11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों का जर्मनी-कनेक्शन
१० सितम्बर २०२६
तारीख 11 सितंबर और साल 2001 था. जर्मनी के तत्कालीन राष्ट्रपति योहानेस राउ ने कहा था कि इस दिन ने दुनिया बदल दी. वह न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के दो ट्विन टावर्स को आग की लपटों में घिरा हुआ देखकर सदमे में थे. आतंकवादियों ने चार यात्री विमानों को हाईजैक किया. उनका इस्तेमाल हमला करने के लिए हुआ. टावरों पर हुए हमले में करीब 3,000 लोगों की मौत हुई.
मरने वालों में 11 जर्मन नागरिक
जर्मनी के राष्ट्रपति घटना को संबोधित करने के लिए शब्द तलाशने की कोशिश कर रहे थे. वह कहते हैं, "हम नहीं जानते कि आज हुई इस घटना के राजनीतिक और सामाजिक परिणाम क्या होंगे. हमने टेलीविजन पर जो देखा, उसे समझ पाना और उस पर विचार कर पाना भी हमारे लिए मुश्किल है.”
बाद में पता चला कि मृतकों में 92 देशों के लोग शामिल थे. इनमें 11 जर्मन नागरिक थे.
अगले दिन तेजी से फैल रही एक खबर की पुष्टि हुई. चार संदिग्ध हमलावरों में से तीन हाल में जर्मनी के हैम्बर्ग में रह चुके थे. मिस्र में जन्मे मोहम्मद अत्ता अमेरिका पर 11 सितंबर 2001 को हुए आतंकवादी हमले का मुख्य हाईजैकर था. वह 1990 के दशक की शुरुआत में पढ़ाई के लिए जर्मनी के इस उत्तरी शहर में आया था.
हैम्बर्ग में रहे थे आतंकी
एक वक्त आया जब अत्ता कट्टरपंथी विचारधारा की ओर बढ़ने लगा, खासकर जबसे उसने हैम्बर्ग की अल-कुद्स मस्जिद में जाना शुरु किया. इस मस्जिद को बाद में जर्मन सुरक्षा अधिकारियों ने बंद कर दिया. उसने अपने जीवन के आखिरी तीन साल हारबुर्ग इलाके में दो अन्य संदिग्ध हमलावरों के साथ एक अपार्टमेंट में बिताए थे.
माना जाता है कि तथाकथित "हैम्बर्ग आतंकी सेल” में छह आदमी शामिल थे. इनमें मोरक्कन नागरिक मनीर अल-मोतास्सादेक भी था. 11 सितंबर के आतंकी हमलों के लगभग एक साल बाद, जर्मनी के सरकारी वकीलों ने उसके खिलाफ मामला दर्ज किया. उस पर इन हमलों की योजना बनाने और उनके लिए पैसे जुटाने में मदद करने का आरोप था. यह जर्मनी में इस आतंकी समूह के किसी जर्मन सदस्य के खिलाफ दर्ज किया गया पहला मामला था.
साल 2003 में हैंसियाटिक हायर रीजनल कोर्ट ने उसे हजारों लोगों की हत्या में मदद करने और आतंकी संगठन का सदस्य होने के आरोप में 15 साल की अधिकतम जेल सजा सुनाई. सजा पूरी करने के बाद अल-मोतास्सादेक को उसके देश मोरक्को भेज दिया गया.
ब्रेमेन के व्यक्ति ने गुआंतानामो की जेल में बिताए कई साल
मोहम्मद अत्ता के समूह से जुड़े एक अन्य संदिग्ध रमजी बिनालशिब का जन्म यमन में हुआ था. उसे 2006 से बिना मुकदमे के अमेरिका के गुआंतानामो बे डिटेंशन सेंटर में रखा गया. अमेरिका ने इस जेल में सैकड़ों संदिग्धों को रखा. मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ बताते रहे हैं.
इन कैदियों में मुरात कुर्नाज भी था. उसका जन्म जर्मनी के ब्रेमेन में हुआ था. करीब पांच साल तक हिरासत में रहने के बाद उसे अगस्त 2006 में रिहा कर दिया गया. उसके खिलाफ 11 सितंबर के हमलों में शामिल होने का कोई सबूत नहीं मिला. बाद में कुर्नाज ने अपने अनुभवों पर एक किताब लिखी, जिस पर 2013 में फिल्म भी बनी.
जर्मनी के राष्ट्रपति से हुई पूछताछ
इस बीच जर्मन संसद बुंडेस्टाग की जांच समितियों ने यह पता लगाने की कोशिश की कि कुर्नाज और दूसरे संदिग्ध अमेरिकी व जर्मन खुफिया एजेंसियों की निगरानी में गलत तरीके से कैसे आए. जिन लोगों से पूछताछ हुई, उनमें उस समय के विदेश मंत्री और वर्तमान जर्मन राष्ट्रपति फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर भी शामिल थे.
जांचकर्ता जानना चाहते थे कि 2002 में जर्मनी में जन्मे कुर्नाज को वापस जर्मनी लाने की संभावित कोशिश को जर्मन सुरक्षा अधिकारियों ने क्यों खारिज कर दिया था. कुर्नाज के पास तुर्की का पासपोर्ट था. श्टाइनमायर का कहना था, "इसमें किसी को शक नहीं है और मुझे भी नहीं कि कुर्नाज ने गुआंतानामो में बहुत कुछ झेला. इसलिए हमने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि उसके साथ कानून के मुताबिक व्यवहार हो. लेकिन साथ ही, हमें अपने देश की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभानी थी.”
श्रोएडर ने अमेरिका को "बिना शर्त समर्थन” दिया
कुर्नाज का मामला दिखाता है कि अमेरिका में आतंकी हमलों के बाद जर्मनी के नेताओं पर कितना दबाव था. हमले के अगले दिन तत्कालीन जर्मन चांसलर गेरहार्ड श्रोएडर ने संसद को संबोधित किया. उन्होंने कहा, "11 सितंबर 2001 हम सभी के लिए इतिहास का एक काला दिन बन गया है.”
उन्होंने बताया कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति से सभी जर्मन लोगों की तरफ से संवेदना व्यक्त की है. साथ ही उन्होंने कहा कि जर्मनी अमेरिका को हर संभव मदद देगा, ताकि हमलों के जिम्मेदार लोगों और उनके पीछे मौजूद लोगों की पहचान की जा सके.
बुंडेसटाग में पास हुआ आतंवाद-विरोधी कानून
श्रोएडर के बयान के बाद जर्मनी में कई कड़े कानूनों को बनाने का रास्ता खुला. हमलों के कुछ ही हफ्तों बाद सोशल डेमोक्रेट्स और ग्रीन्स की गठबंधन वाली सरकार ने पहला सुरक्षा पैकेज पेश किया. इसमें पुलिस और खुफिया एजेंसियों के लिए ज्यादा पैसा और ज्यादा ताकत दी गई.
पहले जिन धार्मिक संगठनों को विशेष कानूनी सुरक्षा मिली हुई थी, उन्हें भी प्रतिबंधित किया जा सकता था, अगर उनकी गतिविधियां जर्मनी के संविधान या लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ होतीं या वे आपराधिक गतिविधियों में शामिल पाए गए. अमेरिका में हमलों के चार महीने से भी कम समय बाद जर्मनी का आतंकवाद विरोधी कानून लागू हो गया.
खुफिया एजेंसियों को बैंकों, एयरलाइंस और टेलीकॉम कंपनियों के पास मौजूद निजी जानकारी तक पहुंच दी गई. जर्मनी ने अपने इमिग्रेशन कानून भी कड़े कर दिए.
बड़े पैमाने पर डाटा की जांच करके अधिकारियों ने ऐसे संदिग्धों की पहचान करने की कोशिश की, जिन्हें "स्लीपर एजेंट” कहा जाता था. माना जाता है कि हैम्बर्ग आतंकवाद सेल से जुड़ा मोहम्मद अत्ता ऐसा ही व्यक्ति था, जिसे सुरक्षा एजेंसियां समय रहते पहचान नहीं पाईं.
बाद में जर्मनी की संवैधानिक अदालत ने इस तरीके को सीमित कर दिया. साल 2006 के एक फैसले में अदालत ने कहा कि ऐसी तलाशी तभी की जा सकती है, जब कोई विशिष्ट खतरा मौजूद हो. 2013 में जर्मनी की सर्वोच्च अदालत ने भी आतंकवाद विरोधी डेटाबेस के कुछ हिस्सों को असंवैधानिक करार दिया.
अफगानिस्तान के खिलाफ जंग में शामिल हुआ जर्मनी
11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों का सैन्य असर भी बहुत बड़ा था. अमेरिका ने अक्टूबर 2001 में अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ हमला शुरू कर दिया. तालिबान ने अल-कायदा के प्रमुख और हमलों के मास्टरमाइंड माने जाने वाले ओसामा बिन लादेन को अमेरिका को सौंपने से इनकार कर दिया था.
दिसंबर 2001 में जर्मनी भी अमेरिका के समर्थन में इस जंग में शामिल हो गया. यह युद्ध 20 साल तक चला और अगस्त 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के साथ खत्म हुआ. इस दौरान लगभग 3,600 सैनिक मारे गए जिनमें जर्मनी की सेना बुंडेसवेयर के 59 सैनिक भी थे. जर्मनी के तीन पुलिसकर्मियों की भी मौत हुई.
11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद जर्मन राष्ट्रपति योहानेस राउ के शब्द आज भी याद किए जाते हैं: "इस दिन ने दुनिया बदल को बदल दिया."