एक असामान्य सेक्स चक्र खुद इस जानलेवा अफ्रीकी परजीवी को विलुप्ति की ओर ले जा रहा है. केवल पश्चिमी और केंद्रीय अफ्रीका में ही हर साल लाखों लोगों को अपनी चपेट में लेने वाले स्लीपिंग सिकनेस के रोगाणु 'टी बी गैंबियेनसी' ने हजारों सालों से सेक्स नहीं किया है. आज की तारीख में ऐसे जितने भी परजीवी बचे हैं वे एक ही पूर्वज की संतान से आए हैं और गुणात्मक रूप से उपजे एक दूसरे के क्लोन हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के बायोइन्फॉर्मेटिक्स विशेषज्ञ विली वियर बताते हैं, "हमने पाया कि अफ्रीकी स्लीपिंग सिकनेस की बीमारी का परजीवी हजारों सालों से अस्तित्व में है, वो भी बिना सेक्स किए. लेकिन अब ये इस कार्यप्रणाली के नतीजे भुगतने जा रहा है." साइंस जर्नल ईलाइफ में छपी इस स्टडी के मुख्य लेखक वियर ने आगे कहा, "सैद्धांतिक रूप से...इसके परिणाम के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है कि आने वाले समय में यह विलुप्त हो जाएगा."
सेक्सुअल प्रजनन से किसी भी जीव की प्रजाति में आनुवंशिक संरचना डीएनए में बदलाव आया रहता है. इससे प्रजाति की एक पीढ़ी से दूसरी में विविधताएं आती हैं और अवांछित म्यूटेशन मिटते जाते हैं. इन सबकी मदद से ही किसी प्रजाति का अस्तित्व निरंतर बना रहता है.
दुनिया के किसी और हिस्से के मुकाबले ऑस्ट्रेलिया में स्तनधारी जानवर तेजी से विलुप्त हो रहे हैं. लेकिन ऐसा शिकार या इंसानी बस्तियों के विस्तार के कारण नहीं हो रहा है.
तस्वीर: Imago/UIGऑस्ट्रिलेया खास तरह के छोटे कंगारुओं के लिए भी जाना जाता रहा है. लेकिन 1788 से अब तक इनकी चार प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं.
तस्वीर: L. Robayo/AFP/GettyImagesनेशनल अकैडमी ऑफ साइंस ने विलुप्त हो चुके जीवों की लिस्ट निकाली है. 29 ऑस्ट्रेलियाई स्तनधारियों में 35 फीसदी वे हैं जो दुनिया से हाल में विलुप्त हुए हैं.
तस्वीर: Imago/UIGलिस्ट में ताजा ये हैं. ये कृंतक 2006 से 2014 के बीच विलुप्त हो गए.
तस्वीर: Queensland Governmentचमगादड़ खुशकिस्मत रहे. पिछले 20 सालों में इनकी प्रजातियों में बहुत कम विलुप्ति देखी गई है. हालांकि ऐसा नहीं है कि ये विलुप्ति से पूरी तरह बचे हुए हैं.
तस्वीर: Imago/UIGऑस्ट्रेलिया में जमीन पर पहने वाले 273 स्तनधारियों में से 21 फीसदी पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है. वैज्ञानिकों के मुताबिक हर दशक में एक से दो प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं. हैरानी की बात यह है कि जिन इलाकों में ज्यादा विलुप्ति हो रही है वहां मनुष्य बहुत कम हैं.
तस्वीर: Reutersदूध और अंडे देने वाली एकिडना की यह प्रजाति ऑस्ट्रेलिया से तो विलुप्त हो गई है लेकिन अभी तक दुनिया से इसका अस्तित्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. ये गिनी में पाए जाते हैं, लेकिन वहां भी इन पर विलुप्ति का भारी खतरा है.
तस्वीर: picture-alliance/Mary Evans/Ardeaउत्तरी अमेरिका का जमीन पर रहने वाला स्तनधारी सी मिंक भी इस दौरान विलुप्त हो चुका है. उसके लाल रंग के फर और ब्रुश जैसी पू्छ के लिए बहुत ज्यादा शिकार हुआ. हालांकि अमेरिकी मिंक (तस्वीर में) ने अब तक अपने अस्तित्व को कुछ हद तक बचा कर रखा है.
तस्वीर: cc-by-sa-Pdreijndersजानवरों की प्रजातियों की विलुप्ति के लिए शिकार और मानव बस्तियों के विस्तार को जिम्मेदार ठहराया जाता है. खासकर जहां इंसानी आबादी बढ़ रही है.
तस्वीर: Getty Imagesऑस्ट्रेलिया में प्रजातियों की विलुप्ति के लिए इन कारणों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि वहां ज्यादातर जंगलों के अंदरूनी इलाकों से इन जानवरों की विलुप्ति हुई है. ये इलाके मनुष्य से दूर हैं. वैज्ञानिक मानते हैं इनकी विलुप्ति का कारण शिकारी जानवर हो सकते हैं, जैसे यूरोपीय रेड फॉक्स.
तस्वीर: imago/blickwinkel वियर का कहना है कि जल्द ही वैज्ञानिक इस परजीवी की संरचना को और अच्छी तरह समझ कर स्लीपिंग सिकनेस की बीमारी का इलाज खोजने में सफल हो सकते हैं. इस परजीवी को सीसी मक्खी फैलाती है और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले इसकी चपेट में अधिक आते हैं.
एक बार इससे संक्रमित हो जाने वाले व्यक्ति में परजीवी कई सालों तक सुप्त अवस्था में भी रह सकता है. बाद में इसके बुरे असर उस व्यक्ति के तंत्रिका तंत्र पर दिख सकते हैं जिससे प्रभावित व्यक्ति कोमा की स्थिति में भी जा सकता है. फिलहाल इसके इलाज में भी खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है जिसके काफी साइड इफेक्ट होते हैं.
करीब 10,000 साल पहले यह परजीवी जानवरों से इंसान में पहुंचा था. इसका आखिरी सबसे बड़ा फैलाव 1970 के दशक में देखा गया जो करीब 1990 के अंत तक जारी रहा. विश्व स्वास्थ्य संगठन 2020 तक जन स्वास्थ्य समस्या के रूप में इसे मिटा देना चाहता है. लेकिन क्या पता अगर यह परजीवी उससे पहले खुद ही अपने सेक्स-दुष्चक्र में फंस कर खत्म हो जाए.
आरआर/एमजे (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)