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सांस लेने वाला सीमेंट

५ अप्रैल २०१९

सीमेंट बनाने में काफी ऊर्जा लगती है. साथ ही पर्यावरण के लिए नुकसानदायक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन भी खूब होता है. लेकिन अब सीमेंट में कुछ ऐसा मिलाने का उपाय मिला है, जिससे ऊर्जा भी बचेगी और पर्यावरण भी.

Deutschland Bauarbeiter auf der Baustelle SymbolbildDeutschland Bauarbeiter auf der Baustelle SymbolbildDeutschland Bauarbeiter auf der Baustelle Symbolbild
तस्वीर: Imago/Westend61

विश्व में कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का करीब पांच फीसदी हिस्सा केवल सीमेंट के उत्पादन से पैदा होता है. आम सीमेंट के निर्माण में भारी मात्रा में कई ग्रीन हाउस गैसें निकलती हैं लेकिन लंबे समय से सीमेंट का कोई विकल्प भी नहीं था. अब माइक्रोबायोलॉजी के रिसर्चरों की लैब से एक ऐसे सीमेंट का आइडिया निकला है, जो सीमेंट से कहीं ज्यादा ईको फ्रेंडली होगा. आइडिया है कि भविष्य की इमारतों में लगने वाले गारे में बैक्टीरिया को मिलाया जाए.

परीक्षणों में पाया गया है कि तरह तरह के बैक्टीरिया के मिश्रण को कई तरह के कचरे के साथ उगाकर उनसे ऐसा उत्पाद बनाया जा सकता है, जो गारे की जगह ले सके. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसमें कुछ और सही बदलाव लाए जा सकें तो यह उत्पाद एक दिन मजबूत कंक्रीट की जगह भी ले सकेगा.

परीक्षण की शुरुआत मिट्टी में मिलने वाले एक साधारण बैक्टीरिया से हुई, जिसे यूरिया और पोषक तत्वों के एक मिश्रण में मिलाया गया. इस दौरान तापमान को तीस डिग्री के आसपास ही रखा गया. इस रासायनिक प्रक्रिया के बारे में इटली के जीवविज्ञानी, पिएरो तिआनो बताते हैं, "मिश्रण के अंदर बैक्टीरिया बढ़ने लगता है. सीमेंट बनाने के लिए बैक्टीरिया को एक विशेष संख्या तक पहुंचना होता है. करीब तीन घंटे के फर्मेंटेशन के बाद मिश्रण इस्तेमाल के लिए तैयार हो जाता है."

Eine Zementfabrik, Lothian SchottlandEine Zementfabrik, Lothian Schottland
सीमेंट उत्पादन प्लांट तक कच्चा माल लाने में भी लगती है ऊर्जा.तस्वीर: picture-alliance

फिर वैज्ञानिक इस बैक्टीरिया वाले मिश्रण को बालू, सीमेंट के कचरे और चावल के भूसे की राख में मिलाते हैं. चूंकि इनमें से ज्यादातर कच्चा माल किसी ना किसी तरह का कचरा है, इसे बनाने में खर्च बहुत कम आता है. साधारण सीमेंट के इस्तेमाल में 1400-1500 डिग्री सेल्सियस तक के ऊंचे तापमान की जरूरत पड़ती है, जिस पर लाइमस्टोन सीमेंट में बदलता है. जबकि बैक्टीरिया केवल 30 डिग्री तापमान पर अपना काम कर देता है. यानि ऊर्जा की बहुत बचत होती है.

बैक्टीरिया इस प्रक्रिया में कैल्शियम कार्बोनेट बनाता है, जो सीमेंट के कणों को आपस में जोड़ने का काम करता है. रसायनशास्त्री, लिंडा विटिग कहती हैं, "मिश्रण में बैक्टीरिया के आदर्श घनत्व का पता होना बहुत जरूरी है. जैसे, हम अब ये जानते हैं कि ज्यादा बैक्टीरिया के होने का मतलब ये नहीं होता कि सीमेंट की गुणवत्ता बेहतर होगी. इसके उलट, कई बार बैक्टीरिया की संख्या अधिक होने के कारण प्रोडक्ट की मजबूती कम हो जाती है." शुरुआती नतीजे सकारात्मक हैं. रिसर्चरों की अब कोशिश है कि बैक्टीरिया को और लाभकारी बनाया जाए. इसके लिए जीवविज्ञानी और रसायनशास्त्री मिल कर काम कर रहे हैं.

ग्रीस की नियापोलिस यूनिवर्सिटी के सिविल इंजीनियर, निकोस बकास बताते हैं, "हमने इस मैटीरियल को गारे के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया. यह परंपरागत कंक्रीट जितना मजबूत तो नहीं लेकिन इसे आकार देना और लगाना काफी आसान है. इसलिए ये गारे के रूप में अच्छा है." इस्तेमाल करने का तरीका चाहे कुछ भी हो लेकिन रिसर्चरों को यकीन है कि एक दशक से भी कम समय में सीमेंट की ये नई किस्म यूरोपीय निर्माण क्षेत्र का हिस्सा बन चुकी होंगी.

आरपी/आईबी

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