे हाहाकारी आंदोलन, कैंडल, जुलूस, टोपी, तख्ती और तत्कालीन यूपीए सरकार की विदाई के बावजूद देश में लोकपाल हो या राज्यों में लोकायुक्त- उन्हें लेकर शासन व्यवस्था अब भी नकार मुद्रा से बाहर नहीं निकली है.

हां में सिर हिलाना और चुनावी मंचों पर गला फाड़ फाड़ कर भ्रष्टाचार मिटाने की कस्में खाना एक बात है, सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान के लिए कड़ा कानून या स्वायत्त संस्था बना देना भी एक बात है, लेकिन यह बिल्कुल दूसरी ही बात है कि इन संस्थाओं के गठन का हासिल क्या रहता है, वे क्या कर पाती हैं, उन्हें कितनी शक्तियां हासिल हैं और उनकी उपयोगिता क्या रह जाती है.

हाल वही - ढाक के तीन पात

रही बात राज्यों की- 20 से अधिक राज्यों में सरकारों ने अपने यहां लोकायुक्त की व्यवस्था तो कर दी है और सेवानिवृत्त न्यायधीशों को उन पदों पर बैठा भी दिया है लेकिन हाल वही हैं- ढाक के तीन पात. गोवा को ही लें. वहां पहला लोकायुक्त मार्च 2013 में बनाया गया था. सात महीने में ही जस्टिस सुदर्शन रेड्डी ने इस्तीफा दे दिया. अगली नियुक्ति तीन साल के लंबे अंतराल के बाद हुई, अप्रैल 2016 में. जस्टिस मिश्रा ने अपना कार्यकाल पूरा तो किया लेकिन अनुभव क्या रहा, पाठक ये ऊपर पढ़ ही चुके हैं. राज्यों में लोकायुक्त के गठन का मामला सुप्रीम कोर्ट में आता रहा है. बार बार कोर्ट को राज्यों को इस बारे में याद दिलाना पड़ा और बाजदफा फटकार भी लगानी पड़ी. लेकिन लोकायुक्त होने के बावजूद राज्यों में भ्रष्टाचार के मामलों पर कितना अंकुश लग पाया या कितने मामलों में जांच हो पाई या कार्रवाई हो पाई - ये सवाल भी लाजवाब बने हुए हैं.

अन्ना आंदोलन का एक दशक होने वाला है. आठ-नौ साल लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट को संसद से पास हुए बीत चुके हैं, लोकपाल अधिनियम अधिसूचित होने के कुछ ही महीनों बाद 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आ चुकी थी लेकिन पहला लोकपाल नियुक्त करने में उसे करीब पांच साल लग गए. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पिनाकी चंद्र घोष को देश का पहला लोकपाल बने हुए एक साल से कुछ अधिक समय हो चुका है लेकिन संस्थान अभी भी अपनी स्वाभाविक रंगत में नहीं दिखता है.

भ्रष्टाचार की शिकायतें दर्ज करने के लिए एक समुचित फॉर्मेट बनने में ही लंबा समय लग गया. फिलहाल ‘नॉट सिक्योर' लोकपाल वेबसाइट में फॉर्मेट के अधिसूचित होने की सूचना-पट्टी स्क्रॉल में चल रही है. लोकपाल के गठन के एक साल से अधिक समय बीत जाने के बाद उसकी वेबसाइट को देखते हुए भी आप संस्था के ताजा सूरतेहाल का एक मोटा अनुमान लगा सकते हैं. भ्रष्टाचार निरोधी कानून में 2018 में हुए संशोधनों के बाद यह स्पष्ट नहीं है कि लोकपाल के न्यायाधिकरण से उसका तालमेल कैसे होगा. दूसरी बात यह है कि लोकपाल बिल के एक साल बाद व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन ऐक्ट आया था लेकिन इसमें लोकपाल का उल्लेख ही नहीं है. इनमें भी संगति लाने की जरूरत है. कुल मिलाकर ये तीनों कानून तो एक सूत्र में पिरोए जाने चाहिए. सवाल सीबीआई का भी है, वो ‘तोता' ही बना रहेगा या लोकपाल के अधीन उसे कुछ स्वायत्ताएं हासिल होंगी? अगर सीबीआई लोकपाल के दायरे में नहीं रखी जाती तो फिर लोकपाल के लिए जांच और कार्रवाई का काम कौन करेगा? और फिर सीबीआई या सीवीसी की भूमिका क्या रह जाएगी- बहुत से अंतर्गुम्फित सवाल हैं जिनके जवाब स्पष्ट रूप से नहीं मिल पाए हैं.

समस्या का निदान नहीं

इसीलिए एक्टिविस्टों को लगता है कि लोकपाल या लोकायुक्तों की नियुक्त कर देने भर से मूल समस्या का निदान नहीं हो रहा है. बल्कि उनका आरोप है कि जानबूझकर लोकपाल से जुड़े न्यायक्षेत्र और अन्य जरूरतों और कानूनी विसंगतियों को उलझा कर रखा गया है. सबसे बड़ा विवाद तो लोकपाल और सदस्यों के चयन से ही जुड़ा है. मशहूर एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज के द वायर में प्रकाशित एक बयान के मुताबिक "चयन समिति में सरकारी प्रतिनिधियों का बहुमत नहीं होना चाहिए था लेकिन आखिरकार वही हुआ. क्या लोकपाल उस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की छानबीन कर पाएगा जिसने नियुक्तियां की हैं?”

विधि विशेषज्ञों और सूचना कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे हालात में तो पारदर्शिता का निर्माण और भ्रष्टाचार से मुक्ति का मकसद पूरा होने से रहा. जाहिर है बात प्रशासनिक ढिलाई की नहीं है, राजनीतिक इरादे और सदिच्छा की भी है. और लगता है कि राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की लड़ाई में भारत और पीछे छूटता जा रहा है. क्योंकि भ्रष्टाचार और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता से जुड़े सूचकांकों और सर्वे रिपोर्टों में भारत का प्रदर्शन फीका ही रहा है. ट्रांसपेरंसी इंटरनेशनल की रिपोर्टों को ही लें. जनवरी में जारी करप्शन परसेप्शन इंडेक्स में भारत 180 देशों की सूची में 80वें नंबर पर था. चीन का भी यही नंबर है और पाकिस्तान 120वें नंबर पर है. अगर पिछले पांच साल में इस सूचकांक के लिहाज से भारत का प्रदर्शन देखे तो उसमें गिरावट ही आई है. 2015 में उसकी रैंक 76 थी, 2016 में 79, 2017 में 81, 2018 में 78 और 2019 में 80.

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