आर्टेमिस 2 मिशन: कैसी है स्पेसक्राफ्ट के भीतर की जिंदगी?
स्वाति मिश्रा एएफपी
५ अप्रैल २०२६
नासा के आर्टेमिस 2 मिशन में चांद यात्रा पर निकले स्पेसक्राफ्ट के भीतर अंतरिक्ष यात्रियों की जिंदगी कैसी है?
आर्टेमिस 2 मिशन में शामिल हैं: मिशन कमांडर रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टिना कॉख और जेरमी हैनसनतस्वीर: NASA TV/Handout/REUTERS
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आर्टेमिस-2 के अंतरिक्षयात्रियों ने चंद्रमा के ऐसे नजारे देखे, जैसा पहले कभी इंसानी आंखों ने नहीं देखा था. 5 अप्रैल को तड़के जब एस्ट्रोनॉट्स के सोने का समय हुआ, तब तक उनका अंतरिक्षयान पृथ्वी से लगभग 321,869 किलोमीटर दूर जा चुका था.
नासा ने आर्टेमिस क्रू की खींची एक तस्वीर साझा की, जिसमें चांद ओरिएनताले बेसिन के साथ नजर आ रहा था. नासा ने लिखा, "यह मिशन पहला मौका है, जब पूरे बेसिन को इंसानी आंखों ने देखा है."
स्पेसक्राफ्ट के भीतर कैसा इंतजाम है?
अंतरिक्षयात्री स्मूदी पी रहे हैं. मैक एंड चीज खा रहे हैं. फोन से तस्वीरें खींच रहे हैं. टॉइलेट खराब हो जाए, तो उसे ठीक भी कर रहे हैं. यह कहना तो सही नहीं होगा कि नासा के आर्टेमिस-2 मिशन पर गए चारों एस्ट्रोनॉट बड़ा सामान्य वक्त बिता रहे हैं. लेकिन हां, अंतरिक्षयान के भीतर उनकी जिंदगी में रोजमर्रा की कई आम चीजें भी शामिल हैं.
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मिशन स्पेशलिस्ट क्रिस्टिना कॉख, डीप स्पेस में गईं पहली महिला हैं. उन्होंने बताया कि 10 की चांद यात्रा की तैयारी करना कुछ-कुछ कैंपिंग की तैयारी जैसा था. ओरायन अंतरिक्षयान में खाने-पीने की जो चीजें भेजी गई हैं उनमें 58 टॉर्टिला, कॉफी के 43 कप और पांच तरह के सॉस शामिल हैं.
आर्टेमिस 2 मिशन के अपना चौथा दिन पूरा कर लिया है. यह ओरायन स्पेसक्राफ्ट की तस्वीर है. बाहरी कैमरा से अंतरिक्षयान ने अपनी सेल्फी ली हैतस्वीर: Nasa/Planet Pix/ZUMA/picture alliance
यह पहली बार है, जब डीप स्पेस में गए अंतरिक्षयात्रियों को एक असली टॉयलेट मिला है. इससे पहले 1960-70 के दशक के अपोलो अभियानों में अंतरिक्षयात्रियों को शौच के लिए खास 'वेस्ट कलेक्शन बैग' दिया गया था, जिसे वो चंद्रमा की जमीन पर छोड़ आए.
इस बार ओरायन में टॉयलेट है और इसमें योगदान है क्रिस्टिना कॉख का. पिछले हफ्ते अमेरिकी मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा था, "मुझे खुद को स्पेस प्ल्मर बुलाने पर गर्व हो रहा है." कॉख ने कहा, "मुझे यह कहना अच्छा लगता है कि यह शायद ऑन बोर्ड सबसे अहम उपकरण है. तो जब इसने ठीक काम किया, तो हम सबने राहत की सांस ली."
लास्ट मैन ऑन दी मून: कहानी, चांद पर इंसान के आखिरी फुटप्रिंट की
टिक..टिक..टिक..नासा के ऐतिहासिक आर्टेमिस 2 की लॉन्चिंग का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. इंसान एक बार फिर चांद के सफर पर रवाना हो रहा है. चांद पर उतरने का इंतजार तो अभी खत्म नहीं होगा, लेकिन इसकी राह जरूर बनेगी.
तस्वीर: Ron Evans/NASA/dpa/picture alliance
चलो, फिर चांद चलो...
1 अप्रैल की शाम घड़ी जब 06:24 का वक्त देगी, तब इस मिशन के चांद रवाना होने की एक खिड़की खुलेगी. अगर सब दुरुस्त रहा, तो आर्टेमिस 2 चार अंतरिक्षयात्रियों को साथ लेकर 10 दिन की चांद यात्रा पर रवाना हो जाएगा. पहले इस अभियान को फरवरी में रवाना होना था, लेकिन स्पेस लॉन्च सिस्टम रॉकेट (एसएलएस) में दिक्कत के कारण तारीख आगे खिसक गई.
तस्वीर: Sam Lott/NASA/AP Photo/dpa/picture alliance
चांद पर फिर उतरने की घड़ी तो नहीं आई, लेकिन...
मौसम में खराबी या किसी और तकनीकी गड़बड़ी के चलते अगर 1 अप्रैल को लॉन्च ना हो पाया, तो 2 से 6 अप्रैल और उसके बाद 30 अप्रैल को फिर कोशिश की जाएगी. इस मिशन की मंजिल चांद की जमीन नहीं है. इसे चांद के आसपास सफर करके वापस अपने ग्रह लौट आना है.
तस्वीर: Miguel J. Rodriguez Carrillo/AFP
चांद पर आखिरी फुटप्रिंट
हमें चांद पर पैर धरने वाले शुरुआती पुराधाओं का नाम रटा हुआ है: मिशन कमांडर नील आर्मस्ट्रॉन्ग और लूनर मॉड्यूल पायलट एडविन बज आल्ड्रिन. मगर, आज मुनासिब है हम उन्हें भी याद करें जिन्होंने आखिरी दफा वहां पांव रखे थे. क्योंकि, एक लंबे अंतराल बाद वह शृंखला आगे बढ़ने जा रही है. आर्टेमिस 2 से शुरू हुई यात्रा का भविष्य काल फिर उसी चांद की जमीन का गंतव्य साधेगा.
तस्वीर: NASA
आधी सदी बीत गई...
19 दिसंबर 1972 की तारीख गुजरे करीब 54 साल बीतने को हैं. उस यादगार दिन अपोलो 17 के एस्ट्रोनॉट्स ने प्रशांत महासागर में लैंडिंग के साथ चांद से वापसी का अपना सफर पूरा किया. यह इंसानों को चांद पर लैंड कराने के अभियानों की कड़ी में छठा और अंतिम अपोलो अभियान था. अपोलो 17 पर सवार थे मिशन कमांडर यूजीन सेरनन, कमांड मॉड्यूल पायलट रॉनल्ड बी. एवन्स और लूनर मॉड्यूल पायलट हैरिसन श्मिट.
तस्वीर: NASA
"इट्स ऑरेंज"
रॉनल्ड बी. एवन्स जहां ऊपर ऑर्बिट कर रहे थे, वहीं सेरनन और श्मिट को चांद पर उतरने का मौका मिला. श्मिट चंद्रमा जाने वाले पहले प्रशिक्षित भूविज्ञानी भी थे. वो श्मिट ही थे, जिन्होंने चांद पर नारंगी मिट्टी देखी थी. उन्होंने सेरनन से कहा था, "यहां नारंगी मिट्टी है. सब जगह है. ऑरेंज!" इस खोज की खुशी से मगन सेरनन ने जवाब दिया, "हां, ये है! मैं यहां से देख सकता हूं!"
तस्वीर: NASA/REUTERS
लास्ट मैन ऑन दी मून
यूजीन सेरनन को 'लास्ट मैन ऑन दी मून' की पहचान मिली. उन्हीं के जूतों ने चंद्रमा पर इंसानों का आखिरी पदचिह्न छोड़ा. वो बूट्स अमेरिका के 'नेशनल एयर एंड स्पेस म्यूजियम' में रखे हैं.
तस्वीर: UIG/IMAGO
सेरनन को तकलीफ भी थी
कितना रोमांचकारी है ये जानना (नासा के शब्दों में) कि वो जूते, इंसानों की पहनी आखिरी चीज थी जिसने दूसरी दुनिया को छुआ. साल 1999 में सेरनन ने जब अपना संस्मरण छापा, तो उसके लिए भी यही शीर्षक चुना. वैसे उन्हें इस पहचान का अफसोस भी था. बाद के सालों तक वह कहते रहे कि 'लास्ट मैन ऑन दी मून' होना उन्हें निराश करता है.
तस्वीर: UIG/IMAGO
"इंसान का एक छोटा कदम, इंसानियत के लिए महान छलांग"
नील आर्मस्ट्रॉन्ग और बज आल्ड्रिन के चांद पर उतरने की अमर गाथा वहां यूं दर्ज की गई, "यहां, पृथ्वी ग्रह से इंसानों ने सबसे पहले चांद पर पांव रखा. जुलाई 1969 ए.डी. हम पूरी मानवता की ओर से शांति का संदेश लेकर आए."
तस्वीर: NASA/Neil A. Armstrong/Cover Images/picture alliance
"ईश्वर ने चाहा तो हम लौटेंगे"
अपोलो 11 की उस अविस्मरणीय उपलब्धि के दूसरे (और अब तक के आखिरी) छोर पर, 14 दिसंबर 1972 को चांद से वापसी का कदम उठाते हुए सेरनन ने कहा: और जब हम टॉरस-लिट्रो (चंद्रमा की एक घाटी) से चांद छोड़कर जा रहे हैं, हम वैसे ही जा रहे हैं जैसे आए थे, और ईश्वर ने चाहा, तो हम लौटेंगे, पूरी मानव जाति के लिए शांति और उम्मीद साथ लेकर.
तस्वीर: Paul E. Alers/Planet Pix/Zuma/picture alliance
इंसानों को फिर चांद पर उतरने में अभी कुछ साल हैं
अपोलो 11 से अपोलो 17 का फासला पार करने के बाद इंसान की सशरीर चंद्रमा यात्रा पर एक लंबा विराम लग गया. मानव अभियान बंद हो गए. आर्टेमिस 2 के साथ यह इंतजार खत्म तो नहीं होगा, लेकिन उसकी राह जरूर तैयार होगी. नासा, इन अभियानों की कड़ी में आर्टेमिस 4 मिशन के साथ साल 2028 में मून लैंडिंग की तैयारी कर रहा है.
तस्वीर: Ron Evans/NASA/dpa/picture alliance
आर्टेमिस 2: अंतरिक्ष में पहले कभी इतनी दूर नहीं गया इंसान
आर्टेमिस 2 का क्रू चंद्रमा के कितने पास से उड़ेगा, यह लॉन्च पर निर्भर करेगा. मगर ये दूरी चंद्रमा की सतह से 4,000 से 6,000 मील ऊपर तक हो सकती है. अंतरिक्षयात्री 'फार साइड ऑफ दी मून' को भी देखेंगे, उसकी तस्वीरें लेंगे. यानी, वो चांद के उस हिस्से को देख सकेंगे जिसे इंसानी आंखों ने पहले कभी नहीं देखा.
तस्वीर: Terry Renna/AP Photo/dpa/picture alliance
एक दिन चांद पर भी इंसानों का एक स्थायी पता होगा
आर्टेमिस 2 मिशन में शामिल हैं: मिशन कमांडर रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टिना कॉख और जेरमी हैनसन. कॉख, चंद्रमा के पास जाने वालीं पहली महिला और ग्लोवर पहले ब्लैक एस्ट्रोनॉट होंगे. आर्टेमिस अभियानों का सबसे बड़ा लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक स्थायी बेस बनाना है. और मानव की हद बस चांद तक क्यों हो, नासा तो 2030 के दशक तक इंसानों को मंगल ग्रह तक ले जाने का इरादा कर रहा है.
तस्वीर: James Blair/Nasa/ABACAPRESS.COM/picture alliance
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यह टॉयलेट एक छोटे से कक्ष में है, दिक्कत यह है कि उसमें बहुत शोर होता है. तो एस्ट्रोनॉट जब भी टॉयलेट जाते हैं, उन्हें कान सुरक्षित करने वाला उपकरण लगाना पड़ता है.
मिशन कमांडर का आउटलुक काम नहीं कर रहा था
ओरायान में एक और परेशानी आई, मिशन कमांडर का माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक काम नहीं कर रहा था. नासा के लाइवस्ट्रीम में मिशन कमांडर रीड वाइसमैन ने बताया, "मैंने यह भी देखा कि मेरे पास दो माइक्रोसॉफ्ट आउटलुक हैं और दोनों में से कोई काम नहीं कर रहा है." फिर ह्यूस्टन में मिशन कंट्रोल ने ईमेल की दिक्कत सुलझाई.
अंतरिक्षयात्रियों के लिए जरूरी है कि वे अपने सोने का ध्यान रखें. उन्हें एक स्लीप रूटीन का पालन करना है ताकि वे चांद उपकरणों की जांच करने और निगरानी करने जैसे जरूरी काम कर पाएं. सोने के लिए उनके पास स्लीपिंग बैग हैं, जो दीवार से बांध दिए जाते हैं. जिससे कि सोते समय वे तैरते ना रहें. रीड वाइसमैन ने बताया कि क्रिस्टिना कॉख, वाहन के बीच में यूं सोती हैं कि उनका सिर नीचे की तरफ होता है. वाइसमैन ने इसे चमगादड़ की तरह बताते हुए कहा कि यह काफी आरामदेह है.
अंतरिक्षयात्रियों के दिनभर के काम में 30 मिनट एक्सरसाइज करना भी शामिल है. माइक्रोग्रैविटी के कारण हड्डियों और मांसपेशियों पर असर पड़ता है. अगर सावधानी ना बरती जाए, तो खासा नुकसान हो सकता है. इसीलिए व्यायाम जरूरी है.