जर्मनी में आतंकी हमले की योजना बनाने के शक में गिरफ्तार संदिग्ध जाबेर अलबकर जेल में मृत मिला. कड़ी निगरानी के बावजूद जाबेर ने फांसी लगाकर जान दी. जांच एजेंसियों के लिए यह बड़ा झटका है.
तस्वीर: Polizei Sachsen
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जर्मन प्रांत सेक्सनी के न्याय मंत्रालय के मुताबिक, बर्लिन एयरपोर्ट पर हमला करने की योजना बना रहे संदिग्ध ने जेल में आत्महत्या की. मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा, "12 अक्टूबर 2016 की शाम, जाबेर अलबकर, जो गंभीर हमलों की योजना का संदिग्ध था, उसने लाइपजिग अस्पताल के हिरासत केंद्र में आत्महत्या कर ली."
22 साल के सीरियाई शरणार्थी जाबेर अलबकर को 10 अक्टूबर की सुबह लाइपजिग शहर में गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तारी के बाद उसे जेल के चिकित्सा सेल में रखा गया था. दो साल पहले जर्मनी आए जाबेर को 2015 में जर्मनी में शरण मिली. वह केमनित्स शहर में रह रहा था. जांचकर्ताओं के मुताबिक जाबेर इस्लामिक स्टेट से प्रभावित था. उस पर निगाह रख रही पुलिस ने बीते हफ्ते जाबेर के अपार्टमेंट पर छापा मारा, जहां से उसे 1.5 किलोग्राम विस्फोटक मिला.
जाबेर छापे के दौरान पुलिस को चकमा देकर भाग निकला और 80 किमोमीटर दूर लाइपजिग शहर पहुंचा. लाइपजिग में उसने घर खोजने कोशिश की. इस दौरान वह तीन सीरियाई शरणार्थियों के संपर्क में आया. रविवार रात एक शरणार्थी ने जाबेर को पहचान लिया. इसके बाद तीनों ने जाबेर को केबल से बांधकर एक कमरे में बंद कर दिया और पुलिस स्टेशन जाकर सूचना दी.
सीरियाई शरणार्थियों ने ऐसे पकड़ा जाबेर कोतस्वीर: facebook.com/Syrien.Deutschland1
लेकिन अब जाबेर की मौत से कई सवाल खड़े हो रहे हैं. जर्मन समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक जाबेर ने फांसी लगाकर जान दी. लेकिन जेल के सेल में कड़ी निगरानी के बावजूद ऐसा कैसे मुमकिन हुआ, इसका जबाव अभी तक नहीं मिला है.
जर्मन प्रांत सैक्सनी की पुलिस पहले ही इस मामले में आलोचना का सामना कर चुकी है. छापे के दौरान जाबेर के फरार होने को लेकर पुलिस की खासी किरकिरी हुई. जाबेर की आत्महत्या से पुलिस की मुश्किलें और बढ़ गई है. जांचकर्ताओं को भी जाबेर की मौत से झटका लगा है. जाबेर जांचकर्ताओं को जर्मनी और यूरोप में सक्रिय बाकी संदिग्ध आतंकियों के बारे में भी जानकारी दे सकता था. घरेलू खुफिया एजेंसी के मुताबिक जाबेर जर्मनी आने के बाद कट्टरपंथी बना. ऐसा ही एक मामला कोलोन शहर में भी सामने आ चुका है, जहां 16 साल का एक युवक जर्मनी आने के बाद कट्टरपंथ की तरफ मुड़ गया.
(कहां कहां हैं बच्चों के हाथ में बंदूकें)
कहां कहां हैं बच्चों के हाथों में बंदूकें
दुनिया के अलग अलग हिस्सों में जारी संघर्षों में बच्चे न सिर्फ पिस रहे हैं, बल्कि उनके हाथों में बंदूकें भी थमाई जा रही हैं. एक नजर उन देशों पर जहां बच्चों को लड़ाई में झोंका जा रहा है.
तस्वीर: Guillaume Briquet/AFP/Getty Images
अफगानिस्तान
तालिबान और अन्य कई आतंकवादी गुट बच्चों को भर्ती करते रहे हैं और उनके सहारे कई आत्मघाती हमलों को अंजाम भी दे चुके हैं. कई बार अफगान पुलिस पर भी बच्चों को भर्ती करने के आरोप लगते हैं.
तस्वीर: picture alliance/Tone Koene
बर्मा
बर्मा में बरसों से हजारों बच्चों को जबरदस्ती फौज में भर्ती लड़ाई के मोर्चे पर भेजने का चलन रहा है. इनमें 11 साल तक के बच्चे भी शामिल होते हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/P.Kittiwongsakul
सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक
इस मध्य अफ्रीकी देश में 12-12 साल के बच्चे विभिन्न विद्रोही गुटों का हिस्सा रहे हैं. लॉर्ड रजिस्टेंस ग्रुप पर बच्चों को इसी मकसद से अगवा करने के आरोप लगते हैं.
तस्वीर: UNICEF/NYHQ2012-0881/Sokol
चाड
यहां विद्रोही ही नहीं बल्कि सरकारों बलों में भी बच्चों को भर्ती किया जाता रहा है. 2011 में सरकार ने सेना में बच्चों को भर्ती न करने का एक समझौता किया था.
तस्वीर: UNICEF/NYHQ2010-1152/Asselin
कोलंबिया
इस दक्षिण अमेरिकी देश में पिछले दिनों गृहयुद्ध खत्म हो गया. लेकिन उससे पहले फार्क विद्रोही गुट में बड़े पैमाने पर बच्चों को भर्ती किया गया था.
तस्वीर: AP
डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन ऑफ कांगो
संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि एक समय तो इस देश में तीस हजार लड़के लड़कियां विभिन्न गुटों की तरफ से लड़ रहे थे. कई बार तो लड़कियों को यौन गुलाम की तरह इस्तेमाल किया जाता है.
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भारत
छत्तीसगढ़ जैसे नक्सल प्रभावित इलाकों में कई बच्चों के हाथों में बंदूक थमा दी जाती है. कई बार सुरक्षा बलों से मुठभेड़ों मे बच्चे भी मारे जाते हैं.
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इराक
अल कायदा बच्चों को लड़ाके ही नहीं, बल्कि जासूसों के तौर पर भी भर्ती करता रहा है. कई बार सुरक्षा बलों पर होने वाले आत्मघाती हमलों को बच्चों ने अंजाम दिया है.
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सोमालिया
कट्टरपंथी गुट अल शबाब 10 साल तक के बच्चों को जबरदस्ती भर्ती करता रहा है. उन्हें अकसर घरों और स्कूलों से अगवा कर लिया जाता है. कुछ सोमाली सुरक्षा बलों में भी बच्चों को भर्ती किए जाने के मामले सामने आए हैं.
तस्वीर: picture alliance/AP Photo/Abdi Warsameh
दक्षिणी सूडान
2011 में दक्षिणी सूडान के अलग देश बनने के बाद वहां की सरकार ने कहा था कि अब बच्चों को सैनिक के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, लेकिन कई विद्रोही गुटों में अब भी बच्चे हैं.
तस्वीर: DW/A. Stahl
सूडान
सूडान के दारफूर में दर्जनों हथियारबंद गुटों पर बच्चों को भर्ती करने के आरोप लगते हैं. इनमें सरकार समर्थक और विरोधी, दोनों ही तरह के मिलिशिया गुट शामिल है.
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यमन
यमन में अरब क्रांति से पहले 14 साल तक के बच्चों को सरकारी बलों में भर्ती किया गया था. हूथी विद्रोहियों के लड़ाकों में भी ऐसे बच्चे शामिल हैं जिनके हाथों में बंदूक हैं.