1. कंटेंट पर जाएं
  2. मेन्यू पर जाएं
  3. डीडब्ल्यू की अन्य साइट देखें

असम में बढ़ रही है पुलिस हिरासत में मौतों की तादाद

२ दिसम्बर २०२१

असम में एक छात्र नेता की पीट-पीट कर हत्या के मामले का मुख्य अभियुक्त सड़क हादसे में मारा गया है. इसे लेकर बीती मई से अब तक कुल 28 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो चुकी है.

Indien | Gefängnisse in Assam
तस्वीर: Roshni Majumdar/DW

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने हाल में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एक अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2020 के बीच पुलिस हिरासत में और मुठभेड़ में होने वाली मौतों के मामले में पूर्वोत्तर राज्यों में असम पहले स्थान पर है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने हाल में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि वर्ष 2001 से वर्ष 2020 के बीच बीते 20 वर्षों में देश भर में पुलिस हिरासत 1,888 मौतें हुई हैं. लेकिन इन मामलों में अब तक महज 26 पुलिस वालों को ही दोषी ठहराया जा सका है. एनसीआरबी वर्ष 2017 से हिरासत में मौत के मामलों में गिरफ्तार पुलिसकर्मियों का आंकड़ा जारी कर रहा है.

घर के अंदर भी खतरे से बाहर नहीं

04:55

This browser does not support the video element.

बीते चार वर्षों में हिरासत में हुई मौतों के मामलों में 96 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया है. असम में मई से अब तक हिरासत में हुई मौतों के मामले बढ़ने के बाद विपक्ष और गैर-सरकारी संगठनों ने सरकार और पुलिस की कार्यशैली को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

ताजा मामला

ऊपरी असम के जोरहाट जिले में सोमवार को अखिल असम छात्र संघ (आसू) के एक नेता अनिमेश भुइयां की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी थी. पुलिस ने इस मामले में मुख्य अभियुक्त नीरज दास समेत 13 लोगों को गिरफ्तार किया था. लेकिन बुधवार तड़के पुलिस की जीप से कूद कर भागने का प्रयास करने के दौरान सड़क हादसे में नीरज की मौत हो गई.

जोरहाट के एसपी अंकुर जैन ने पत्रकारों को बताया, "नीरज ने पूछताछ के दौरान पुलिस को नशीली दवाओं के भंडार में बारे में जानकारी दी थी. उसे लेकर पुलिस की टीम बरामदगी के लिए जा रही थी. लेकिन नीरज ने जीप से कूद कर भागने की कोशिश की. इसी दौरान पीछे से आने वाले पुलिस के वाहन से उसे टक्कर लग गई. अस्पताल ले जाने पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.”

लेकिन पुलिस के इस दावे पर सवाल उठने लगे हैं. इसकी वजह यह है बीती 10 मई को कार्यकाल संभालने वाले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इस मुद्दे पर पहले ही विवादित बयान दे चुके हैं. सत्ता संभालने के बाद उन्होंने साफ कहा था कि अपराधियों के मामले में सरकार शून्य सहनशीलता की नीति पर आगे बढ़ेगी.

उनके शपथ लेने के दो महीने के भीतर ही पुलिस ने कथित तौर पर हिरासत से भागने का प्रयास कर रहे करीब 12 संदिग्ध अपराधियों को मार गिराया गया था. विपक्ष की ओर से उठते सवालों के बाद इसे उचित ठहराते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि आरोपी पहले गोली चलाए या भागने की कोशिश करे तो कानूनन पुलिस को गोली चलाने का अधिकार है.

बांग्लादेश से क्या सीख सकता है यूरोप

06:13

This browser does not support the video element.

असम पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक मई से सितंबर तक के पांच महीनों के दौरान मुठभेड़ की 50 घटनाएं हुईं जिनमें 27 लोग मारे गए और 40 घायल हो गए. ऐसे तमाम मामलों में संदिग्ध उग्रवादियों या अपराधियों ने या तो कथित तौर पर पुलिसवालों के हथियार छीनने की कोशिश की या फिर हिरासत से भागने का प्रयास किया था.

विपक्ष का आरोप

हिरासत में होने वाली मौतों की लगातार बढ़ती तादाद को ध्यान में रखते हुए विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने बीजेपी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पुलिस पर खुलेआम हत्या करने का आरोप लगाया है. असम मानवाधिकार आयोग ने इन मामलों का संज्ञान लेते हुए बीती सात जुलाई को सरकार से इन मौतों से संबंधित हालातों की जांच कराने का निर्देश दिया था.

आयोग के सदस्य नब कमल बोरा का कहना है कि मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक जिन लोगों की मौत हुई वे हिरासत में थे और हथकड़ी पहने थे.ऐसे में इसका पता लगाना जरूरी है कि उनकी मौत किन हालात में हुई. इससे पहले नई दिल्ली स्थिति एक एडवोकेट आरिफ ज्वादर ने भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से हिमंत बिस्वा सरमा के कार्यकाल के दौरान हिरासत में होने वाली मौतों की शिकायत की थी.

राज्य के पुलिस महानिदेशक भास्कर ज्योति महंत का कहना है कि पुलिस आखिरी उपाय के तौर पर ही फायरिंग का सहारा लेती है. ऐसे तमाम मामलों में कानूनी दायरे में रह कर ही ताकत का प्रयोग किया गया है. अपराधी पुलिस वालों से या तो हथियार छीनने का प्रयास कर रहे थे या फिर हिरासत से भागने का. उनका दावा है कि पुलिस बल अब पहले से ज्यादा जवाबदेह और पारदर्शी है.

असम के एक पूर्व डीजीपी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें चिंता का विषय हैं. लेकिन जब राज्य का मुखिया ही प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर इसका समर्थन कर चुका हो तो ऐसी घटनाएं बढ़ना स्वाभाविक है.”

एक मानवाधिकार कार्यकर्ता सुविमल लाहिड़ी कहते हैं, "शायद असम सरकार अपराध की जगह अपराधियों को खत्म करने की नीति पर आगे बढ़ रही है. ऐसे में फिलहाल ऐसे मामले कम होने की कोई उम्मीद नहीं नजर आती.”

इस विषय पर और जानकारी को स्किप करें
डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी को स्किप करें

डीडब्ल्यू की टॉप स्टोरी

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें को स्किप करें

डीडब्ल्यू की और रिपोर्टें