पीएम नरेंद्र मोदी ने 80वें स्वतंत्रता दिवस पर अपनी सरकार के नए विजन "सप्त धारा" की घोषणा की. उन्होंने विद्यार्थियों को मुफ्त कोचिंग, "नक्सल मुक्त भारत" और ओलंपिक खेल 2036 के लिए भारत की दावेदारी का जिक्र भी किया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 13वीं बार लाल किले से तिरंगा फहराया हैतस्वीर: Altaf Hussain/REUTERS
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भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लगातार 13वीं बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया. करीब सवा घंटे लंबे अपने संबोधन में मोदी ने अपकी सरकार की उपलब्धियों का जिक्र किया और भविष्य की नीतियों से जुड़े नए ऐलान किए. उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग, रक्षा उत्पादन और बिजली उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया. साथ ही, देश में सेमीकंडक्टर उद्योग और परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा देने की घोषणा की. इसके अलावा, 'भारत को हथियारबंद नक्सलों से मुक्त' करने में सफलता हासिल करने की बात कही. उन्होंने वैश्विक बाजार में उर्वरक संकट के बावजूद किसानों को सस्ते में खाद मुहैया करवाने का जिक्र किया. मोदी ने लाल किले से नए विजन के तौर पर "शक्ति की सप्त धारा" का ऐलान किया.
भारत को मिली आजादी, जानिए 15 अगस्त को इतिहास में क्या-क्या हुआ था.
तस्वीर: Kelly/AP Photo/picture alliance
आधी रात को मिली आजादी, जश्न के साथ मिला बंटवारे का दर्द
15 अगस्त 1947 की आधी रात भारतीय स्वतंत्रता विधेयक लागू हुआ और करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन का अंत हुआ. भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने. इस आजादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ, जिसने हिंदू-मुस्लिम हिंसा को जन्म दिया. खासकर पंजाब में विभाजन के शुरुआती दिनों में भारी खून-खराबा हुआ और लाखों लोगों की जान गई, करोड़ों लोग विस्थापित हुए.
तस्वीर: United Archives/picture alliance
फोन मिलाने वाली ‘फ्रॉलाइन’ की जरूरत खत्म
15 अगस्त 1926 को बर्लिन के कुछ इलाकों में लोगों की कॉल अब बिना किसी ऑपरेटर के सीधे जुड़ने लगी यानी फोन मिलाने वाली ‘फ्रॉलाइन फॉन आम्ट’ की भूमिका खत्म होने लगी. हालांकि, 1989 तक पूर्वी बर्लिन से पश्चिमी हिस्से में की जाने वाली सभी फोन कॉल दर्ज की जाती थीं और हाथ से कनेक्ट की जाती थीं. एक तरफ तकनीक फोन को ‘ऑटोमैटिक’ बना रही थी, दूसरी तरफ नियंत्रण उसे फिर से ‘मैनुअल’ कर रहा था.
तस्वीर: Museum für Kommunikation Berlin
‘आर्य नस्ल’ के नाम पर बच्चों की फैक्ट्री
1936 में बवेरिया में ‘आर्य नस्ल’ को बढ़ावा देने के लिए ‘हाइम होखलांड’ नाम से एक केंद्र खोला गया. इन केंद्रों में ‘आर्य’ वंश की मानी जाने वाली अविवाहित महिलाओं को भी रखा जाता था और उनके बच्चों की देखभाल की जाती थी. इस कार्यक्रम के तहत ‘आर्य नस्ल के दिखने वाले’ बच्चों को उनके माता-पिता से जबरन अलग कर इन केंद्रों में पहुंचाया गया और बाद में उन्हें जर्मन परिवारों के साथ रखने की कोशिश की गई.
तस्वीर: Klaus D. Wolf/EVS
बीमार और बुजुर्गों की हत्या का नया केंद्र
15 अगस्त 1941 को जर्मनी के बेर्नबुर्ग हत्या केंद्र में बीमार लोगों की हत्याओं का दौर शुरू हुआ. यह जगह नाजी जर्मनी के उन छह केंद्रों में शामिल थी, जहां लोगों को गैस चैंबर में डाल कर मार दिया जाता था. नाजियों की नजर में ‘बीमार’ या ‘काम के लायक नहीं’ समझे जाने वाले कैदियों का चुन कर उनकी हत्या की जाती थी.
तस्वीर: Jens Wolf/dpa/picture alliance
35 साल की गुलामी के बाद कोरिया हुआ आजाद
भारत की आजादी से ठीक दो साल पहले 15 अगस्त 1945 को कोरिया ने करीब 35 साल के जापानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई थी. दक्षिण कोरिया में इस दिन को ‘ग्वांगबोकजोल’ यानी ‘प्रकाश की वापसी का दिन’ कहा जाता है. जापानी शासन खत्म होने के बाद कोरियाई प्रायद्वीप भी सोवियत और अमेरिकी प्रभाव क्षेत्रों में बंट गया. आगे चलकर यह विभाजन उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के निर्माण की पृष्ठभूमि बना.
15 अगस्त 1975 की रात बांग्लादेश के संस्थापक और राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार समेत हत्या कर दी गई. लंबे समय तक हत्यारों के खिलाफ मुकदमा नहीं चला. 1996 में आवामी लीग की सत्ता में वापसी के बाद मामला दर्ज हुआ और करीब 13 साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद कई आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई.
तस्वीर: bdnews24
‘शोले’ ने बॉलीवुड में मचाया तहलका
भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठित फिल्मों में शामिल ‘शोले’ साल 1975 में आज ही के दिन रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने 19 साल तक सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्म का रिकॉर्ड अपने नाम रखा. जय-वीरू की दोस्ती, गब्बर का खौफ और ठाकुर का बदला आज भी लोकप्रिय है.
तस्वीर: Everett Collection/imago images
बाजार में आया इंटरनेट वाला स्मार्टफोन
15 अगस्त 1996 को नोकिया 9000 कम्यूनिकेटर बाजार में आया. इसकी खासियत सिर्फ फोन करना नहीं थी, बल्कि यह ई-मेल भी भेज सकता था, वेबसाइट खोल सकता था, एसएमएस भेज सकता था और फैक्स भी कर सकता था.
तस्वीर: Nokia/dpa/picture alliance
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'सप्त धारा' क्या है?
'सप्त धारा' के तहत पीएम मोदी ने सात तरह की 'शक्तियों' का जिक्र किया, जो उनके मुताबिक, 'विकसित भारत' और 'आत्मनिर्भर भारत' के लक्ष्य हासिल करने में मदद करेंगी. मोदी ने कहा, "मैं आज उस युग को भी याद करना चाहूंगा, जब भारत का सामर्थ्य सप्त सिंधु के रूप में हम जानते थे, हम समझते थे, हम सुनते थे और विकसित भारत बनाने के लिए हमें नई धारा चाहिए. आज लाल किले की प्राचीर से मैं देश के सामने शक्ति की इस सप्त धारा का आह्वान करता हूं. आने वाले 5-7 साल में, जो पिछले 5-7 दशक में नहीं हुआ, सप्त धारा के सामर्थ्य से, शक्ति से, हम देश को नई ऊंचाई, नई गति देंगे और नए लक्ष्यों को पार करने वाला सामर्थ्य देंगे."
उन्होंने विनिर्माण क्षमता (मैन्युफैक्चरिंग पावर) को सप्त धारा की पहली शक्ति बताया. मोदी ने कहा कि "डिजाइन से लेकर मैन्युफैक्चरिंग तक, भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का भरोसेमंद केंद्र बनना होगा," और कीमत, गुणवत्ता और उत्पादन स्तर के मामले में वैश्विक मानदंडों पर खरा उतरना पड़ेगा. पीएम ने कृषि और खाद्य उत्पादन को सप्त धारा की दूसरी शक्ति बताया. उन्होंने कहा कि फ्री-ट्रेड एग्रीमेंट के कारण भारत को एक बहुत बड़ा बाजार मिला है.
श्रीनगर में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह में परेड करतीं एनसीसी की कैडेट तस्वीर: Basit Zargar/ZUMA/IMAGO
एआई और डेटा सेंटर्स पर जोर
मोदी ने टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को सप्त धारा की तीसरी शक्ति बताया, जिसमें एआई, स्पेस और डेटा सेंटर्स के क्षेत्र में लीड करने की बात कही. सप्त धारा की चौथी शक्ति को उन्होंने 'गति शक्ति' का नाम दिया. इसके तहत शहरों को हाई स्पीड रेल से जोड़ने, आधुनिक हाइवे बनाने और बंदरगाहों के विकास की बात प्रधानमंत्री ने कही. रक्षा क्षेत्र में बढ़े उत्पादन के मद्देनजर मोदी ने 'रक्षा शक्ति' को सप्त धारा की पांचवीं शक्ति बताया.
ग्रीन इकोनॉमी और ब्लू इकोनॉमी को उन्होंने सप्त धारा की छठी शक्ति बताया. उन्होंने कहा कि भारत को ग्रीन हाइड्रोजन, अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, ग्रीन मोबिलिटी और ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग में वैश्विक स्तर की क्षमता विकसित करनी होगी. इसके अलावा उन्होंने फिशरीज और तटीय पर्यटन को बढ़ावा देने की बात कही.
"भारत की सॉफ्ट पावर" को मोदी ने सप्त धारा की आखिरी शक्ति बताया. उन्होंने कहा, "हैंडीक्राफ्ट हो, संस्कृति हो, हमारी फिल्में हों, हमारा क्रिएटिव वर्ल्ड हो, वीएफएक्स हो, हमारा एनीमेशन हो, हमारे गेमिंग हो, डिजिटल कंटेंट हो, क्रिएटिव वर्ल्ड के अंदर भारत अपना रुतबा दिखा सकता है."
15 अगस्त से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जो इसे इतिहास की खास तारीख बनाता है. गांधी का जश्न से दूर रहना, तिरंगे से चरखे का हटना और 10 महीने पहले मिली आजादी-जानिए इस दिन से जुड़े ये अनसुने किस्से.
तस्वीर: AP Photo/picture alliance
आजादी के दिन दिल्ली से दूर थे महात्मा गांधी
15 अगस्त,1947 को महात्मा गांधी कलकत्ता के बेलियाघाट में थे. यह इलाका सांप्रदायिक हिंसा से प्रभावित था. हिंदू और मुसलमानों के बीच भरोसा और शांति बहाल करने की कोशिश में गांधी ने ध्वजारोहण समारोह से दूरी बनाई. उन्होंने 24 घंटे का उपवास रखा, प्रार्थना की, चरखा चलाकर सूत काता और उनसे मिलने आए लोगों से बातचीत की.
10 महीने पहले मिली आजादी
शुरुआत में तय किया गया था कि भारत को 30 जून 1948 तक सत्ता सौंपी जाएगी. इसकी जिम्मेदारी भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड लुईस माउंटबेटन को दी गई थी. लेकिन माउंटबेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी का दिन चुना. यह द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की सालगिरह का दिन था.
तस्वीर: United Archives/kpa Keystone/IMAGO
तिरंगे से चरखा हटाकर अशोक चक्र को अपनाया गया
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू झंडे के जरिए आधुनिक, औद्योगिक और तकनीकी भारत की ओर बढ़ते राष्ट्र की बदलती पहचान को दिखाना चाहते थे. जबकि गांधी चरखे को स्वराज, आत्मनिर्भरता, खादी और ग्रामीण भारत का प्रतीक मानते थे. इस बदलाव से गांधी शुरुआत में निराश थे. बाद में उन्होंने कहा कि झंडे पर चरखा हो या न हो, उसके पीछे का विचार लोगों के दिलों में जीवित रहना चाहिए.
तस्वीर: Kelly/AP Photo/picture alliance
राष्ट्रगान के बिना मनाया गया था पहला स्वतंत्रता दिवस
आजादी के समय देश का कोई आधिकारिक राष्ट्रगान नहीं था. हालांकि, भारत के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर 1911 में ‘भारतो भाग्यो बिधाता’ की रचना कर चुके थे. बंगाली में लिखे गए इस गीत का नाम बाद में ‘जन गण मन’ रखा गया और 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया.
तिरंगा फहराने पर कभी थी पाबंदी
2004 से पहले आम नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति केवल कुछ खास मौकों, जैसे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस, पर ही थी. उद्योगपति और राज्यसभा सांसद रहे नवीन जिंदल ने इस अधिकार के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. सुप्रीम कोर्ट में उनकी याचिका के बाद सरकार ने ´फ्लैग कोड ऑफ इंडिया´ में बदलाव किया. जिसके बाद आम नागरिकों को किसी भी दिन अपने घर या परिसर में तिरंगा फहराने का अधिकार मिला.
तस्वीर: Prabhjot Gill/AP Photo/picture alliance
भारत के अलावा इन देशों के लिए भी खास है 15 अगस्त
इस दिन बहरीन, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, लिश्टेन्सटाइन और कांगो गणराज्य भी 15 अगस्त को अपना राष्ट्रीय दिवस मनाते हैं. हर देश की आजादी की कहानी और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है. इस वजह से 15 अगस्त दुनिया के कई हिस्सों में स्वतंत्रता, मुक्ति और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ी एक महत्वपूर्ण तारीख बन गई है.
तस्वीर: Luke Kern Choi
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विद्यार्थियों को मुफ्त कोचिंग
देश की शिक्षा व्यवस्था से नाखुश छात्रों के ताजा आंदोलनों के बाद केंद्र सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं की मुफ्त कोचिंग देने का फैसला किया है. पीएम मोदी ने लाल किले से कहा, "परिवार पर आर्थिक बोझ न आए, इसलिए हमने युवाओं के लिए विभिन्न परीक्षाओं की फ्री ऑनलाइन कोचिंग करने का निर्णय किया है. डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर है, हमारे पास उत्तम टैलेंट है, टीचर्स हैं, उन संसाधनों को जोड़ करके हम देश के नौजवानों को फ्री कोचिंग देने का एक पूरा नेटवर्क हम खड़ा करने वाले हैं"
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हथियारबंद नक्सलों के बाद "दिमागी नक्सल"
नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की रणनीति का जिक्र करते हुए मोदी ने लाल किले से कहा,"नक्सलवाद, माओवाद ने लाखों युवाओं के भविष्य को तबाह कर दिया." नक्सलवाद से जुड़ी एक नई शब्दावली देते हुए मोदी ने कहा, "हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल, यह दिमागी नक्सल मौके की तलाश में है. हिंसा अराजकता के वे रास्ते खोज रहे हैं. समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव कर रहे हैं. इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा. इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट (अलग थलग) करना होगा और राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा." इससे पहले मोदी "अर्बन नक्सल" और "खान मार्केट गैंग" जैसी शब्दावली इस्तेमाल कर चुके हैं.
भारत को मिली आजादी, जानिए 15 अगस्त को इतिहास में क्या-क्या हुआ था.
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आधी रात को मिली आजादी, जश्न के साथ मिला बंटवारे का दर्द
15 अगस्त 1947 की आधी रात भारतीय स्वतंत्रता विधेयक लागू हुआ और करीब 200 साल के ब्रिटिश शासन का अंत हुआ. भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्र बने. इस आजादी के साथ देश का विभाजन भी हुआ, जिसने हिंदू-मुस्लिम हिंसा को जन्म दिया. खासकर पंजाब में विभाजन के शुरुआती दिनों में भारी खून-खराबा हुआ और लाखों लोगों की जान गई, करोड़ों लोग विस्थापित हुए.
तस्वीर: United Archives/picture alliance
फोन मिलाने वाली ‘फ्रॉलाइन’ की जरूरत खत्म
15 अगस्त 1926 को बर्लिन के कुछ इलाकों में लोगों की कॉल अब बिना किसी ऑपरेटर के सीधे जुड़ने लगी यानी फोन मिलाने वाली ‘फ्रॉलाइन फॉन आम्ट’ की भूमिका खत्म होने लगी. हालांकि, 1989 तक पूर्वी बर्लिन से पश्चिमी हिस्से में की जाने वाली सभी फोन कॉल दर्ज की जाती थीं और हाथ से कनेक्ट की जाती थीं. एक तरफ तकनीक फोन को ‘ऑटोमैटिक’ बना रही थी, दूसरी तरफ नियंत्रण उसे फिर से ‘मैनुअल’ कर रहा था.
तस्वीर: Museum für Kommunikation Berlin
‘आर्य नस्ल’ के नाम पर बच्चों की फैक्ट्री
1936 में बवेरिया में ‘आर्य नस्ल’ को बढ़ावा देने के लिए ‘हाइम होखलांड’ नाम से एक केंद्र खोला गया. इन केंद्रों में ‘आर्य’ वंश की मानी जाने वाली अविवाहित महिलाओं को भी रखा जाता था और उनके बच्चों की देखभाल की जाती थी. इस कार्यक्रम के तहत ‘आर्य नस्ल के दिखने वाले’ बच्चों को उनके माता-पिता से जबरन अलग कर इन केंद्रों में पहुंचाया गया और बाद में उन्हें जर्मन परिवारों के साथ रखने की कोशिश की गई.
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बीमार और बुजुर्गों की हत्या का नया केंद्र
15 अगस्त 1941 को जर्मनी के बेर्नबुर्ग हत्या केंद्र में बीमार लोगों की हत्याओं का दौर शुरू हुआ. यह जगह नाजी जर्मनी के उन छह केंद्रों में शामिल थी, जहां लोगों को गैस चैंबर में डाल कर मार दिया जाता था. नाजियों की नजर में ‘बीमार’ या ‘काम के लायक नहीं’ समझे जाने वाले कैदियों का चुन कर उनकी हत्या की जाती थी.
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35 साल की गुलामी के बाद कोरिया हुआ आजाद
भारत की आजादी से ठीक दो साल पहले 15 अगस्त 1945 को कोरिया ने करीब 35 साल के जापानी औपनिवेशिक शासन से मुक्ति पाई थी. दक्षिण कोरिया में इस दिन को ‘ग्वांगबोकजोल’ यानी ‘प्रकाश की वापसी का दिन’ कहा जाता है. जापानी शासन खत्म होने के बाद कोरियाई प्रायद्वीप भी सोवियत और अमेरिकी प्रभाव क्षेत्रों में बंट गया. आगे चलकर यह विभाजन उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के निर्माण की पृष्ठभूमि बना.
15 अगस्त 1975 की रात बांग्लादेश के संस्थापक और राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार समेत हत्या कर दी गई. लंबे समय तक हत्यारों के खिलाफ मुकदमा नहीं चला. 1996 में आवामी लीग की सत्ता में वापसी के बाद मामला दर्ज हुआ और करीब 13 साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद कई आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई.
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‘शोले’ ने बॉलीवुड में मचाया तहलका
भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठित फिल्मों में शामिल ‘शोले’ साल 1975 में आज ही के दिन रिलीज हुई थी. इस फिल्म ने 19 साल तक सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्म का रिकॉर्ड अपने नाम रखा. जय-वीरू की दोस्ती, गब्बर का खौफ और ठाकुर का बदला आज भी लोकप्रिय है.
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बाजार में आया इंटरनेट वाला स्मार्टफोन
15 अगस्त 1996 को नोकिया 9000 कम्यूनिकेटर बाजार में आया. इसकी खासियत सिर्फ फोन करना नहीं थी, बल्कि यह ई-मेल भी भेज सकता था, वेबसाइट खोल सकता था, एसएमएस भेज सकता था और फैक्स भी कर सकता था.
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ओलंपिक 2036 की दावेदारी
भारत सरकार 2036 में गुजरात में ओलंपिक खेल करवाना चाहती है. प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले से कहा, "हम 2036 में ओलंपिक के मजबूत दावेदार बनकर के आगे बढ़ रहे हैं, और 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स को अब भारत होस्ट करने वाला है." मोदी ने युवाओं से उन खेलों में भी हिस्सा लेने की अपील की जिनमें हाल के वर्षों में भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं दिखा है. उन्होंने कहा कि ओलंपिक में "करीब 40 प्रकार के गेम होते हैं और करीब 325-350 स्पर्धाएं होती हैं....भारत दो तिहाई खेलों में कहीं होता ही नहीं है." मोदी ने कहा कि ऐसी प्रतिस्पर्धाओं में भारत भी शामिल हो, इसके लिए देशभर में टैलेंट हंट अभियान चलाया जाएगा और 5 से 15 साल तक की प्रतिभाओं को स्पेशल ट्रेनिंग देकर अच्छा खिलाड़ी बनाया जाएगा.
1950 के दशक में बड़े हुए बच्चों ने आजाद भारत के बेहतर भविष्य से जुड़े कई सपने देखे थे. अब आजादी के 79 साल पूरे होने के बाद, उन सपनों की क्या स्थिति है. क्या उनके “सपनों का भारत” आकार ले सका?
तस्वीर: ANI
“महिलाओं को मिली आर्थिक आजादी”
तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की रहने वालीं 80 साल की नीलावती कहती हैं कि देश की आजादी से पहले कई महिलाएं अपने घरों तक ही सीमित थीं, उन्हें पढ़ने नहीं दिया जाता था और वे अपने फैसले लेने के लिए भी स्वतंत्र नहीं थीं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि आजादी के बाद महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकीं, अपने फैसले खुद ले सकीं और समाज में पुरुषों के बराबर योगदान दे सकीं.
तस्वीर: Senthil Kumar/DW
“अभी बहुत कुछ हासिल करना बाकी”
पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर शहर के रहने वाले 86 वर्षीय कुमारेश घोष आजादी के वक्त महज सात साल के थे. उनका कहना है कि आजाद होने पर देश ने काफी प्रगति की है लेकिन अभी भी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है. उन्होंने डीडब्ल्यू हिंदी से कहा कि अब आम लोगों को वंचित कर ज्यादातर राजनेता अपने हित साधने में जुटे हैं और यही वजह है कि आजादी के आठ दशकों में भी आम लोगों की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है.
तस्वीर: privat
“थर्ड वर्ल्ड कंट्री के टैग से छुड़ाया पीछा”
नोएडा में रहने वालीं 84 वर्षीय अलिका आजादी के वक्त पांच साल की थीं. वे कहती हैं कि एक समय पर भारत को ‘थर्ड वर्ल्ड कंट्री’ कहा जाता था लेकिन अब देश ने उस टैग से पीछा छुड़ा लिया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि उस वक्त लोग आजादी का महत्व समझते थे क्योंकि यह बहुत मुश्किल से मिली थी, लेकिन अब लोग इसकी कीमत भूलते जा रहे हैं. उनका कहना है कि देश में धर्म के आधार पर विभाजन भी बढ़ा है जो गलत है.
तस्वीर: Adarsh Sharma/DW
“पीछा नहीं छोड़ रही सांप्रदायिक हिंसा”
कोलकाता में रहने वाले 85 वर्षीय अशोक कुमार चक्रवर्ती साल 1947 में विभाजन के वक्त भारत आए थे. वे कहते हैं, “हम जिस सांप्रदायिक हिंसा के डर से यहां आए थे वह यहां भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रही है.” उनका मानना है कि अस्सी के दशक तक देश का माहौल बेहतर था लेकिन उसके बाद चीजें बदलने लगीं और सांप्रदायिक सद्भाव पहले जैसा नहीं रहा. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि आजादी के समय देखे गए सपने अभी भी अधूरे हैं.
तस्वीर: Prabhakar/DW
“उम्मीद के मुताबिक नहीं हुआ विकास”
बिहार के रहने वाले 83 वर्षीय कृष्णकांत सिंह आज के समय की तुलना आजादी के बाद के सालों से करते हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि आजादी के बाद पांच आईआईटी और दिल्ली में एम्स बना लेकिन क्या बाद में उस स्तर की संस्थाएं खुल सकीं. उन्होंने कहा कि उदारीकरण के बाद निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं. उन्होंने कहा कि जितनी उम्मीद थी, उस रफ्तार से देश में काम नहीं हुआ.
तस्वीर: Manish Kumar
“किसानों की समस्याएं बरकरार हैं”
चेन्नई के रहने वाले 78 वर्षीय नटराजन मानते हैं कि देश के नागरिकों को अभी भी असल आजादी नहीं मिली है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि आज भी बहुत से लोग बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. उन्होंने किसानों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि भाषणों में किसानों किसानों की प्रशंसा की जाती है लेकिन उनकी असली समस्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं.
तस्वीर: Senthil Kumar/DW
“कठिन परिस्थितियों में भी निराश नहीं होना चाहिए”
यूपी के रहने वाले 81 वर्षीय अजीत कुमार तिवारी भ्रष्टाचार से चिंतित हैं और नैतिक मूल्यों में कमी देखते हैं. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, “आज पैसे का महत्व इतना बढ़ गया है कि सादा जीवन और उच्च विचार जैसी पुरानी सोच पीछे छूट गई है, पहले ऐसा नहीं था. उन्होंने कहा, "समाज में फैली मिलावट और नैतिक गिरावट को देखकर हार नहीं माननी चाहिए. जीवन की राह मुश्किल हो सकती है, लेकिन संघर्ष जारी रखना जरूरी है."