उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण के साथ-साथ सोमवार को गोवा और उत्तराखंड में भी वोट डाले जा रहे हैं. यूपी में मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाले सबसे बड़े इलाके में चुनाव है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथतस्वीर: Rajesh K. Singh/AP/picture alliance
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सोमवार को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दूसरे चरण का मतदान है. गोवा और उत्तराखंड में एकमात्र चरण की वोटिंग के अलावा उत्तर प्रदेश के रोहिलखंड इलाके में भी आज मतदान हो रहा है, जहां मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली सबसे ज्यादा सीटें हैं.
रोहिलखंड के नौ जिलों में से छह में आज मतदान हो रहा है, जो उत्तर प्रदेश के सात चरण के चुनाव का दूसरा चरण है. यह छह जिले वे हैं जहां मुस्लिम मतदाताओं का घनत्व सबसे अधिक है.
2017 में इन जिलों की 55 सीटों पर अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन पूरे राज्य में सबसे अच्छा रहा था. उसने 26.3 प्रतिशत मत हासिल करते हुए 15 सीटें जीती थीं. क्षेत्र में सबसे ज्यादा 38 सीटें बीजेपी को मिली थीं. कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं.
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यूपी में चार मंत्री मैदान में
इस बार इन 55 सीटों पर 586 उम्मीदवार मैदान में उतरे हैं. सहारनपुर, बिजनौर, मुरादाबाद, संभल, रामपुर, अमरोहा, बदायूं, बरेली और शहाजहांपुर के इलाकों में फैलीं इन सीटों में कई बड़े नाम भी चुनाव लड़ रहे हैं.
मौजूदा सरकार में चार वर्तमान और एक पूर्व मंत्री (धर्म सिंह सैनी) इसी इलाके से आते हैं. भारतीय जनता पार्टी ने शाहजहांपुर से सुरेश खन्ना को टिकट दिया है जबकि बिलासपुर से बदलाव सिंह औलख, बदायूं से महेश चंद्र गुप्ता और चंदौसी से गुलाब देवी चुनाव मैदान में हैं. भारतीय जनता पार्टी छोड़ चुके धर्म सिंह सैनी इस बार समाजवादी पार्टी की टिकट पर अपने गृह क्षेत्र सहारनपुर की नकूर सीट से लड़ रहे हैं.
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इन 55 सीटों पर दो करोड़ मतदाता हैं जिनमें से 70 लाख मुसलमान हैं. देवबंद के इर्दगिर्द की इन सीटों पर पिछली बार 68 प्रतिशत मतदान हुआ था.
उत्तराखंड और गोवा में आप का दांव
गोवा में भारतीय जनता पार्टी हैट-ट्रिक लगाने की कोशिश में जुटी है जबकि कांग्रेस को एंटी-इनकंबेंसी से उम्मीद है. राज्य में 11.6 लाख वोटर हैं जिनके सामने कांग्रेस और बीजेपी ही विकल्प हैं क्योंकि आम धारणा है कि गैर बीजेपी सरकार चाहिए तो कांग्रेस ही ऐसा कर सकती है. यही कांग्रेस की उम्मीद भी है ताकि आम आदमी पार्टी या तृणमूल कांग्रेस वे बीजेपी विरोधी वोट ना ले उड़ें, जो उसे मिल सकते हैं.
सीधा चुनाव लड़े बिना कौन कौन बना मुख्यमंत्री
भारत के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में पिछले 15 सालों से मुख्यमंत्री विधान सभा की जगह विधान परिषद के सदस्य रहे हैं. एक नजर बिना सीधा चुनाव लड़े सत्ता पाने वाले नेताओं पर.
तस्वीर: Getty Images/AFP/M. Kiran
योगी आदित्यनाथ
बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. 2017 में राज्य के चुनावों में जीत हासिल करने के बाद जब बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना था उस समय वो गोरखपुर से लोक सभा के सदस्य थे. मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्हें लोक सभा से इस्तीफा देना पड़ा. लेकिन उसके बाद वो विधान सभा की किसी सीट से उपचुनाव लड़ने की जगह विधान परिषद के सदस्य बन गए.
तस्वीर: Samiratmaj Mishra/DW
अखिलेश यादव
उनसे पहले समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मार्च 2012 से मार्च 2017 के बीच जब प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब वे भी विधान परिषद के ही सदस्य थे. आदित्यनाथ की तरह अखिलेश भी मुख्यमंत्री बनने से पहले लोक सभा के सदस्य थे.
तस्वीर: Samiratmaj Mishra/DW
मायावती
अखिलेश से पहले मई 2007 से मार्च 2012 तक प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती भी उस कार्यकाल में विधान परिषद की ही सदस्य थीं. बतौर मुख्यमंत्री यह उनका चौथा कार्यकाल था. इससे पहले के कार्यकालों में वो 2002 और 1997 में विधान सभा की सदस्य रहीं.
तस्वीर: IANS
नीतीश कुमार
नीतीश कुमार पिछले 17 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री हैं. बस बीच में मई 2014 से फरवरी 2015 के बीच नौ महीनों के लिए वो पद पर नहीं थे. अपने पूरे कार्यकाल में वो बिहार विधान परिषद के ही सदस्य रहे हैं.
तस्वीर: IANS
राबड़ी देवी
नीतीश कुमार के पहले राबड़ी देवी तीन बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं. तीन कार्यकालों में से दो बार वो विधान परिषद की सदस्य रहीं और एक बार विधान सभा की.
तस्वीर: picture-alliance/AP
लालू प्रसाद यादव
राबड़ी देवी से पहले उनके पति लालू प्रसाद यादव दो बार मुख्यमंत्री रहे. वो एक कार्यकाल में विधान परिषद के सदस्य रहे और एक में विधान सभा के.
तस्वीर: AFP/Getty Images
उद्धव ठाकरे
शिव सेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे नवंबर 2019 से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं और विधान परिषद के सदस्य हैं. उनसे पहले मुख्यमंत्री रहे बीजेपी देवेंद्र फडणवीस तो विधान सभा के सदस्य थे, लेकिन फडणवीस से पहले मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण विधान परिषद के सदस्य थे.
तस्वीर: Getty Images/AFP
कुछ ही राज्यों में होता है
इस सूची में इतने सारे दिग्गज नेताओं के नाम देख कर आप शायद सोच रहे हों कि यह चलन भारतीय राजनीति में आम हो गया है. हालांकि यह परिपाटी कुछ ही राज्यों तक सीमित है. भारत के 28 राज्यों में से सिर्फ छह में ही विधान सभा के अलावा विधान परिषद भी हैं. इनमें बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के अलावा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक शामिल हैं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa/STR
राष्ट्रीय स्तर पर
प्रधानमंत्री का राज्य सभा का सदस्य होना भी कुछ हद तक मुख्यमंत्री का विधान परिषद का सदस्य होने जैसा है. भारत में चार प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान राज्य सभा के सदस्य रहे हैं. तीन बार प्रधानमंत्री रही इंदिरा गांधी अपने पहले कार्यकाल के दौरान राज्य सभा की सदस्य थीं.
तस्वीर: picture-alliance/dpa
एच डी देवगौड़ा
एच डी देवगौड़ा जब जून 1996 में प्रधानमंत्री चुने गए थे उस समय वो कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे. सितंबर में उन्होंने राज्य सभा की सदस्यता ले ली थी. बाद में वो कई बार चुन कर लोक सभा के सदस्य भी बने, लेकिन प्रधानमंत्री के अपने छोटे कार्यकाल के दौरान वो राज्य सभा के ही सदस्य थे.
तस्वीर: Imago Images/Hindustan Times/S. Mehta
आइके गुजराल
1990 के राजनीतिक उथल पुथल वाले दशक में देवगौड़ा की तरह आईके गुजराल भी एक छोटे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री चुने गए थे और उस दौरान वो राज्य सभा के सदस्य रहे. वो दो बार लोक सभा के भी सदस्य रहे.
तस्वीर: AFP/Getty Images
मनमोहन सिंह
राज्य सभा से प्रधानमंत्रियों के बीच सबसे लंबा कार्यकाल मनमोहन सिंह का है. वो मई 2004 से मई 2014 तक प्रधानमंत्री रहे और इस दौरान वो राज्य सभा के ही सदस्य रहे. वो कभी लोक सभा के सदस्य नहीं रहे. 1999 में उन्होंने सिर्फ एक बार लोक सभा का चुनाव जरूर लड़ा था लेकिन हार गए थे.
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आम आदमी पार्टी और टीएमसी को इस बार राज्य में खाता खोलने की उम्मीद है. टीएमसी तो इस बार प्रशांत किशोर के दम पर कुछ बड़ा करने की उम्मीद में है. बीजेपी के पुराने सहयोगी रहे दल एमजीपी ने चूंकि गठबंधन करने से इनकार कर दिया है इसलिए सभी 40 सीटों पर वह खुद चुनाव लड़ रही है. कांग्रेस ने 37 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं जबकि तीन सीटें सहोयगी जीएफपी को दी हैं.
उत्तराखंड में इस बार तिहरा मुकाबला नजर आ रहा है. कांग्रेस और बीजेपी के सामने आम आदमी पार्टी मजबूत दावेदारी पेश कर रही है. उसने सभी 70 सीटों पर अपने उम्मीवार खड़े किए हैं. बीच में एक कोण उन बागी उम्मीदवारों का भी है जिन्हें कांग्रेस और बीजेपी ने टिकट नहीं दिए. ऐसी 20 से ज्यादा सीटें हैं जहां कांग्रेस या बीजेपी का कोई बागी इस बार निर्दलीय चुनाव लड़ रहा है.