निर्भया कांड के तीन साल बाद भले नाबालिग अपराधियों के खिलाफ सख्ती का फैसला लिया गया हो, भारत में बलात्कार के मामले कम नहीं हो रहे. अब बदले की यौन हिंसा की खबरें भी आने लगी हैं. उत्तर प्रदेश में पीड़ित ने आत्महत्या कर ली.
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निर्भया कांड की तीसरी बरसी बीती भी न थी और उसके एक गुनहगार को नाबालिग होने की वजह से मिली रिहाई को लेकर आक्रोश ठंडा भी न पड़ा था कि यूपी के वाराणसी के पास एक लड़की ने अपनी जान दे दी. उसकी मां ने पिछले दिनों स्थानीय चुनाव में जीत हासिल की थी. विरोधी गुट के दो लोगों को उसकी जीत इतनी खल गई कि बदला लेने के लिए उन्होंने महिला की बेटी को ही अपनी हवस का शिकार बना दिया. वो लड़की शिकायत लेकर पुलिस के पास गई तो उसे खदेड़ दिया गया. अपमान और यंत्रणा का दंश झेलती उस लड़की ने आखिर अपनी जान दे दी.
साल बीतते बीतते दिल दहला देने वाली घटना से चमकते भारत पर फिर से कालिख की एक लकीर खिंच गई. सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्त्री के विरुद्ध दमन कितना सर्वव्यापी, कितना सिलसिलेवार, कितना सुनियोजित होता जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र ने बलात्कार को एक तरह का जनसंहार कहा है. यूएन ने 1948 में मानवाधिकार के सार्वभौम घोषणापत्र को स्वीकार किया था. सत्तर और अस्सी के दशकों में स्त्री अधिकारों पर बहसों और प्रस्तावों के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 1993 में यूएन ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा के खात्मे पर प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इसके तहत ये बताने की कोशिश की गई कि महिलाओं को हिंसा से मुक्ति का अधिकार है जिसमें घरेलू, साम्प्रदायिक, जातीय और राज्य इन तमाम संस्थाओं से प्रायोजित हिंसा को शामिल किया गया था. संयुक्त राष्ट्र की कोशिशें दिखाती हैं कि स्त्रियों को पूरी दुनिया में शोषण के प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस धारणा के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संघर्ष हो रहा है.
भारत में रोजाना औसतन 92 महिलाओं का बलात्कार होता है. जब भी किसी महिला के साथ यह जघन्य अपराध होता है, कभी सवाल उसके कपड़ों तो कभी देर रात घर से बाहर रहने पर उठाए जाते हैं. क्या महिलाओं पर बंदिशें लगाना ही है उपाय?
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तन ढकने की जरूरत
मानव सभ्यता की शुरुआत से ही मौसम की मार से बचने के लिए शरीर को ढकने की जरूरत महसूस की गई. बीतते समय के साथ जानवरों की छाल पहनने से लेकर आज इतने तरह के कपड़े मौजूद हैं. जीवनशैली के आसान होने के साथ साथ कपड़ों के ढंग भी बदले हैं और अब यह अवसर, माहौल, पसंद और फैशन के हिसाब से पहने जाते हैं. फिर पूरे बदन को ढकने वाले कपड़ों पर जोर क्यों?
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अंग प्रदर्शन यानि बलात्कारियों को न्यौता
भारत में बलात्कार के ज्यादातर मामलों में पाया गया है कि पीड़िता ने सलवार कमीज और साड़ी जैसे भारतीय कपड़े पहने हुए थे. उनपर हमला करने वाले पुरुषों ने अपनी सेक्स की भूख के कारण संतुलन खो दिया. ऑनर किलिंग के कई मामलों में किसी महिला को सबक सिखाने के मकसद से उस पर जबरन यौन हिंसा की गई और फिर जान से मार डाला गया. इन सबके बीच कपड़ों पर तो किसी का ध्यान नहीं गया.
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कानून का डर नहीं
संयुक्त राष्ट्र ने 2013 में एशिया प्रशांत क्षेत्र में किए अपने सर्वे में पाया गया कि सर्वे में शामिल हर चार में एक पुरुष ने अपने जीवन में कम से कम एक बार किसी महिला का बलात्कार किया है. इनमें से 72 से लेकर 97 फीसदी मामलों में इन पुरुषों को किसी कानूनी कार्यवाई का सामना नहीं करना पड़ा था.
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मनोरंजन का साधन हैं यौन अपराध
उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ इतने ज्यादा यौन अपराधों का कारण प्रदेश की पुलिस ने वहां मोबाइल फोनों के बढ़ते इस्तेमाल, पश्चिमी देशों के बुरे असर और छोटे कपड़ों को ठहराया. लोगों को सुरक्षा देने की अपनी जिम्मेदारी में पूरी तरह विफल पुलिस का कहना है कि मनोरंजन के बहुत कम साधन होने के कारण पुरुष यौन अपराधों को अंजाम देने लगते हैं.
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महिलाओं से मिल रही है चुनौती
सड़कों, ऑफिसों या किसी सार्वजनिक स्थान पर कई बार महिलाओं के कपड़े नहीं बल्कि उनके चेहरे से झलकता आत्मविश्वास, स्वच्छंद रवैया और अब तक पुरुषों के कब्जे में रहे कई क्षेत्रों में उनकी पहुंच कई पुरुषों को बौखला रही है. सदियों से स्थापित पुरुषसत्तात्मक समाज के समर्थक ऐसी औरतों को सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने का जिम्मेदार मानते हैं और यौन हिंसा कर उन्हें समाज में उनकी सही जगह दिखाने की कोशिश करते हैं.
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महिलाओं को ज्यादा बड़ा खतरा किससे
दुनिया के सबसे युवा देश में आज बलात्कार महिलाओं के खिलाफ चौथा सबसे बड़ा अपराध बन चुका है. नेशनल क्राइम ब्यूरो की 2013 रिपोर्ट बताती है कि साल दर साल दर्ज होने वाले इन करीब 98 फीसदी मामलों में बलात्कारी पीड़ित का जानने वाला था. ज्यादातर मामले जो प्रकाश में आते हैं वे सार्वजनिक जगहों पर अनजान लोगों द्वारा किए गए होते हैं जिस कारण इस सच्चाई पर ध्यान नहीं जाता.
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एक कदम आगे, दो कदम पीछे
एक ओर पहले के मुकाबले ज्यादा लड़कियां पढ़लिख रही हैं और कार्यक्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं. दूसरी ओर इस कारण वे शादी और बच्चे देर से पैदा कर रही हैं. भारत में शादी के पहले शारीरिक संबंध बनाने के मामले समाज के लिए असहनीय और खतरा बताए जाते हैं. इस कारण बहुत से युवा पुरुष को अपनी यौन इच्छा पूरी करने का कोई स्वस्थ तरीका नहीं मिलता और कई बार यही यौन हिंसा का कारण बनता है.
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हिंसा का चक्र गर्भ से ही शुरु
भारत में अजन्मे बच्चे की लिंग जांच कर मादा भ्रूण को गर्भ में ही मार देने की घटनाएं आम हैं. जो लड़कियां जन्म ले पाती हैं वे संख्या में इतनी कम हैं कि समाज का संतुलन बिगड़ गया है. स्त्री-पुरुष अनुपात के मामले में भारत 1970 से भी नीचे आ गया है. इसके अलावा बाल विवाह, कम उम्र में मां बनना, प्रसव से जुड़ी मौतें और घरेलू हिंसा के लिए भी क्या छोटे कपड़ों को ही जिम्मेदार मानेंगे.
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भारत में वैदिक काल की स्त्रीधन जैसी धारणा से लेकर यूरोप, यूनान, अरब और चीन जापान की प्राचीन संस्कृतियों में स्त्रियों को उपभोग और गुलाम के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता रहा था. प्रख्यात जर्मन चिंतक फ्रेडरिक एगेंल्स ने विभिन्न विश्व समाजों में विकास की विभिन्न अवस्थाओं में महिलाओं के शोषण चक्र और परिवार जैसी बुनियादी संस्था में उनकी स्थिति पर एक सघन विश्लेषण किया है और लगता है कि उनका आकलन आज के हालात में खरा बना हुआ हैं जबकि पूरी दुनिया में आजादी और मानवाधिकार की बातें डंके की चोट पर की जाती हैं.
पुरुषवादी वर्चस्व की समाज व्यवस्थाएं और धार्मिक और जातीय रूढ़ियां स्त्रियों को घर और समाज में एक सजी-धजी वस्तु की तरह पेश करती हैं जिसका उपभोग करते रहने की घिनौनी परंपरा चली आ रही है. और इसी में वे सब कुत्सित कर्म शामिल हैं जिन्हें हम शोषण, बलात्कार, बदले और यौन हिंसा के भयावह रूपों के बारे में देखते सुनते और जानते हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक 2013 के मुकाबले महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में नौ फीसदी की वृद्धि 2014 में देखी गई. कुल मामले आए करीब तीन लाख 38 हजार. इनमें से तैंतीस हजार मामले बलात्कार के पाए गए थे. और इनमें भी 90 फीसदी मामलों में बलात्कार करने वाले रिश्तेदार, पड़ोसी, नियोक्ता और परिचित लोग थे.
दिल्ली की सड़कों पर 16 दिसंबर 2012 की रात हुए बलात्कार और हत्या के मामले ने देश भर को हिला दिया था. लेकिन हर गुजरते साल के साथ सवाल उठते रहे कि गुस्से और प्रदर्शनों के बाद क्या बदला और क्या नहीं.
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नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ट्विटर हैंडल @k_satyarthi से लिखते हैं, "निर्भया की कहानी अभी पूरी नहीं हुई है. हमारी बेटियों के साथ अभी शोषण, बलात्कार और हत्याएं हो रही हैं. क्या आप इस सब पर पूर्ण विराम लगाने के मेरे आह्वान का जवाब देंगे?"
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एक यूजर ने @Kolkata_Chhori ट्विटर हैंडल से लिखा है, "तुम हमें आज भी याद हो. हमें न्याय चाहिए, ना सिर्फ उसके लिए बल्कि सैकड़ों पीड़ित औरतों के लिए जिनके नाम नहीं हैं."
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सुधीर चौधरी @sudhirchaudhary ट्विटर हैंडल से लिखते हैं, "क्या बदला है? सिस्टम? मानसिकता? देश एक हफ्ते के लिए जागा और फिर सो गया, किसी भी औरत से पूछ लो!" लोगों का यह भी लिखना है कि क्या गारंटी है कि जुवेनाइल सुधर गया है और बाहर आकर वह समाज के लिए खतरा नहीं साबित होगा.
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एंथनी परमाल ने @anthonypermal ट्विटर हैंडल से लिखा है, "वाह! भारत, तुम अपनी मूर्खता कहीं रोक नहीं सकते, है ना?" उन्होंने ऐसा लिखते हुए नाबालिग दोषी से रिहाई पर अच्छे बर्ताव का कानूनी बॉन्ड भरवाने के गृह मंत्रालय के विचार करने पर टिप्पणी की.
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राजीव आनंद @SlayerRajiv लिखते हैं, "भारत - ऐसा देश जहां लोग हर बात आसानी से भूल जाते हैं और निंदा की कोशिश करते हैं." नाबालिग दोषी को रिहाई के बाद पुनर्वास के मकसद से दिल्ली सरकार ने सिलाई मशीन और 10 हजार रुपए देने का प्रस्ताव रखा है. इस पर भी लोगों ने भारी गुस्सा जताया.
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बलात्कार के समय नाबालिग रहे एक दोषी को तीन साल बाद छोड़े जाने का सोशल मीडिया पर जमकर विरोध हुआ. पीड़िता के मां-बाप ने जुवेनाइल को सबसे ज्यादा क्रूर बताते हुए उसका चेहरा सार्वजनिक करने की मांग की थी.
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एक डराने वाला तथ्य ये भी है कि बलात्कार की शिकार 38 फीसदी वारदातों की शिकार 18 साल से कम उम्र की लड़कियां रही हैं. ये वे आंकड़े हैं जो दर्ज किए हुए मामलों से जुटाए गए हैं. आधिकारिक तौर पर माना जाता है कि वास्तविक मामले इससे कहीं ज़्यादा है. एक सच्चाई ये भी है कि इन मामलों में हिंसा की ठीक ठीक वजह का पता नहीं चल पाता है. दूसरी बात बलात्कार कर बदला निकालने की हिंसक कार्रवाई के मामले भी बढ़े हैं लेकिन इनका भी कोई ठोस आंकड़ा सरकारों के पास नहीं है.
असल में देखा जाए तो स्त्री शरीर पर नियंत्रण और वर्चस्व की दबी कुंठित घिनौनी कामना ही एक तरह का बदला है जो एक कामांध पुरुष एक स्त्री से लेना चाहता है. और ये आज की बनी स्थिति नहीं है, ये सदियों से चली आ रही सामाजिक विषमता है जो अब अपने ज़्यादा खूंखार, ज्यादा जहरीले, ज्यादा पैशाचिक रूप में सामने आ रही है और जिसकी डरावनी मिसालें हम हर उस जगह में देख रहे हैं जहां स्त्रियां आगे बढ़ रही हैं और अपने हक के लिए लड़ रही हैं.