पर्यावरण को बचाने के लिए पेट्रोल-डीजल की बजाए बायोफ्यूल के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं, बायोफ्यूल के लिए खास फसलों को उगाने की अंधी दौड़ में जंगलों का ही सफाया हो रहा है.
ग्लोबल वॉर्मिंग, ग्रीन हाउस गैस और ओजोन लेयर में छेद, ये ऐसी चुनौतियां हैं जिनसे निपटने के लिए विकसित देश कम धुंआ निकालने वाली कारों पर जोर दे रहे हैं. ग्रीन हाउस गैस को बनाने में ट्रांसपोर्ट की भूमिका 22 फीसदी होती है. इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए बायोफ्यूल्स यानि एक खास किस्म की फसल से बनने वाले ईंधन को इस्तेमाल में लाया जा रहा है जिसमें ऑयलसीड, ताड़ का तेल और मक्के की फसल प्रमुख है.
ब्राजील ने तो 40 साल पहले ही इथनॉल का प्रयोग गाड़ियों में शुरू कर दिया था. 2005 में अमेरिका ने पहला नवीकरणीय फ्यूल स्टैंडर्ड लागू किया और कहा कि 2012 तक 7.5 अरब गैलन बायोफ्यूल का इस्तेमाल किया जाएगा. मक्के की पैदावार के लिए प्रसिद्ध अमेरिका आज इथनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक है. लेकिन क्या ऐसा करना एक अच्छा कदम है और क्या वाकई हमारा पर्यावरण इससे सुरक्षित हो रहा है? शायद नहीं.
ऊर्जा बचाने वाले घर
यूरोप और अमेरिका में बने घरों में ठंड से बचने के लिए हीटिंग सिस्टम लगाया जाता है. सामान्य तौर पर ये प्राकृतिक गैस या दूसरे पारंपरिक ईंधन से चलता है. अब ऐसे घर डिजाइन किए जा रहे हैं जो ऊर्जा बचा सकें.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
घर की बिजली
ये मॉडल हाउस बर्लिन में है. आयडिया है कि इसमें घर की जरूरत से ज्यादा बिजली बने ताकि अतिरिक्त बिजली से ई-कार या फिर ई-साइकल चार्ज की जा सके. हालांकि पहली बार थोड़ी मुश्किल भी हुई.
तस्वीर: BMVBS/Schwarz
फ्राइबुर्ग की सौर कॉलोनी
घरों को बहुत अच्छे से इंसुलेट किया गया है, इसमें बड़े बड़े कांच लगाए गए हैं जिससे सूरज की रोशनी अंदर आए. इस्तेमाल की गई हवा ताजी हवा को गर्म करती है और छत पर पैनल बिजली बनाते हैं. साल 2000 में यह कॉलोनी बनाई गई थी.
तस्वीर: Rolf Disch Solararchitektur
आरामदेह और किफायती
कमरे रोशनी से भरपूर हैं और हवा की गुणवत्ता अच्छी है. साथ ही तापमान भी स्थिर रहता है. इस तरह का घर बनाना सामान्य से महंगा है लेकिन इसके बाद ऊर्जा की बचत के कारण खर्चा कम होता है.
तस्वीर: Rolf Disch Solararchitektur
रिमेक भी अच्छा
1968 से बनी हुई फ्राइबुर्ग की इस बहुमंजिला इमारत की 2011 में मरम्मत की गयी. पहली बार किसी बिल्डिंग को इस तरह से इंसुलेट किया गया कि इसके 140 अपार्टमेंट की ऊर्जा खपत 80 फीसदी कम हो गई.
आल्पेन नाम की होटल चेन ने अपनी इमारतों को ऊर्जा बचाने वाली पैसिव हाउस स्टाइल में बदलना शुरू कर दिया है. अच्छे इंसुलेशन के कारण ठंड में भी हीटिंग के बिना ही काम चल जाता है और सौर पैनलों से बिजली की अधिकतर जरूरत पूरी हो जाती है.
तस्वीर: 2014 Oberstdorf Event
ठंड में भी
पैसिव हाउस पुरानों घरों की तुलना में दस फीसदी कम ऊर्जा लेते हैं. और अगर नए घरों की तुलना की जाए तो पांच फीसदी. तस्वीर में दिख रहे फिनलैंड के ये घर बहुत अच्छे से इंसुलेट किए गए हैं, हर खिड़की में चार कांच हैं.
तस्वीर: Kimmo Lylykangas Architects
किराएदारों के लिए अच्छा
शून्य ऊर्जा खपत वाले ये घर, फिलाडेल्फिया के पहले पैसिव हाउस हैं. कम आय वाले लोगों के लिए बनाए गए ये घर गरीब लोगों के लिए भी फायदेमंद हैं क्योंकि इनमें ऊर्जा की खपत नहीं के बराबर है.
तस्वीर: Sam Oberter Photography
ऑस्ट्रिया से शुरुआत
दुनिया भर में पहले पैसिव ऑफिस विएना में बने थे. अब ऑस्ट्रिया और जर्मनी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं और ज्यादा इकोफ्रेंडली और बिजली बचाने वाले भी हो गए हैं. दुनिया भर में करीब 50,000 पैसिव हाउस हैं. इसमें आधे ऑस्ट्रिया और जर्मनी में हैं.
बिजली बचाने वाले इन घरों को दुनिया भर में पसंद किया जा रहा है. फ्रैंकफर्ट के पुराने घरों में सुधार करने की योजना है. इतना ही नहीं शहर का प्रशासन स्कूल, किंडरगार्टन, ऑफिस मिला कर करीब 80,000 घरों को पैसिव हाउस में ढालना चाहता है. .
तस्वीर: DW/G. Rueter
चीन भी
जर्मन और चीनी पैसिव हाउस. ये एक कारखाने का मॉडल है जो चीन के हार्बिन में पैसिव हाउस स्टैंडर्ड के हिसाब से बनाया जा रहा है. चीनी कंपनी सायास इन मकानों के लिए खिड़कियां बनाना शुरू कर चुकी हैं और इस तरह के मकान बनाने वाली पहली चीनी कंपनी है.
तस्वीर: Benjamin Wünsch
यूरोप का मॉडल
पहला शून्य ऊर्जा वाला सरकारी ऑफिस बर्लिन में 2013 में शुरू हुआ. छत पर लगे सोलर पैनल पूरे ऑफिस के लिए बिजली बनाते हैं. यूरोपीय संघ में 2019 से सभी घर 'करीब करीब जीरो एनर्जी बिल्डिंग' होंगे.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
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इस बारे में पर्यावरणविद और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट से जुड़े प्रो. बी.डी. त्रिपाठी का कहना है, "पेट्रोल-डीजल की तुलना में बायोफ्यूल बेहतर हो सकते हैं, लेकिन यह समाधान नहीं है. मिथेनॉल या मिथेन गैस का इस्तेमाल ठीक है पर बायोफ्यूल से कार्बनडाइऑक्साइड का निकलना खतरनाक है."
फसलों को पैदा करने की होड़
बायोफ्यूल के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही पूरी दुनिया में मक्का उगाने की मानो होड़ सी शुरू हो गई है. दक्षिण अमेरिका और दक्षिणपूर्वी एशियाई देशों में अच्छी आमदनी के चलते किसान सिर्फ मक्का उगा रहे हैं. इसका नतीजा यह हुआ है कि दूसरी फसलों की पैदावार कम होती जा रही है और खान-पान की उपलब्धता पर इसका असर पड़ा है. कम पैदावार नाटकीय रूप से महंगाई बढ़ा रही है जो सरकारों के लिए चुनौती है.
तस्वीर: Reuters/B. Kelly
2016 में की गई यूरोपीयन कमीशन की स्टडी बताती है कि ईयू के नवीकरणीय कानून के बाद कार्बन का उत्सर्जन बढ़ा है, कम नहीं हुआ. इसकी एक वजह यह है कि दुनिया भर के किसान बायोफ्यूल की पैदावार करना चाहते हैं और अब खेती के लिए जंगलों की कटाई भी शुरू हो गई है. यह इतना भयानक है कि इसका अंदाजा इससे बात से लगता है कि पर्यावरण को बचाने के नाम पर अब जंगलों की कटाई शुरू हो रही है. भूमि के इस्तेमाल को बेतरतीब तरीके से बदलने से नुकसान और बढ़ेगा.
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कुछ बायोफ्यूल पुराने ईंधनों से भी खतरनाक
पर्यावरणविद् और एंटी-हंगर कैंपेनर सरकारों से अनुरोध कर रहे हैं कि बायोफ्यूल के इस्तेमाल पर खुली छूट पर लगाम लगाई जाए.
ऑक्सफैम से जुड़े कैंपेनर मार्क ओलिवियर हरमन कहते हैं कि सरकारों और लोगों को यह समझना होगा कि बायोफ्यूल के लिए फसलों को उगाना जलवायु परिवर्तन का उपाय नहीं, बल्कि समस्या का हिस्सा है.
पिछले दिनों ब्रसेल्स में पर्यावरणविदों की बायोफ्यूल बनाने वाली कंपनियों और फार्मर ग्रुप कोपा कोगेका से भिड़ंत हो गई. पर्यावरणविदों ने कहा कि खाने में प्रयोग किए जाने वाले तेल, सोयाबीन तेल और ताड़ के तेल से बायोफ्यूल बनाए जाने पर उन्हें आपत्ति है. तर्क दिया कि बायोडीजल अगर खाने के तेल से बनेगा तो आम लोगों के लिए इसकी उपलब्धता कम हो जाएगी. यूरोपीय बाजार में खाने का तेल सबसे सस्ता है और तीन-चौथाई हिस्से पर इसका कब्जा है. वहीं, बायोडीजल में ताड़ के तेल का इस्तेमाल गलत है क्योंकि इससे आम ईंधन के मुकाबले 3 गुना ग्रीन हाउस गैस निकलती है. बायोडीजल बनाने की अंधी दौड़ में दक्षिणपूर्वी एशिया, लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के जंगलों का सफाया किया जा रहा है.
तेल के बाजार पर नजर रखने वाले ऑयल वर्ल्ड के मुताबिक, ताड़ के तेल का 51 फीसदी यूरोप की कार और ट्रकों में इस्तेमाल किया जाता है. यूरोप में लोगों को बायोडीजल से होने वाले नुकसान के बारे में अंदाजा ही नहीं है. वहीं, बायोडीजल इंडस्ट्री का कहना है कि पर्यावरणविदों और पर्यावरण संस्थाओं के पास ठोस सबूत या नतीजे नहीं है जिससे नवीकरण को रोका जा सके और सरकारें वापस पुराने ईंधनों को इस्तेमाल करे.
यूरोपीय संघ ने फसलों पर लगाई लगाम
इस साल जून में यूरोपीय संघ के कानूनविदों ने बायोफ्यूल के बेतरतीब इस्तेमाल पर लगाम लगाने का फैसला किया है. हालांकि उन्होंने ताड़ और सोयाबीन तेल के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने से मना कर दिया. 2020 से 2030 के बीच यातायात में बायो ईंधन के सही इस्तेमाल पर जोर दिया. अमेरिका में बायोफ्यूल के प्रयोग पर दोबारा विचार किया जा रहा है और अब तक अपनी नीतियों पर गर्व करने वाला ब्राजील पसोपेश में है.
ऐसा माना जा रहा है कि जल्द ही एडवांस्ड बायोफ्यूल का इस्तेमाल देखने को मिलेगा और जल्द ही फसलों के बजाए काई से ईंधन बनाया जाएगा. यह अस्तित्व में आ चुका है, लेकिन आम लोगों के लिए अभी इसे लागू नहीं किया गया है.
हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों में सबसे आगे कौन
बीते साल हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में 28 फीसदी का उछाल आया. 37.9 करोड़ गाड़ियों के साथ इन्होंने बाजार के 4.4 फीसदी हिस्से पर कब्जा किया है. देखिए कौन सी कार कितनी संख्या में बेची गई.